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Wednesday, 12 June, 2024
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हरेकला हजब्बा का संतरे के ठेले से पद्मश्री तक का सफर एक विदेशी के पूछे सवाल से शुरू हुआ

हरेकला हजब्बा खुद कभी स्कूल नहीं गए, उन्होंने अपनी शुरुआत एक संतरा-विक्रेता के तौर पर की थी और अब उन्हें एक शिक्षा नायक के रूप में सराहा जाता है.

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मंगलुरु: 17 जून 2000— यह तारीख इस वर्ष के पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं में से एक हरेकला हजब्बा बेहद कृतज्ञता के साथ याद करते हैं. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘यह एक शनिवार था.’ साथ ही बताया कि कैसे इस दिन अपने गांव के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलने का उनका सपना हकीकत में बदलने लगा था.

1.33 एकड़ में फैला गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल उस प्रेम और श्रम का नतीजा है जिसे हजब्बा ने एक संतरा-विक्रेता के रूप में अपनी कमाई से शुरू करके हासिल किया है. खुद कभी स्कूल नहीं जा सके हजब्बा ने 31 साल पहले की एक घटना—जिसने न केवल उन्हें ‘शर्मिंदा’ किया बल्कि शिक्षा की अहमियत भी समझाई—के बाद इस रास्ते पर चलना शुरू किया था.

उन्होंने बताया, ‘1990 में जब मैं बस डिपो में संतरे बेच रहा था, एक विदेशी ने मुझसे संतरे की कीमत पूछी. मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. इस बात ने मुझे बहुत दुख पहुंचाया कि बेहद गरीबी और स्कूल तक पहुंच के अभाव में मैं पढ़ाई नहीं कर पाया. मैं चाहता था कि मेरे गांव के बच्चे जरूर पढ़ें.’

इसके आगे का सफर बहुत लंबा रहा लेकिन उसके अच्छे नतीजे भी सामने आए.

हजब्बा जिस दिन नंगे पांव ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री लेने पहुंचे थे, तब से ही उनके और उनके रिश्तेदारों के फोन लगातार बज रहे हैं और बधाइयां देने के साथ-साथ तमाम कार्यक्रमों के लिए उन्हें आमंत्रित किया जा रहा है.

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Harekala Hajabba receives the Padma Shri from President Ram Nath Kovind on 8 November | ANI
हरेकला हजब्बा 8 नवंबर को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से पद्म श्री प्राप्त करते हुए | एएनआई

मंगलुरु स्थित उनके गांव हरेकला और पास ही में न्यूपाडपु स्थित उनके सपनों को हकीकत में बदलने वाले स्कूल की ओर जाने वाले रास्तों पर बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए हैं जिनमें उनका पद्म पुरस्कार लेते फोटो लगा है.

इस तरह भरपूर सम्मान मिलना—हालांकि, इसमें कोई नई बात नहीं है—हजब्बा को अभिभूत करता है.

उनका कहना है, ‘यह मेरा पुरस्कार नहीं है. यह स्कूल के लिए है. मैं इतना बड़ा आदमी नहीं हूं.’ साथ ही जोड़ा इसे बनाने में सभी समुदायों और वर्गों के लोगों ने अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा, ‘यह स्कूल सैकड़ों उदार दानदाताओं और सरकारी सहायता का परिणाम है.’


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‘अक्षर संत’ हजब्बा

अपने आसपास तमाम गतिविधियों के बावजूद हजब्बा बेहद धैर्य के साथ अपने घर आने वाले सभी लोगों की प्रतीक्षा करते नजर आते हैं, उन्हें नारियल खिलाते हैं. नई दिल्ली रवाना होने से ठीक पहले उनके कोविड टेस्ट के लिए आई मेडिकल प्रोफेशनल की टीम के लिए ताजा नारियल काटते समय उनके बाएं अंगूठे में चोट लग गई थी. अभी भी उस अंगूठे पर सफेद पट्टी बंधी हुई है.

हरेकला में हजब्बा के आवास से सटा एक छोटा-सा कमरा संतरा-विक्रेता से ‘अक्षर संत’ या शिक्षा के क्षेत्र में एक संत बनने तक की उनकी यात्रा का गवाह है.

इस कमरे में तमाम यादगार चीजें रखी हुई हैं— हजारों प्रमाण पत्र, फोटो, पुरस्कार और सरकारों और निजी प्रतिष्ठानों की तरफ से उनके कार्यों को सरहाने के लिए प्रदान किए गए पुरस्कार. अब पद्म श्री भी इस कमरे की शान बढ़ा रह है.

हजब्बा ने कहा, ‘मैंने अपने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी इतने करीब से देखा. वे सब मेरे लिए बहुत शानदार था.’

उनका कहना है, ‘मेरे जैसा गरीब आदमी उनके सामने जाने और इतना प्रतिष्ठित पुरस्कार लेने के दौरान जूते कैसे पहन सकता था? मैंने उन्हें (अपने जूते) इसी कारण से उतार दिया था.’

उन्होंने बताया कि वह पहले भी कई जगहों, यहां तक कि विदेश जाकर भी सम्मान हासिल कर चुके हैं, लेकिन इस बार यह खास था.

पहाड़ी क्षेत्र न्यूपाडपु में स्थित स्कूल का परिसर हरियाली से घिरा हुआ है. जब हजब्बा आते हैं और जमीन पर लगे एक पत्थर पर बैठ जाते हैं, तो नीली यूनिफॉर्म पहने छात्रों का समूह उन्हें घेर लेते हैं, और बातचीत शुरू हो जाती है.

स्कूल से जुड़े लोग हजब्बा का बहुत ज्यादा आदर करते हैं.

गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल सामाजिक विज्ञान की टीचर सुशिम शेट्टी का कहना है, ‘हजब्बा ने गरीबी में जीवन काटा और आजीविका के लिए संतरे बेचे. फिर भी, वह जो कुछ बचा सकते थे उन्होंने बचाया, दानदाताओं से संपर्क किया, सहयोगियों को पैसे जुटाए, निर्वाचित प्रतिनिधियों से आग्रह किया, सरकार से इस गांव के ऐसे बच्चों के लिए एक स्कूल स्थापित करने की गुहार लगाई—जो उनके जैसे बेहद गरीब परिवारों से आते हैं.’ सुशिम यह स्कूल बनने के बाद से ही यहां काम कर रही हैं.

यह एक सरकारी स्कूल हो सकता है लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह हमेशा ‘हजब्बा का स्कूल’ ही रहेगा.

मदरसे में कक्षाओं से लेकर दो स्कूल भवनों तक

1990 की घटना के बाद दो सालों तक हजब्बा स्थानीय नेताओं से गांव में एक स्कूल स्थापित करने के अनुरोध के साथ संपर्क करते रहे, जबकि इस काम के लिए उन्होंने खुद अपनी कुछ कमाई भी बचाई.

तवाहा मस्जिद की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ‘क्या आपको वह मस्जिद दिख रही है? 2000 में हमारे तत्कालीन विधायक यू.टी. फरीद ने मस्जिद के मदरसा भवन में 28 छात्रों के लिए एक क्लास की स्थापना की थी.’

पहला टीचर धर्म स्थल ग्रामीण विकास परियोजना की तरफ से उपलब्ध कराया गया था, जो कर्नाटक के प्रसिद्ध धर्म स्थल मंजुनाथ मंदिर के डॉ. डी. वीरेंद्र हेगड़े द्वारा संचालित एक धर्मार्थ ट्रस्ट है. बाद में मैंगलोर शादीमहल संगठन की तरफ से और कर्मचारी उपलब्ध कराए गए, जो भवनों और इवेंट हॉल से जुड़े कारोबारी परिवार का वेंचर है.

अपनी बचत और दानदाताओं से जुटाई राशि की मदद से हजब्बा ने थोड़ी जमीन खरीदी और इसे न्यूपाडपू और आसपास के गांवों के बच्चों के लिए एक स्कूल बनाने के उद्देश्य से सरकार को सौंप दिया. उस समय न्यूपाडपु और हरेकला के बच्चों के लिए निकटतम स्कूल सात किलोमीटर दूर था.

2001 में एक इमारत का निर्माण हुआ और पहली से पांचवी कक्षा तक पढ़ाई होने लगी. अगले चार वर्षों के लिए हजब्बा ने आगे की कक्षाओं के लिए मंजूरी हासिल करने का प्रयास किया और 2005 में कक्षा 6 शुरू हुई. 2010 में हजब्बा के स्कूल में कक्षा 10 के छात्रों का पहला बैच बोर्ड परीक्षा में शामिल हुआ, फिर अचानक ही छात्रों की संख्या बढ़ी और जगह कम पड़ने लगी.

न्यूपाडपु स्कूल के हेडमास्टर लक्ष्मण पुडुवल ने बताया, ‘हजब्बा ने एक बार फिर दानदाताओं से संपर्क साधा, पैसे की व्यवस्था की और बगल में जमीन का एक टुकड़ा खरीदा, जिसके बाद इसका कुल क्षेत्रफल 1.33 एकड़ हो गया. नाबार्ड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम सहित विभिन्न दानदाताओं के फंड का इस्तेमाल एक हाई स्कूल भवन के निर्माण में किया गया था, जिसका उद्घाटन 14 जून 2012 को हुआ.’

हजब्बा की अपनी बेटी ने कक्षा 10 तक स्कूल में पढ़ाई की. अब, उनकी नातिन इसी स्कूल में कक्षा 1 में पढ़ रही है.

हर क्षेत्र के लोगों का साझा प्रयास

स्कूल परिसर में घूमते हुए हजब्बा दीवारों पर लगी तमाम पट्टिकाएं दिखाते हैं जिन पर दानदाताओं के नाम और उनके द्वारा दी गई राशि दर्ज है. इसमें सभी दानदाताओं के नाम दर्ज हैं, चाहे 2,000 रुपये की मदद करने वाला कोई व्यक्ति हो या फिर लाखों रुपये के फंड का उपकरणों के जरिये सहायता करने वाली कंपनियां. हजब्बा को छोड़कर सभी के योगदान को इसमें दर्शाया जाता है.

Hajabba points to plaques on the school premises that list the names of donors | Anusha Ravi Sood | ThePrint
हजब्बा स्कूल परिसर में सूची पट्टिका की ओर इशारा करते हैं, जिसमें दान दाताओं के नाम सूचीबद्ध हैं | अनुषा रवि सूद | दिप्रिंट

जब उनसे पूछा गया कि सूची में उनका नाम क्यों नहीं है, तो हजब्बा का कहना था, ‘यह सब उनकी वजह से है. मेरी वजह से नहीं.’

न्यूपाडपु में खड़ी ढलानों और चट्टानी इलाकों वाली पहाड़ियों के बीच टेढ़े-मेढ़े रास्ते हैं.

उबड़-खाबड़ इलाके को देखते हुए यहां स्कूल बनाना आसान नहीं था.

शेट्टी ने बताया, ‘हमें निर्माण शुरू करने से पहले जमीन को समतल करने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़े. हजब्बा ने जो हासिल किया है वह कोई मामूली बात नहीं है.’

कक्षाएं शुरू करने में मदद करने वाले पहले विधायक से लेकर स्कूल के धन आवंटित करने वाले मौजूदा जिला प्रभारी मंत्री कोटा श्रीनिवास पुजारी तक हजब्बा सभी को उनके योगदान का श्रेय देते हैं.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘मैं एक मुस्लिम हूं लेकिन सभी समुदायों के लोगों ने यह स्कूल बनाने में मदद की है. मैं 2015 तक फूस की झोपड़ी में रहता था. एक ईसाई दानदाता ने मेरा मौजूदा पक्का घर बनाया. हमारे मंदिरों, चर्चों, मस्जिदों और उनके संगठनों ने स्कूल के लिए आर्थिक मदद की है.’

हजब्बा ने बताया, ‘स्थानीय विधायक यू.टी. खादर, हमारे सांसद नलिन कुमार कतील, हमारे मंत्री पुजारी तक सभी नेता और हर कोई मदद के लिए आगे आया है.’

तमाम मतभेदों के बावजूद इतने सारे लोगों का एक साथ आना—खासकर सांप्रदायिक टकराव के लिए चर्चित दक्षिण कन्नड़ में—हजब्जा के सेवाभाव का एक स्पष्ट प्रमाण है.

इस शिक्षाविद् के लिए अपना अगला लक्ष्य पहले से ही तय है. हजब्बा ने कहा, ‘मैं अब केवल एक प्री-यूनिवर्सिटी कालेज बनाना चाहता हूं. मैं इसे बनाने के लिए नागरिकों और सरकार से मदद करने का अनुरोध करता हूं.’

शेट्टी ने कहा कि वे ‘ज्यादा से ज्यादा बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. उन्होंने कहा, ‘स्कूल तक न तो सड़कें हैं और न ही बेहतर कनेक्टिविटी. हमारे स्टूडेंट पैदल स्कूल आते-जाते हैं क्योंकि बसें नहीं हैं. अगर इसे ठीक किया जा सके तो और अधिक छात्रों—खासकर छात्राओं के लिए स्कूल आना मुमकिन हो पाएगा.’

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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