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प्रतीकात्मक तस्वीर : ब्लूमबर्ग
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नई दिल्ली: कांग्रेस ने रफाल सौदे की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की मांग की है, जबकि भाजपा नेतृत्व वाला सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए इस मांग के खिलाफ़ है.

पिछले तीन दशकों के दौरान विभिन्न मामलों में जांच के लिए गठित जेपीसी समितियों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. उनकी सिफारिशों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया गया या खारिज कर दिया गया.

दिप्रिंट से जानें कि जेपीसी कैसे काम करती है.

जेपीसी का गठन किस प्रकार होता है?

जेपीसी का गठन एक नियत अवधि और निश्चित उद्देश्य के लिए संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में से किसी एक द्वारा पारित एवं दूसरे द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव के ज़रिए किया जाता है.

इसका गठन दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों की सहमति से भी किया जा सकता है.

जेपीसी के सदस्य या तो दोनों सदनों द्वारा चुने जाते हैं या पीठासीन अधिकारियों द्वारा नामांकित किए जाते हैं. कुल सदस्यों की कोई निश्चित संख्या तय नहीं है.

यदि कोई जेपीसी अपना कार्यकाल ख़त्म होने या लोकसभा भंग होने से पहले अपनी रिपोर्ट नहीं दे पाती है, तो उसकी प्राथमिक रिपोर्ट या मसौदा रिपोर्ट नए सिरे से गठित की जाने वाली अगली कमेटी को सौंप दी जाती है.

जेपीसी क्या काम करती है?

जेपीसी उस मुद्दे से संबंधित साक्ष्य जुटाने के लिए अधिकृत होती है जोकि उसकी जांच का विषय है. कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद सरकार देश की सुरक्षा या राष्ट्रहित के नाम पर उसे सार्वजनिक नहीं करने का फैसला कर सकती है. सरकार जेपीसी के निष्कर्षों को मानने के लिए भी बाध्य नहीं होती है.

संसद में अपनी रिपोर्ट सौंपने के बाद जेपीसी को भंग कर दिया जाता है.

साक्ष्य के लिए किसी को बुलाने के मुद्दे पर कमेटी में किसी भी विवाद पर अंतिम फैसला स्पीकर का होता है. आम तौर पर मंत्रियों को गवाही के लिए नहीं बुलाया जाता है.

जेपीसी से जांच कराए गए मुद्दों में 1987 में बोफोर्स सौदा, 1992 में प्रतिभूति और बैंकिंग लेनदेन से जुड़ी अनियमितताएं, 2011 में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और 2013 में वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाला शामिल हैं.

विभिन्न जेपीसी रिपोर्टों में अब तक क्या निकल कर आया?

पहली जेपीसी बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए गठित की गई थी. 6 अगस्त 1987 को लोकसभा में रक्षा मंत्री के. सी. पंत द्वारा पेश एक प्रस्ताव के ज़रिए इसका गठन हुआ था.

बी. शंकरानंद की अध्यक्षता वाली कमेटी ने 26 अप्रैल 1988 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी.

हालांकि, तब विपक्षी दलों ने ये कहते हुए जेपीसी का बहिष्कार किया था कि कमेटी में कांग्रेस सदस्यों का बोलबाला था. इसकी रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताकर खारिज कर दिया गया था.

दूसरी बार जेपीसी हर्षद मेहता कांड सामने आने के बाद प्रतिभूति और बैंकिंग लेनदेन में अनियमितताओं की जांच के लिए गठित की गई थी. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रामनिवास मिर्धा की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिशों को पूर्णता में ना तो स्वीकार किया गया और ना ही लागू किया गया.

अगली जेपीसी 2001 में भाजपा के वरिष्ठ सांसद ले. जन. (से.नि.) प्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में शेयर बाज़ार घोटाले की जांच के लिए गठित की गई थी. कमेटी ने 19 दिसंबर 2002 को अपनी रिपोर्ट सौंपी. इसने शेयर बाज़ार से संबंधित प्रावधानों में कई बदलावों की सिफारिश की, जिन्हें बाद में नरम बना दिया गया.

बाद की जेपीसी कमेटियां

चौथी बार जेपीसी का गठन अगस्त 2003 में सॉफ्टड्रिंक, जूस आदि पेय पदार्थों में कथित रूप से कीटनाशकों के अंश पाए जाने के मामलों की जांच करने और इस संबंध में सुरक्षा मानकों के निर्धारण के लिए किया गया था. एनसीपी नेता शरद पवार की अध्यक्षता वाली कमेटी ने 4 फरवरी 2004 को संसद में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

रिपोर्ट में पेय पदार्थों में कीटनाशकों के अंश पाए जाने की पुष्टि की गई थी. इसमें पेयजल के लिए कठोर मानकों की सिफारिश भी की गई थी. जहां संसद और सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय मानक संस्था की स्थापना संबंधी कमेटी की सिफारिश को स्वीकार किया, वहीं एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार सॉफ्टड्रिंक संबंधी मानकों को लागू करने में टालमटोल करती रही.

एक और जेपीसी 2011 में 2जी घोटाले के जांच के लिए गठित की गई. इसका अध्यक्ष कांग्रेस सांसद पी. सी. चाको को बनाया गया. कई विपक्षी सदस्यों ने कमेटी के प्रति तब अपना अविश्वास प्रगट किया जब इसकी मसौदा रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को निर्दोष बताया गया.

अंतत: अक्टूबर 2013 में एक संशोधित रिपोर्ट सौंपी गई. इसमें निष्कर्ष था कि स्पेक्ट्रम लाइसेंस जारी करने की संचार विभाग की प्रक्रिया के बारे में तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गुमराह किया था.

वीवीआईपी अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले और उससे जुड़े लेनदेन में कथित बिचौलिए की संदिग्ध भूमिका की जांच के लिए 2013 में एक जेपीसी का गठन किया गया. विपक्ष द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के कारण यह काम नहीं कर पाई. विपक्ष ने मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच कराने की मांग की थी. उस समय विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने जेपीसी के गठन को एक निरर्थक उपक्रम बताया था. लोकसभा भंग होने के बाद यह जेपीसी कोई
कार्य नहीं कर पाई.

रफाल सौदे पर जेपीसी के गठन से किसी ठोस परिणाम की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि एक तो लोकसभा भंग होने से पहले ही इसकी कार्यावधि समाप्त हो जाएगी, और साथ ही सरकार जेपीसी की सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य भी नहीं है.

इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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