Saturday, 13 August, 2022
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अखबारों में छपी श्रद्धांजलियों से पता चला कि दूसरी लहर में बड़ी संख्या में बुरी तरह प्रभावित हुए दिल्ली के पैसे वाले

मई में दिल्ली के दो बड़े अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्रों - टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स में श्रद्धांजलियों की बाढ़ दिखी. मई 2021 में कुल 870 शोक संदेश प्रकाशित किए गए, जबकि पिछले साल मई में यह 204 थे.

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नई दिल्ली: ‘न कोई विदाई के शब्द बोले गए, अलविदा कहने का समय तक नहीं मिला, इससे पहले कि हम समझ पाते, आप चले गए, केवल भगवान ही जानता है क्यों.’ ये 16 मई को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक शोक सन्देश है, जो एक दिवंगत व्यक्ति और उनकी मां को समर्पित है, जिनकी कोविड के कारण मृत्यु हो गई. सिर्फ 9 दिनों के भीतर दोनों चल बसे.

अखबार ने उस दिन 10 श्रद्धांजलियां प्रकाशित कीं. पिछले साल, इसी दिन, 2020 में सिर्फ एक श्रद्धांजलि प्रकाशित हुई थी. अखबारों में अधिक संपन्न लोग ही शोक संदेश प्रकाशित करवाते हैं. राष्ट्रीय राजधानी के दो प्रमुख अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित शोक संदेशों के विश्लेषण से पता चलता है कि कोविड की दूसरी लहर ने इस संपन्न वर्ग को भी काफी प्रभावित किया.

मई के शुरुआती हफ्तों में टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स में श्रद्धांजलियों की बाढ़ देखी गई.

मई 2021 में दोनों अखबारों में कुल 870 शोक संदेश प्रकाशित किए गए, जबकि पिछले साल मई में 204 थे.

समाचार पत्र में श्रद्धांजलि, जो न केवल दिवंगत को श्रद्धांजलि देने के लिए होते हैं, बल्कि किसी के निधन की घोषणा करने का काम भी करते हैं. ये विज्ञापन सस्ते नहीं होते हैं. हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अख़बार में ऐसे शोक संदेशों की कीमत 900 रुपये प्रति वर्ग सेंटीमीटर है और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 970 रुपये है. इस दर से, लगभग 24 वर्ग सेमी के सबसे छोटे आकार के शोक सन्देश की कीमत 20,000 रुपये से अधिक होगी.

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शोक सन्देश हमें क्या बताते हैं

मई 2021 में, द टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक दिन में औसतन 17 श्रद्धांजलि प्रकाशित कीं, जो पिछले दो सालों में सबसे अधिक है. इस बीच, हिंदुस्तान टाइम्स ने पिछले महीने एक दिन में 7 से 8 शोक संदेश प्रकाशित किए, जबकि पिछले साल इसी समयावधि में सिर्फ एक, दो या एक भी शोक सन्देश प्रकाशित नहीं हुआ था.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक शोक सन्देश के कॉर्डिनेटर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘ज्यादातर लोग व्यावसायिक पृष्ठभूमि (बिजनेस बैकग्राउंड) वाले लोग हैं, जो शोक संदेश और श्रद्धांजलि का विकल्प चुनते हैं, और कॉर्पोरेट व्यवसायों से उनके प्रसिद्ध कर्मचारियों के लिए बड़ी संख्या में घोषणाएं आती हैं.’

कॉर्डिनेटर ने यह भी कहा, ‘बाकी लोगों में वो आते हैं जो अपने माता-पिता या पति/पत्नी की मृत्यु की घोषणा करना चाहते हैं.’ ‘चूंकि व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के शोक सन्देश ज्यादा छपते हैं, इसलिए अधिकांश पुरुषों के सन्देश देखे जाते हैं. मृत्युलेख भी महंगे हैं, और हमने देखा है कि लोग पुरुषों के लिए ज्यादा खर्च करना पसंद करते हैं.’

मई 2021 के शोक संदेशों के विश्लेषण जिसमें उम्र और लिंग को सूचीबद्ध किया गया तो पता चला कि केवल 25 प्रतिशत महिलाओं के थे.

इन प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और सामुदायिक स्वास्थ्य के प्रमुख डॉ जुगल किशोर ने कहा कि उनके अनुभव में, महिलाओं की तुलना में अधिक पुरुष कोविड से चल बसे.

उन्होंने कहा, ‘इसके कई कारण हो सकते हैं – एक यह हो सकता है कि महिलाएं ज्यादातर घर तक ही सीमित रहती हैं. पुरुषों के पास बाहर का अधिक जोखिम होता है, इस प्रकार, अधिक मामले सामने आते हैं.’

दूसरा, ‘भले ही एक पुरुष और महिला एक ही समय में वायरस से संक्रमित हों, महिला पुरुष की तुलना में बहुत तेजी से ठीक हो जाती है. हम कह सकते हैं कि जहां तक इम्यून और एंटीबॉडी उत्पादन का संबंध है, महिलाओं का इम्यून पुरुषों की तुलना में अधिक मजबूत है.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘यह पुरुषों में धूम्रपान और पीने की आदतों के अधिक प्रचलित होने के कारण भी हो सकता है, जिससे अधिक बीमारियां हो सकती है.’


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एक असहनीय क्षति

संजीव जैन की तस्वीर 32 अन्य लोगों के बीच थी, जो 7 मई को द टाइम्स ऑफ इंडिया के दो-पृष्ठो में था. 26 अप्रैल को कोविड -19 के कारण उनका निधन हो गया था, लेकिन नौ लोगों के उनके परिवार को समय पर एक शोक सन्देश प्रकाशित करवाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा. वे सभी वायरस से संक्रमित थे, और उनमें से कुछ उस समय जिंदगी के लिए लड़ रहे थे.

संजीव की पत्नी रुचि जैन ने कहा, ‘ अपने पति को खोने के कुछ ही दिनों बाद मैंने अपनी सास को भी खो दिया, यह एक विनाशकारी समय है.’ जब उनमें 10 अप्रैल के आसपास लक्षण दिखना शुरू हुए, उस दौरान शहर में कोविड के मामले लगातार बढ़ रहे थे. हमारे लिए सबसे पहली चुनौती कोविड टेस्ट करवाने की थी. दूसरी चुनौती थी हालत बिगड़ने के बाद बिस्तर न मिलना. तीसरी समस्या हालात खराब होते देख और कुछ न कर पाने से उपजी लाचारगी थी.

संजीव 58 वर्ष के थे, उन्हें कोई बीमारी नहीं थी, और जब उनकी मृत्यु हुई तो उन्होंने कोविड टीके की एक खुराक ली थी.

रुचि ने कहा, ‘मेरे बेटे को इस छोटी सी उम्र में दो दाह संस्कार करने पड़े, जबकि उसे खुद कोविड था. हममें से आधे लोग वहां नहीं थे. आप अपने आप को क्या कहकर समझायेंगे?’ ‘सब कुछ हमारे हाथ से निकलता चला गया हम आसपास से आ रही खबरों और अनुभव से आहत हैं.’

दिल्ली के एक अन्य निवासी नरेश शर्मा ने कहा कि उनके भाई और भाभी दोनों की 30 अप्रैल और 1 मई को कोविड के कारण मृत्यु हो गई. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन ऑक्सीजन का स्तर गिरने के बाद उन्होंने दम तोड़ दिया.

उन्होंने कहा, सुरेश कुमार (69) और उनकी पत्नी शशि शर्मा (64) को दोनों टीके लग चुके थे, टीके की दूसरी डोज लेने के एक महीने बाद उनमें कोविड के लक्षण आए. शर्मा ने कहा, ‘वे दोनों अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती थे, जहां उस समय ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं थी. एक बार जब वे आईसीयू में गए, तो वे कभी वापस नहीं आए .’

एक व्यक्ति जिसने दिल्ली में अपने 12 रिश्तेदारों को कोविड से खो दिया, और उनमें से दो के लिए ही अखबार में शोक संदेश दिया, ने कहा, ‘हमें (अस्पताल के बिस्तर, ऑक्सीजन की) किसी भी कमी का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन हमें लगता है कि डॉक्टर की लापरवाही के कारण उनकी मृत्यु हो गई. मेरी पत्नी के माता-पिता दोनों ने भी मेरी मां की मृत्यु के एक दिन बाद अपनी जान गंवा दी, और मेरी चाची ने भी एक ही दिन में बीमारी के कारण दम तोड़ दिया. हमारे लिए ये एक बड़ा नुकसान है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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