नई दिल्ली: डिजिटल युग में न्यायिक मानकों पर ध्यान केंद्रित करते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की आलोचना की, जिन्होंने नशीले पदार्थों के एक मामले में अग्रिम ज़मानत देने से इनकार करते समय असली सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बजाय एक लॉ वेबसाइट के मोबाइल ऐप की पॉप-अप सूचना पर भरोसा किया था.
अपने 21 नवंबर के अंतरिम आदेश में जस्टिस सुमीत गोयल ने सभी न्यायिक अधिकारियों को चेतावनी दी कि वे मामलों का निर्णय लेते समय मोबाइल ऐप की सूचनाओं पर भरोसा न करें. उन्होंने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के सभी न्यायिक अधिकारियों को ऑनलाइन कानूनी जानकारी और तकनीक के जिम्मेदार और सावधान उपयोग पर प्रशिक्षण देने का निर्देश भी दिया.
यह मामला 11 जून 2025 को शुरू हुआ, जब कुरुक्षेत्र अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हेम राज ने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी राम जी को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया था.
8 अक्टूबर को, जब जस्टिस गोयल इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, उन्हें पता चला कि न्यायाधीश हेम राज ने ज़मानत देने से इनकार करते समय किसी ऑनलाइन पॉप-अप में आए सुप्रीम कोर्ट के कथित अवलोकन का हवाला दिया था, जिसके मूल फैसले का कोई पूरा विवरण या संदर्भ उपलब्ध नहीं कराया गया था.
इसके बाद न्यायमूर्ति गोयल ने न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगा और 8 अक्टूबर के अंतरिम आदेश में लिखा: “उपरोक्त के मद्देनज़र, संबंधित प्राधिकरण से इस अदालत के रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से इस मामले पर टिप्पणी मांगी जाए. उक्त अधिकारी अपनी टिप्पणी देते समय 11.06.2025 को दिए निर्णय में जिस सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया गया, उसकी प्रति भी 10 दिनों के भीतर संलग्न करें.”
10 अक्टूबर को जवाब देते हुए न्यायाधीश हेम राज ने कहा, “11.06.2025 को अग्रिम ज़मानत पर फैसला देते समय मुझे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पॉप-अप याद आया (निर्णय और पॉप-अप की प्रति संलग्न है). इसलिए मैंने राम जी बनाम राज्य हरियाणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांत लागू करते हुए ज़मानत अर्जी खारिज की.”
पॉप-अप में दावा किया गया था कि नशीले पदार्थों के मामलों में अग्रिम ज़मानत देना “बहुत गंभीर” और “असुना” है. हालांकि असली सुप्रीम कोर्ट के आदेश में सिर्फ इतना कहा गया था कि राज्य पहले से दी गई ज़मानत रद्द करने की याचिका पर विचार कर सकता है. इसमें निचली अदालतों के लिए कोई प्रतिबंध या मार्गदर्शन नहीं दिया गया था.
जस्टिस गोयल ने पाया कि न्यायाधीश हेम राज ने “सुप्रीम कोर्ट का पूरा आदेश पढ़ने की जहमत तक नहीं उठाई, न ही उसके मूल अर्थ को समझा”. 21 नवंबर के अपने अंतरिम आदेश में उन्होंने जोर दिया कि न्यायिक आदेश केवल सत्यापित कानूनी स्रोतों पर आधारित होने चाहिए. उन्होंने कहा कि सिर्फ प्रमाणित कानूनी सामग्री, जैसे रिपोर्ट किए गए फैसले और आधिकारिक प्रकाशन, ही न्यायिक निर्णयों का आधार बनना चाहिए.
आदेश में यह भी कहा गया कि तकनीक कानूनी जानकारी अपडेट रखने में सहायक है, लेकिन यह सही न्यायिक जांच और सत्यापन का विकल्प नहीं हो सकती. उन्होंने कहा, “इंटरनेट जानकारी का विशाल भंडार है, लेकिन उसकी प्रामाणिकता की जांच बेहद जरूरी है—खासकर जब निर्णय लोगों की ज़िंदगी पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं.”
उन्होंने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाए ताकि न्यायिक अधिकारी हेम राज के खिलाफ उचित कार्रवाई पर विचार किया जा सके.
इसके अलावा न्यायमूर्ति गोयल ने दोहराया कि पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के सभी न्यायिक अधिकारियों को ऑनलाइन स्रोतों के सही उपयोग पर संवेदनशील और प्रशिक्षित किया जाए. उन्होंने चेतावनी दी कि बिना जांचे-परखे डिजिटल सामग्री पर निर्भरता न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: दुबई एयर शो क्रैश पर हंगामा और नाराज़गी नहीं, समझदारी भरे विश्लेषण की जरूरत है
