scorecardresearch
Thursday, 29 February, 2024
होमदेशभारत ने खोए लद्दाख में 26 पेट्रोलिंग पॉइंट - पूर्वी लद्दाख पर जारी हैं चीन के अतिक्रमण की कोशिश

भारत ने खोए लद्दाख में 26 पेट्रोलिंग पॉइंट – पूर्वी लद्दाख पर जारी हैं चीन के अतिक्रमण की कोशिश

पिछले सप्ताह सौंपी गई एक रिपोर्ट में कहा गया कि सेना ने अग्रिम क्षेत्रों के पास प्रतिबंध लगा दिया है, यह दर्शाता है कि वह चीन को 'विवादित' क्षेत्रों पर आपत्ति जताने का मौका नहीं देना चाहते.

Text Size:

नई दिल्ली: लद्दाख में पुलिस अधीक्षक द्वारा दायर एक रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी लद्दाख में भारतीय सुरक्षा बलों (आईएसएफ) द्वारा पहले नियमित रूप से पेट्रोलिंग किए जाने वाले 65 में से 26 पेट्रोलिंग पॉइंट को भारत ने अपनी पकड़ से खो दिया है.

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर गतिरोध के बीच चीन किस तरह पूर्वी लद्दाख में भारतीय क्षेत्र का अतिक्रमण करने के लिए ‘सलामी स्लाइसिंग’ की अपनी रणनीति जारी रखे हुए है.

वर्तमान में काराकोरम दर्रे से शुरू होकर चुमुर तक 65 पीपी (पेट्रोलिंग पॉइंट) हैं जिन्हें आईएसएफ द्वारा नियमित रूप से गस्ती किया जाना था. 65 पीपी में से, 26 पीपी (यानी पीपी नंबर 5-17, 24-32, 37) में हमारी उपस्थिति आईएसएफ द्वारा प्रतिबंधात्मक या कोई पेट्रोलिंग नहीं होने के कारण खो गई है.

बाद में, चीन हमें इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है कि ऐसे क्षेत्रों में लंबे समय से आईएसएफ या नागरिकों की उपस्थिति नहीं देखी गई है लेकिन चीनी इन क्षेत्रों में मौजूद थे. इससे भारतीय पक्ष की ओर आईएसएफ के नियंत्रण वाली सीमा में बदलाव होता है और ऐसे सभी पॉकेट्स में एक ‘बफर जोन’ बनाया जाता है, जो अंततः भारत द्वारा इन क्षेत्रों पर नियंत्रण खो देता है. पीएलए (चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) की एक-एक इंच जमीन हड़पने की इस चाल को ‘सलामी स्लाइसिंग’ के नाम से जाना जाता है.

तवांग में 9 दिसंबर की झड़प के ठीक एक महीने बाद, लेह के एसपी पी.डी. नित्या द्वारा एक रिपोर्ट महानिदेशकों (डीजी) और महानिरीक्षकों (आईजी) के पिछले सप्ताह हुए वार्षिक सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी नई दिल्ली में हुई इस बैठक का हिस्सा थे.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

दिप्रिंट के पास रिपोर्ट की एक कॉपी भी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएलए ने ‘सबसे ऊंची चोटियों पर अपने सर्वश्रेष्ठ कैमरे लगाकर और हमारे बलों की आवाजाही की निगरानी करके डी-एस्केलेशन वार्ता में बफर क्षेत्रों का लाभ उठाया है.’

इसमें कहा गया है कि पीएलए बफर जोन में भी भारतीय बलों की आवाजाही पर आपत्ति जताता है, इसे ‘उनके’ ऑपरेशन का क्षेत्र होने का दावा करता है और फिर उन्हें और ‘बफर’ क्षेत्र बनाने के लिए वापस जाने के लिए कहता है. यह स्थिति, गालवान में वाई नाला के साथ हुआ, जहां भारतीय सेना को वाई नाला की देखरेख करने वाले उच्च जगहों पर हावी हुए बिना कैंप 01 में वापस जाने के लिए मजबूर होना पड़ा.


यह भी पढ़ें: ‘नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई’, जिसने तीर-कमान और भालों से किया था अंग्रेजी बंदूकों का मुकाबला


सुरक्षित रणनीति

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सेना ने भारत की ओर अग्रिम क्षेत्रों के पास नागरिकों और चरवाहों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो उनकी ‘सुरक्षित तरीके से लड़ने’ की रणनीति का संकेत देता है कि वे पीएलए को आपत्ति जताने का मौका देकर उसे नाराज नहीं करना चाहते हैं. जिन क्षेत्रों पर पहले विवादित होने का दावा किया जा रहा है.

इसमें कहा गया है, ‘सितंबर 2021 तक, जिला प्रशासन और सुरक्षा बलों के वरिष्ठ अधिकारी डीबीओ सेक्टर में काराकोरम पास (दौलत बेग ओल्डी से 35 किमी) तक आसानी से पेट्रोलिंग करेंगे. हालांकि, काराकोरम की ओर इस तरह के किसी भी मूवमेंट को रोकने के लिए दिसंबर 2021 से डीबीओ में ही सेना द्वारा चेक पोस्ट के रूप में प्रतिबंध लगाए गए थे क्योंकि पीएलए ने कैमरे लगाए थे और अगर पहले से सूचित नहीं किया गया तो वे तुरंत भारतीय पक्ष से मूवमेंट पर आपत्ति जताएंगे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण के इस रूप ने भारतीय पक्ष की मुखरता को प्रभावित किया है, और ऐसे क्षेत्र जो भारत के लिए बहुत सुलभ थे अब एक ‘अनौपचारिक बफर जोन’ बन गए.

इसमें आगे कहा गया है कि चांगथांग क्षेत्र (रेबोस) के घुमंतू समुदाय के लिए बिना बाड़ वाली सीमाएं चरागाह के रूप में काम कर रही हैं और समृद्ध चरागाहों की कमी को देखते हुए, वे पारंपरिक रूप से पेट्रोलिंग पॉइंट्स के करीब के क्षेत्रों में उद्यम करेंगे.

रिपोर्ट में कहा गया कि 2014 के बाद से, आईएसएफ द्वारा रेबोस पर चराई मूवमेंट और क्षेत्रों पर प्रतिबंध बढ़ा दिया गया है और इससे उनके खिलाफ कुछ नाराजगी हुई है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘सैनिकों को विशेष रूप से रेबोस के आंदोलन को रोकने के लिए भेस में तैनात किया जाता है, जिस पर पीएलए द्वारा आपत्ति जताई जा सकती है और इसी तरह डेमचोक, कोयुल जैसे सीमावर्ती गांवों में विकास कार्य होते हैं, जो पीएलए की प्रत्यक्ष इलेक्ट्रॉनिक निगरानी में हैं क्योंकि वे तुरंत आपत्तियां उठाते हैं.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में, इसके परिणामस्वरूप आजीविका का नुकसान हुआ है और सीमावर्ती गांवों की जीवन शैली में बदलाव आया है, जिससे प्रवासन हुआ है और समुदायों के भीतर भी घुसपैठ हुई है.

400 मीटर पीछे हटने से मिल सकती है शांति

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने रिपोर्ट में यह भी कहा कि कठोर जलवायु, मुश्किल रास्ते और क्षेत्र की लंबी दूरी जवानों और अधिकारियों के मनोबल और प्रेरणा को प्रभावित करती है.

रिपोर्ट में कहा गया कि क्षेत्र का भूभाग और दूरी जवानों को उनकी तैनाती के समय उलटी गिनती शुरू करने पर मज़बूर कर देता है और प्रत्येक यूनिट अपना काम जल्दी खत्म करके वापस मैदानी इलाकों में लौटना चाहती है. लंबी अवधि में, वे बंजर भूमि की रक्षा करने की उपयोगिता नहीं देखते हैं जब कोई आर्थिक गतिविधि नहीं की जा रही होती है इसलिए हम पर उनकी प्रेरणा और मनोबल को ऊंचा रखने की जिम्मेदारी है.’

एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ बातचीत के दौरान इसमें आगे कहा गया कि जो यूनिट फॉरवर्ड एरिया पर तैनात है, उन्होंने एसपी के साथ साझा किया कि अगर 400 मीटर पीछे हटकर 4 साल के लिए पीएलए के साथ शांति समझौता हो सकता है तो ऐसा करना गलत नहीं होगा.

(संपादन: अलमिना खातून)

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: सत्ताएं बदलती हैं, नियति नहीं बदलती’-‘बेस्ट’, ‘फिटेस्ट’ और ‘रिचेस्ट’ के तंत्र में बदल रहा हमारा गणतंत्र


share & View comments