Wednesday, 25 May, 2022
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UP में 5 साल में फर्जी बीमा दावों पर सिर्फ 18% की जांच पूरी, SC ने ‘सुस्ती’ के लिए SIT को लगाई फटकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में एक एसआईटी गठित की थी, जब मुआवजे के फर्जी दावों के मामले उसके संज्ञान में लाए गए. लेकिन जांच आगे न बढ़ पाने पर सुप्रीम कोर्ट को मामले में कड़ी फटकार लगानी पड़ी है.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश में बीमा दावों में फर्जीवाड़े को लेकर शिकायतों की जांच के लिए पांच साल पहले गठित एक विशेष जांच दल (एसआईटी) अब तक ऐसे मामलों के पांचवे हिस्से की भी जांच पूरी नहीं कर पाया है.

यह बात इस महीने तब पता चली जब सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को उन 28 वकीलों के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया जिनके नाम इस रिपोर्ट में शामिल थे. जबकि 2017 के बाद से ही सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कई बार आदेश दिए जाने के बावजूद यूपी बार काउंसिल इस मामले में कुछ करने से हिचकिचा रही थी.

अपने आदेश में शीर्ष कोर्ट ने एसआईटी को जांच पूरी करने में ‘सुस्ती’ और ‘लापरवाही’ बरतने के लिए कड़ी फटकार लगाई.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एम.आर. शाह की अगुवाई वाली की पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि 2016-17 में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद से इतना समय बीत जाने के बावजूद जांच अभी लंबित ही बताई जा रही है.’ आदेश से यह भी पता चला कि सिर्फ 18 फीसदी शिकायतों में जांच पूरी हो पाई है.


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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्यों गठित की एसआईटी?

एसआईटी जांच पांच साल पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश में शामिल डाटा दर्शाता है कि उसे संदिग्ध दावों की 1,376 शिकायतें मिली हैं, जिनमें केवल 246 मामलों की जांच की गई है.

हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2015 में एसआईटी का गठन किया था, जब फर्जी मुआवजे के दावों के मामले—जो वर्कमैन कंपेनसेशन एक्ट या मोटर वाहान दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण अधिनियम के तहत—उसके संज्ञान में लाए गए थे.

इन घटनाओं के संदर्भ में हाई कोर्ट ने अपने आदेश में 29 फर्जी दावों को उजागर किया था, जिन पर निचली अदालतें पहले ही फैसला सुना चुकी थी, और इनमें 1.23 करोड़ रुपये का मुआवजा जारी किया गया था. हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, उस समय छह करोड़ रुपये से अधिक के दावे निर्णायक फैसले के लिए लंबित थे.

शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने एक खास उद्देश्य के साथ एसआईटी का गठन किया था, जिसका काम था फर्जी दावों की जांच-पड़ताल करना, जिसकी वजह से बीमा कंपनियों को करोड़ों का नुकसान हुआ. फिर भी, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ‘एसआईटी ने न तो त्वरित कार्रवाई की और न ही जांच/इंक्वायरी ही पूरी की.’

एसआईटी ने ऐसे मामलों में 28 वकीलों समेत 166 व्यक्तियों को प्रथम दृष्टया दोषी पाया था जिसके बाद पुलिस ने अब तक 92 आपराधिक मामले दर्ज किए हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल करते हुए बीसीआई ने इन वकीलों को निलंबित कर दिया है. ये सभी वकील 55 मामलों में आरोपी हैं.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली जानकारी के मुताबिक कुल 92 मामलों में से पुलिस ने केवल 32 में चार्जशीट दायर की है. यहां तक कि जिन मामलों में चार्जशीट दायर भी हुई है, उनमें अदालतों की तरफ से कोई आरोप तय नहीं किया गया है.

इसके अलावा, एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में यह बात भी बताई है कि यूपी में विभिन्न बीमा कंपनियों के खिलाफ कुल 233 संदिग्ध दावों को या तो चूक के कारण या पड़ताल की जरूरत होने के कारण खारिज कर दिया गया है. इन फर्जी दावों के आधार पर मुआवजे के तौर पर भुगतान की जाने वाली कुल राशि 30 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान था, जिससे पता चलता है कि यह कथित घोटाला कितना बड़ा है. ये दावे उन 1,376 शिकायतों से अलग हैं, जिनकी एसआईटी जांच कर रही है.


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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, यूपी बार काउंसिल ने आदेश की धज्जियां उड़ाई

यह मामला दिसंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, लेकिन चार साल से अधिक समय बीत जाने तक इस पर कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हुई.

5 जनवरी 2017 को शीर्ष कोर्ट ने मामले पर संज्ञान लिया और तब उसने एसआईटी का गठन रद्द करने के एक याचिकाकर्ता के आग्रह को ठुकरा दिया. इसके बजाये, शीर्ष कोर्ट ने जांच का दायरा बढ़ा दिया और सभी राज्यों को मामले में पक्षकार के रूप में इसमें शामिल किया.

अपने 2017 के आदेश में अदालत ने बीमा दावों के फर्जी मामलों पर चिंता जताई की, उन्हें रोकने वाला एक तंत्र बनाए जाने की जरूरत पर बल दिया.

सभी हाई कोर्ट रजिस्ट्रारों को नोटिस जारी करके मोटर वाहन दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों से ऐसे मामलों की जानकारी लेने को कहा गया जिसमें प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता हो सकती है. शीर्ष कोर्ट ने तब यूपी बार काउंसिल और बीसीआई से उन अधिवक्ताओं के खिलाफ संभावित कार्रवाई के बारे में जानकारी मांगी थी, जिन्हें ऐसे कदाचार में लिप्त पाया गया था.

मामला सात बार सूचीबद्ध हुआ, लेकिन तब तक कोई सुनवाई नहीं हुई जब तक कि जस्टिस एम.आर. शाह की पीठ ने इस साल सितंबर में इस पर संज्ञान नहीं लिया. पीठ ने यूपी बार काउंसिल से दोषी वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही, यदि कोई हुई हो तो, पर स्थिति रिपोर्ट तलब की.

यह जानने के बाद कि राज्य बार काउंसिल ने उसके निर्देशों के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया है, सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में बीसीआई को इस मामले में उपयुक्त कदम उठाने और वकीलों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया. 16 नवंबर को अदालत ने एसआईटी को बीसीआई को उन वकीलों के नाम देने का आदेश जारी किए, जिनके कदाचार में लिप्त होने की बात जांच के दौरान सामने आई थी. तभी वकीलों की शीर्ष इकाई ने मामले में दखल दिया और निलंबन आदेश जारी किए.

कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 8 दिसंबर को होगी, जब वह मुआवजे के फर्जी दावों को दायर करने लिए अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों को समझने के लिए जांच अधिकारियों और बीमा कंपनियों का पक्ष सुनेगी.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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