Saturday, 4 December, 2021
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डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है रुपया, अभी और बढे़गी महंगाई : विशेषज्ञ

प्रोफेसर और अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते है, 'जब रुपया कमजोर होता है तो महंगाई बढ़ती है. इससे बाहर से आने वाला माल महंगा हो जाएगा, जिसकी होलसेल प्राइस पहले से ही ज्यादा है और ज्यादा हो जाएगी.'

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नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट जारी है. यह 22 नवंबर से आज 24 नवंबर तक गिरी है, जिसके अभी और जारी रहने के संकेत हैं. आज यह प्रति एक डॉलर के मुकाबले 12 पैसे कमजोर हुआ है. विशेषज्ञ इसे कोविड लॉकडाउन के बाद अमेरिका और यूरोप के देशों में अर्थव्यवस्था के तेजी से उबरने और भारतीय अर्थव्यवस्था के अभी उबर न पाने को वजह मानते हैं.

गौरतलब है कि रुपया 22 नवंबर से लगातार कमजोर हो रहा है. 22 नवंबर को यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पांच पैसे कमजोर होकर 74.35 पैसे पर आ गया और शाम तक यह 12 पैसे तक कमजोर हुआ और यह 74.42 प्रति डॉलर रहा. हालांकि यह शाम तक 9 पैसे तक रह गया.

वहीं 23 नवंबर को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इसमें बड़ी गिरावट हुई और यह 16 पैसे टूटकर 74.55 प्रति डॉलर पर आ गया. 23 नवंबर को शाम तक यह कमजोरी 4 पैसे तक रही और 74.43 प्रति डॉलर रहा. आज यानि 24 नवंबर को फिर 12 पैसे कमजोर हुआ है.

इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज माल्कॉम आदिसेशैया के चेयर प्रोफेसर और अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने दिप्रिंट से कहा, ‘भारत की अर्थव्यवस्था अभी लॉकडाउन और पैंडेमिक से निकल रही है, हालांकि पहले से बेहतर हुई है लेकिन कमजोरी जारी है, उधर अमेरिका की अर्थव्यवस्था काफी तेज बढ़ रही है. वहां बेरोजगारी काफी कम हो गई है. यह एक कारण हो सकता है कि रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है.’

इसके कमजोर होने के असर को लेकर उनका कहना है कि, ‘जब रुपया कमजोर होता है तो महंगाई बढ़ती है. इससे बाहर से आने वाला माल महंगा हो जाएगा, जिसकी होलसेल प्राइस पहले से ही ज्यादा है और ज्यादा हो जाएगी.’

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प्रोफेसर अरुण कहते हैं कि, ‘एक तरफ तो बाहर से आने वाला माल जैसे कच्चे तेल का दाम महंगा हो गया है, इसकी वजह अमेरिका, यूरोप में रिवाइवल है जिससे वहां डिमांड बढ़ी है और कमोडिटीज के दाम बढ़ गये हैं. लिहाजा कच्चे तेल जैसी चीजों के दाम बढ़ने से रुपया अभी और कमजोर होगा.’


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कच्चे तेल से लिंक

प्रोफेसर अरुण कुमार रुपये के कच्चे तेल से लिंक होने को लेकर कहते हैं कि,  ‘जैसे-जैसे अमेरिका, यूरोप की अर्थव्यवस्था रिकवर करने लगी तो कमोडिटी के दाम बढ़ गये. मसलन कच्चे तेल के दाम, मेटल्स आदि के. अब कच्चा तेल 82 डॉलर के पार पहुंच गया है जो कि फिलहाल घटकर यह 80 डॉलर प्रति बैरल नीचे बना हुआ है. यही पिछले साल इस समय 12-13 रुपये प्रति डॉलर था, अब यह 7-8 गुना बढ़ गया है.’

वहीं कच्चे तेल के दामों को रुपये के गिरने से जोड़ते हुए ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने दिप्रिंट से कहा, ‘जब कच्चा तेल ज्यादा खरीदा जाता है तो तेल की कीमतें ज्यादा होती हैं और फिर आपको ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं, इससे रुपया कमजोर हो जाता है.’

रुपया कमजोर होने से निर्यात बढ़ेगा

अरुण कुमार कहते हैं, ‘रुपये के कमजोर होने से दूसरी तरफ हमारे एक्सपोर्ट्स बेहतर करेंगे. क्योंकि रुपया कमजोर होने से बाहर वालों के लिए हमारा माल सस्ता हो जाता है, लिहाजा हमारा एक्सपोर्ट बढ़ जाएगा. एक्सपोर्ट बढ़ने से फॉरेन एक्सचेंज (विदेशी मुद्रा) की हमारी समस्या तो कम होगी, लेकिन हमारा इंपोर्ट कहीं ज्यादा बढ़ रहा है तो हमारा ट्रेड डेफिसिट (घाटा) बना हुआ है. ट्रेड डेफिसिट होने से हमारा रुपया और कमजोर हो जाएगा.’

उनका कहना है कि इससे महंगाई बढ़ेगी. गरीब लोगों को इसकी मार ज्यादा झेलनी पड़ेगी, जिनकी नौकरी जा चुकी है उनके लिए मुसीबत और ही बढ़ेगी.

गौरतलब है कि इस समय सब्जियों और खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. टमाटर की कीमत 80-100 रुपये तक पहुंच गई है, वहीं खाद्य तेल के दाम 234 रुपये से 250 रुपये तक पहुंच गये हैं.

प्रोफेसर अरुण कहते हैं कि इन सब वजहों से महंगाई बढ़ गई है. लेकिन कंपनियां प्रॉफिट बहुत कमा रही हैं. स्टॉक मार्केट की कंपनियों का प्रॉफिट बहुत बढ़ गया है.

शेयर बाजार का ऊपर जाना

वहीं स्टॉक मार्केट लेकर उनका कहना है कि पिछले साल अप्रैल के मुकाबले स्टॉक मार्केट लगभग डबल हो गया है. अब यह करीब 60 हजार के करीब पहुंच गया है. यह बहुत ज्यादा स्पेकुलेशन के साथ बढ़ रहा है, जो प्राइस अर्निंग रेसियो होता है वह बहुत ज्यादा चढ़ गया था, जिससे यह बढ़ रहा है जो कि सस्टेनेबल (टिकाऊ) नहीं है.’

कुमार कहते हैं, ‘शेयर मार्केट में बहुत सारे अमीर लोगों ने पैसा कमा लिया है, लेकिन असंगठित क्षेत्र पिट रहा है. क्योंकि शेयर मार्केट में 4-5 प्रतिशत लोग ही निवेश करते हैं. उन्हें तो फायदा हुआ लेकिन बाकी 95 फीसदी को नुकसान हुआ है.’

दूसरी तरफ हमारा जो कॉर्पोरेट सेक्टर है उसकी संख्या 0.1 प्रतिशत के आसपास ही है. कुछ लाख लोग ही इसे कंट्रोल करते हैं. इससे असामनता बढ़ रही है. अभी और बढ़ी है जो कि जारी रह सकती है.


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