Wednesday, 25 May, 2022
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विशेषज्ञों की राय में कृषि कानूनों की वापसी आम सहमति बनाने का एक मौका, सुधारों पर ब्रेक बुरा विचार होगा

कृषि कानूनों को निरस्त करने के साथ-साथ प्रधानमंत्री ने कृषि से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए एक समिति के गठन की भी घोषणा की है. विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श वाला रुख अपनाने से बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं.

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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुक्रवार को तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा किए जाने के बाद से देश के कृषि क्षेत्र में उन सुधारों को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है जिन्हें सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ही ये कानून लाए गए थे.

पिछले साल इन तीनों कृषि कानूनों को सैद्धांतिक तौर पर भारतीय कृषि क्षेत्र की वास्तविक क्षमताओं को उपज की मार्केटिंग, कांट्रैक्ट फार्मिंग और खाद्य प्रसंस्करण आदि तमाम पहलुओं के लिहाज से किसी भी नियंत्रण से मुक्त करने और स्थिरता लाने के उद्देश्य से लाया गया था.

प्रधानमंत्री ने भविष्य में कृषि मुद्दों के समाधान के लिए एक समिति के गठन की घोषणा की है. इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, किसानों के प्रतिनिधियों के साथ कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्री शामिल होंगे.

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संघीय तरीके से व्यापक आम सहमति और स्वीकार्यता बढ़ाकर इन सुधारों को आगे बढ़ाने का मौका मिलेगा. हालांकि, अन्य लोगों के नजर में कानूनों को रद्द करना एक राजनीतिक जुआ है जो भविष्य में आगे बढ़ने में बाधा बन सकता है.

पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव और कृषि-अर्थशास्त्री टी. नंद कुमार ने दिप्रिंट से कहा, ‘समिति से सुधारों पर व्यापक स्तर पर विचार करने और राज्यों के साथ गहन विचार-विमर्श करने के लिए कहा जाना चाहिए. विचार-विमर्श की लंबी प्रक्रिया से ही यह पता चलेगा कि राज्यों और केंद्र को अपने-अपने स्तर पर क्या करना है.’

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उन्होंने कहा, ‘बुद्धिमानी तो इसी में है कि इस सबके दौरान ज्यादा संघीय तरीका अपनाया जाए क्योंकि हर राज्य की अलग समस्या और अलग-अलग राजनीतिक विचार हैं. उदाहरण के तौर पर पंजाब में कृषि उपज बाजार समितियां (एपीएमसी) बहुत मायने रखती हैं लेकिन अन्य राज्य अधिक हाइब्रिड मॉडल पसंद करते हैं (जहां कुछ उत्पाद एपीएमसी के बाहर बेचे जा सकते हैं). नगद लाभ हस्तांतरण जैसे अन्य सुधारों को राज्यों के परामर्श से किया जा सकता है.’

कुमार ने कहा, ‘अगले तीन से छह महीने की अवधि में मंथन चलता रहेगा और उसके बाद ही चीजें कुछ स्पष्ट होंगी.’

उन्होंने कहा, ‘प्रस्तावित समिति जीएसटी काउंसिल की तरह राज्य और केंद्र सरकारों के बीच एक सलाहकार मंच बन सकती है- जैसा कि मैं और कुछ अन्य लोग काफी समय से चाहते रहे हैं. अगर चीजों को आसानी से सुलझाने की कोशिश की जाए तो विचार-विमर्श के जरिये बहुत सारी समस्याओं का समाधान निकल सकता है. इसके बाद सरकार को सिफारिशें सौंपी जा सकती हैं, जिसमें बार-बार छोटे-मोटे फेरबदल करने की जरूरत नहीं रहेगी. एक नई शुरुआत के लिए यह समिति बनाना एक अच्छा विचार है, जिसमें व्यापक स्तर पर आम सहमति बनाई जा सकेगी.’


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विविध संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का कृषि संकट विविधता से भरा है, जिसमें राज्यों और क्षेत्रों के हिसाब से काफी भिन्नता है और अधिक गहन परामर्श की प्रक्रिया इसलिए और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है.

पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव और इस समय इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) में सीनियर फेलो सिराज हुसैन ने कहा, ‘कृषि क्षेत्र काफी जटिल है और इसके मामले में राज्यों में कोई समानता नहीं है. किसानों की आय के 2018-19 के आंकड़े बताते हैं कि ओडिशा और झारखंड में किसान परिवारों की स्थिति बहुत खराब है- वे हर माह लगभग 5,000 रुपये ही कमा रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘कृषि नीतियों को स्थानीय स्थिति के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, यही वजह है कि संविधान ने कृषि को राज्य का विषय बनाया है.’

उन्होंने कहा कि आगे का रास्ता ‘ऐसा होना चाहिए जो राज्य सरकारों को ऐसी नीतियां बनाने में सक्षम बनाए जो पारिस्थितिकी के लिहाज से उनकी जरूरतों के प्रति संवेदनशील हों.’

हुसैन ने कहा, ‘मूल हरित क्रांति वाले राज्यों में, जो अब पानी की कमी का सामना कर रहे हैं, केंद्र को धान की जगह फसल विविधीकरण के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना चाहिए.’

कुछ विशेषज्ञ कानूनों की वापसी को एक राजनीतिक जुआ करार देते हैं, यह देखते हुए कि कृषि सुधारों का भविष्य आगामी राज्य चुनावों पर निर्भर हो गया है.

कृषि अर्थशास्त्री, आईसीआरआईईआर में कृषि के चेयर प्रोफेसर और कृषि लागत और मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक गुलाटी ने कृषि कानूनों को रद्द किए जाने को ‘मोदी सरकार का एक रणनीतिक कदम करार दिया, क्योंकि इसकी घोषणा एक खास चुने हुए दिन और उत्तर प्रदेश और पंजाब में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले की गई है.’

उन्होंने कहा, ‘कृषि क्षेत्र में कुछ रुकेगा तो नहीं और खेती-बाड़ी जिस तरह पिछले 10-15 वर्षों से 3.5 प्रतिशत की वृद्धि दर से चल रही है, चलती रहेगी. निजी निवेश से अगले तीन-पांच वर्षों में होने वाले सभी संभावित लाभ जरूर ठप हो जाएंगे.’

कुमार ने आगे कहा कि सुधारों को पूरी तरह छोड़ देना एक बुरा विचार होगा.

उन्होंने कहा, ‘कृषि-विपणन जैसे सुधारों के लिए मॉडल कानून पहले से मौजूद हैं, इसलिए इसे राज्यों के माध्यम से पारित किया जा सकता है. हालांकि, बाजार सुधार धीमे पड़ जाएंगे, लेकिन इन्हें पूरी तरह से छोड़ देना एक बुरा विचार होगा.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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