Saturday, 20 August, 2022
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रेस्तरां जाना कम, कपड़े भी कम खरीदे लेकिन नॉन-वेज खूब खाया: कोविड ने भारतीयों के खर्च करने की आदतों को कैसे बदला

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ खाद्य और घरेलू जरूरतों का सामान ऐसा था जिसमें पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में महामारी के पहले वर्ष 2020-21 में सकारात्मक वृद्धि दर देखी गई.

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नई दिल्ली: दो साल पहले कोविड-19 महामारी ने भारत में अपने पैर पसारे थे. तब से इसने हमारे जीवन को बदल दिया. हम सभी जानते हैं कि कैसे लॉकडाउन ने लोगों की रोजी-रोटी पर असर डाला, अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया और कितने लोगों को अपने घरों में बंद रहने के लिए मजबूर कर दिया.

तो क्या एक अरब भारतीयों के खर्च करने के व्यवहार और तौर-तरीकों पर भी महामारी का प्रभाव पड़ा, जो तकनीकी रूप से अर्थव्यवस्था को संचालित करता है?

बिल्कुल! वित्त वर्ष 2020-21 में खपत के संबंध में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के हाल ही में जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारतीयों ने रेस्तरां, होटल, शराब, तंबाकू और कपड़ों पर कम खर्च किया लेकिन खाने पर खासकर अंडे, सी-फूड और मांस पर अधिक खर्च किया है.

आकड़े बताते हैं कि भारतीयों ने कोल्ड ड्रिंक और जूस पीना कम किया लेकिन अपने सुबह के चाय या कॉफी के प्याले में कंजूसी नहीं की.

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संख्या हमें किसी देश में सभी आर्थिक गतिविधियों की मात्रा के बारे में बताती है तो वहीं भारत के सकल घरेलू उत्पाद का एक महत्वपूर्ण घटक- निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) से पता चलता है कि लोग वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग पर कितना खर्च कर रहे हैं.

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31 मई को MoSPI ने राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी के आकड़े जारी किए थे. इसमें 2020-21 (संशोधित अनुमान) के लिए खपत के आंकड़ों की मैपिंग की गई थी और विस्तार से बताया गया कि भारतीयों ने किन चीजों पर कितना पैसा खर्च किया. ये संख्या प्रत्येक खुदरा उद्योग में हुए परिवर्तन की परिमाण को मापती है.

डेटा के मुताबिक, सिर्फ खाद्य और घरेलू जरूरतों की चीजें ही ऐसी थीं जिनमें पिछले गैर-महामारी वाले वित्तीय वर्ष (2019-20) की तुलना में सकारात्मक वृद्धि दर देखी गई, जबकि अन्य सभी वस्तुओं पर किए गए खर्च में गिरावट दर्ज की गई.


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रेस्टोरेंट और होटल के खर्च में बड़ी कटौती

MoSPI के आंकड़ों के अनुसार, रेस्तरां, होटल, कपड़े, जूते, टिकाऊ और अर्ध-टिकाऊ उपभोक्ता सामान, ट्रांसपोर्टेशन, शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थ फर्निशिंग और मनोरंजन जैसे उपभोक्ता क्षेत्र महामारी के साल में सबसे ज्यादा प्रभावित रहे.

2019-20 की तुलना में 2020-21 में इन क्षेत्रों के विकास में 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई. इसी अवधि में इन क्षेत्रों में कुल खपत में 6 प्रतिशत की गिरावट आई थी.

2020-21 में भारतीयों ने रेस्तरां और होटलों पर 92,671 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि उन्होंने पिछले वर्ष इसके दोगुने से भी अधिक दो लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे.

इस क्षेत्र में खपत औसतन 8.7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही थी, जिसमें महामारी से पहले के पांच वर्षों 2015-16 से 2019-20 में औसत खर्च 1.7 लाख करोड़ रुपये था.

महामारी ने पर्यटन उद्योग को एक बड़ा झटका दिया और नतीजन कई होटल बंद हो गए. रेस्तरां में लगाए गए कोविड प्रतिबंधों के चलते उनके ग्राहकों में भी भारी गिरावट आई है.

MoSPI के आंकड़ों से पता चलता है कि औसतन (2015-20) में रेस्तरां और होटल क्षेत्र में भारत के घरेलू खपत खर्च का लगभग 2.4 फीसदी हिस्सा था, जो कि महामारी के दौरान सिर्फ आधा यानी 1.2 प्रतिशत रह गया था.

Credit: Prajna Ghosh | ThePrint
ग्राफिक: प्रज्ञा घोष/दिप्रिंट

फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष गुरबख्श सिंह कोहली के अनुसार, उद्योग ने पहले महामारी वर्ष के दौरान 1.4 लाख करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया था.

कोहली ने दिप्रिंट को बताया, ‘जीडीपी आंकड़ों के उपभोग डेटा ने हमारे अनुमानों की पुष्टि की है और उद्योग को संकट से बाहर निकालने के लिए खास राहत उपायों के लिए सरकार से हमारे निरंतर आह्वान को भी सही ठहराया’.

उन्होंने कहा, ‘इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुए नुकसान को देखते हुए उद्योग को सरकार से होस्पिटैलिटी और संबद्ध गतिविधियों का सहारा देने के लिए मजबूत उपायों की उम्मीद थी.’


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कपड़े, जूते-चप्पल पर खर्च में 22 फीसदी की गिरावट

भारतीयों ने रेस्टोरेंट और होटलों के अलावा कपड़ों पर भी कम पैसा खर्च किया.

2019-20 में भारतीयों ने कपड़े और जूते पर लगभग 4.43 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. साल 2020-21 में इसमें 22.2 फीसदी की गिरावट आई. इन वस्तुओं की खपत पहले से ही 1.3 प्रतिशत (MoSPI डेटा के आधार पर गणना) की धीमी गति से बढ़ रही थी और महामारी के बाद यह गति और भी धीमी हो गई.

महामारी ने लोगों के बाहर जाने, घूमने और यात्रा करने पर ब्रेक लगा दिया था. इसलिए भारतीयों का ट्रांसपोर्टेशन पर होने वाला खर्च काफी हद तक कम हो गया. 2020-21 में उपभोक्ताओं ने परिवहन पर 12.27 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. यह 2019-20 (15.23 लाख करोड़ रुपये) की तुलना में 19.4 प्रतिशत की गिरावट थी.

लोगों ने कम पी शराब

महामारी के साल में शराब, तंबाकू और नशीले पदार्थों की खपत में लगभग 16 प्रतिशत (कुल) की गिरावट देखी गई. 2019-20 में भारतीयों ने इन वस्तुओं पर 1.60 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे, जो 2020-21 में घटकर 1.35 लाख करोड़ रुपये रह गए.

इन सबमें शराब पर खर्च में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जो 2019-20 में 41,700 करोड़ रुपये से घटकर 2020-21 में 30,000 करोड़ रुपये हो गई– लगभग 26.8 प्रतिशत की गिरावट.

तंबाकू पर खर्च में 17.2 प्रतिशत और नशीले पदार्थों में 2.2 प्रतिशत की गिरावट आई.

फर्निशिंग पर खर्च में 13.4 फीसदी की गिरावट आई. तो वहीं 2019-20 की तुलना में मनोरंजन में 11 प्रतिशत और संचार में 6 प्रतिशत की गिरावट देखी गई.

मिसलेनियस गुड्स और सर्विस में आमतौर पर भारत के कुल घरेलू उपभोक्ता खर्च का 16 प्रतिशत हिस्सा होता है. इस हिस्से में पर्सनल केयर यानी नहाने के साबुन से लेकर पार्लर/सैलून जाना, गहने, घड़ियां और सूटकेस आदि पर किया गया खर्च शामिल होता है.

MoSPI के आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में पर्सनल केयर वस्तुओं की खपत में 4 फीसदी की गिरावट आई.


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तो फिर कहां किया ज्यादा खर्च

सरकार के उपभोग के आंकड़ों के अनुमानों से पता चला है कि महामारी के दौरान गैर-आवश्यक वस्तुओं के उलट खाने और घरेलू जरूरतों जैसी जरूरी वस्तुओं पर खर्च बढ़ गया. गैर-आवश्यक वस्तुएं वह हैं जिन पर होने वाले खर्च को रोका या फिर स्थगित किया जा सकता है.

खाद्य और पेय पदार्थों (गैर-मादक) पर उपभोक्ता खर्च– समग्र क्षेत्र– महामारी वर्ष के दौरान 3.9 प्रतिशत से बढ़कर 2020-21 में 23.5 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो 2019-20 में 22.6 लाख करोड़ रुपये था.

हालांकि खाने पर खर्च बढ़ गया लेकिन इसके साथ-साथ गैर-मादक पेय पर उपभोक्ता खर्च में 16 फीसदी की कमी आई. और यह 2020-21 में 30,000 करोड़ रुपये हो गया. जबकि 2019-20 में यह खर्च 35,000 करोड़ रुपये था.

नॉन अल्कोहॉलिक बिवरेज कैटेगरी में सोफ्ट ड्रिंक, मिनरल वाटर, फलों और सब्जियों के जूस पर उपभोक्ता खर्च लगभग 28 प्रतिशत कम हो गया (जो 2019-20 में 21,000 करोड़ रुपये था, 2020-21 में यह 15,000 करोड़ रुपये रह गया)

चाय, कॉफी और कोको पर खर्च में मामूली 0.1 फीसदी की गिरावट आई.

MoSPI के आंकड़ों के मुताबिक, महामारी से पहले खाद्य और पेय पदार्थों पर उपभोक्ता खर्च औसतन 6.52 प्रतिशत सालाना (2015-20) की दर से बढ़ रहा था.

महामारी वर्ष के दौरान खाद्य उत्पादों में तेल और वसा के खर्च (18.6 प्रतिशत) में सबसे तेज उछाल दर्ज किया गया. जिन खाद्य उत्पादों को अन्यत्र वर्गीकृत नहीं किया गया (ज्यादातर मसाले) उनपर 9.4 फीसदी अधिक खर्च किया गया.

महामारी के दौरान पशु उत्पादों पर उपभोक्ता खर्च में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई. 2020-21 में अंडों पर खर्च बढ़कर 22,500 करोड़ रुपये हो गया, जो 2019-20 में 21,000 करोड़ रुपये था. मछली और सी-फूड पर 4.8 फीसदी का उछाल देखने को मिला. यह खर्च पहले 1.27 करोड़ रुपये खर्च था जो बढ़कर 1.34 करोड़ रुपये हो गया, जबकि मांस पर 2020-21 में खर्च 4.4 प्रतिशत बढ़ा.

इन सभी मदों की वृद्धि दर इस बात पर आधारित है कि 2011-12 में इनकी कीमत कैसी थीं. इसलिए इन वस्तुओं पर खर्च वर्तमान मुद्रास्फीति से प्रभावित नहीं था.

 (इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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