Wednesday, 1 February, 2023
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क्यों राज्यों को जल्द से जल्द और अधिक खर्च करना शुरू करने की जरूरत है

आरबीआई की रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 22-23 में राज्यों के पूंजीगत व्यय में 38.4% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, लेकिन वास्तविक खर्च में अप्रैल-अक्टूबर 2022 में साल-दर-साल केवल 0.9% की वृद्धि दर्ज की गई.

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भारतीय रिजर्व बैंक ने सोमवार को राज्यों की वित्तीय स्थिति पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट से पता चलता है कि महामारी से प्रभावित साल के बाद से राज्यों के वित्तीय प्रदर्शन में स्पष्ट बदलाव देखा गया है.

सकल राजकोषीय घाटा 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद के 4.1 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 3.4 प्रतिशत होने का अनुमान है, हालांकि इसमें व्यापक अंतर-राज्य भिन्नताएं हैं. गुजरात ने सकल घरेलू उत्पाद के 1.7 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे का बजट रखा है, जबकि हिमाचल प्रदेश ने 2022-23 के लिए अपने घाटे का बजट 5 प्रतिशत रखा है.

यदि देखें तो राज्यों का अनुकूल राजकोषीय दृष्टिकोण अधिक से अधिक राजस्व की प्राप्तियां कर उसी अनुपात में राज्यों को हस्तांतरित किया है.

राज्यों के माल और सेवा कर (एसजीएसटी) से स्थिर संग्रह और प्रत्यक्ष करों में अधिक तेजी के कारण केंद्र सरकार से कर विचलन ने कर राजस्व की वृद्धि में योगदान दिया है. जबकि कुछ राज्यों द्वारा पूंजीगत व्यय के आवंटन में बड़ी उछाल देखी गई है, चालू वर्ष के पहले आठ महीनों में पूंजीगत व्यय पर वास्तविक व्यय ठहरा है और इसमें तेजी लाने की आवश्यकता है.

राज्यों ने वर्ष की पहली छमाही में अपने बजटीय राजकोषीय घाटे के कम अनुपात को समाप्त कर दिया है. यह उन्हें चालू वर्ष के शेष महीनों में खर्च करने के लिए अधिक राजकोषीय स्थान देता है. कुल मिलाकर, राज्यों के राजकोषीय दृष्टिकोण में महामारी के बाद से सुधार हुआ है, आरबीआई की रिपोर्ट चिंता के कुछ क्षेत्रों पर प्रकाश डालती है.

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पूंजीगत व्‍यय के लिए अधिक आवंटन, वास्तविक खर्च में तेजी लाने की जरूरत

2021-22 में राज्यों द्वारा पूंजीगत व्यय में 31.7 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की गई. राजस्व संग्रह में मजबूत वृद्धि के साथ-साथ केंद्र सरकार से बढ़े हुए हस्तांतरण ने राज्यों को पूंजीगत व्यय में तेजी लाने के लिए स्थान दिया है.

चालू वर्ष (2022-23) में, राज्यों का पूंजीगत व्यय 2021-22 के अंतरिम खातों की तुलना में 38.4 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है. हालांकि, अप्रैल-अक्टूबर 2022 में राज्यों द्वारा वास्तविक पूंजीगत व्यय में साल-दर-साल 0.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

पूंजीगत व्यय में अंतर-राज्य भिन्नताएं हैं. उदाहरण के लिए, चालू वर्ष के लिए, उत्तर प्रदेश ने पूंजीगत व्यय पर 1.23 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा था. यह कुल बजट व्यय का 21 प्रतिशत है और यह राज्यों द्वारा पूंजीगत व्यय पर किए गए उच्चतम आवंटनों में से एक है.

हालांकि, नवंबर तक खर्च की गई वास्तविक राशि 36,000 करोड़ रुपये से कम है. इसका अर्थ यह है कि बजटीय पूंजीगत व्यय का लगभग 29 प्रतिशत व्यय किया जा चुका है.

इसके विपरीत, महाराष्ट्र ने कैपेक्स पर अपने कुल व्यय का केवल 14 प्रतिशत आवंटित किया है. पहले आठ महीनों (अप्रैल-नवंबर, 2022-23) में, महाराष्ट्र में आश्चर्यजनक रूप से राजकोषीय अधिशेष है, फिर भी कैपेक्स पर खर्च इस अवधि में बजटीय राशि का सिर्फ 27 प्रतिशत है. यह देखते हुए कि राज्य के पास राजकोषीय अधिशेष है, यह वांछनीय होता अगर यह कैपेक्स पर फ्रंट-लोडेड खर्च होता. पंजाब और केरल कैपेक्स के लिए सबसे कम आवंटन वाले राज्य हैं.

Graphic by Ramandeep Kaur | ThePrint
चित्रण: रमणदीप कौर | दिप्रिंट

सरकार ने पूंजी निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता की योजना शुरू की. इसके तहत परियोजनाओं के लिए 1.07 लाख करोड़ रुपये की पूंजी आवंटित की गई है और राज्यों को 50 साल के ब्याज मुक्त ऋण के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है. दिसंबर 2022 तक, 77,109 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं लेकिन योजना के तहत पात्र राज्यों को 42,000 करोड़ रुपये से कम जारी किए गए हैं.

जबकि राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे दूसरी छमाही में पूंजीगत व्यय बढ़ाएंगे, पिछले वर्षों के व्यय पैटर्न से पता चलता है कि वे पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद बजटीय व्यय की पूरी राशि खर्च नहीं करते हैं.

राज्यों के पास पूंजीगत व्यय को तेजी से बढ़ाने की क्षमता नहीं है. इसके अलावा, राजकोषीय विवेक का प्रदर्शन करने के लिए, राज्य प्रतिबद्ध व्यय पर ध्यान केंद्रित करते हुए पूंजीगत व्यय को कम करते हैं. आरबीआई की रिपोर्ट पूंजीगत व्यय को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए आर्थिक मंदी के दौरान व्यय को बनाए रखने के लिए राजस्व प्रवाह मजबूत होने के दौरान कैपेक्स बफर फंड की स्थापना का प्रस्ताव करती है.


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बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और वास्तविकता के बीच विसंगतियां

प्रत्येक सरकार एक वर्ष के दौरान राजस्व, व्यय और घाटे के तीन अनुमान प्रस्तुत करती है – बजट अनुमान (बीई), जो बजट के समय वर्ष के लिए नियोजित अनुमान होते हैं; संशोधित अनुमान (आरई), जो बताता है कि बजट को बीई से कितना संशोधित किया गया, और अंत में होता है वास्तविक अनुमान.

बीई, आरई और वास्तविक के बीच कुछ भिन्नता अपरिहार्य है क्योंकि वर्ष की शुरुआत में राजस्व और व्यय अनुमान लगाए जाते हैं. हालांकि, यदि बड़ी विसंगतियांक्यों राज्यों को जल्द से जल्द और अधिक खर्च करना शुरू करने की जरूरत है हैं, तो यह अनुमानों में त्रुटियों को दर्शाता है और संख्याओं की विश्वसनीयता को कम करता है.

आरबीआई की रिपोर्ट से पता चलता है कि कुछ राज्यों, विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए, आरई खर्च के लिए एक अधिक अनुमान प्रस्तुत करता है, लेकिन अप्रयुक्त खर्च के कारण वास्तविक आंकड़े कम हो जाते हैं. आरई, जो अगले वर्ष के बजट के साथ जारी किए जाते हैं, वास्तविक के करीब होने चाहिए.

इन अनुमानों के बीच व्यापक भिन्नताएं पूर्वानुमान में त्रुटियों का संकेत देती हैं. बदलाव अप्रत्याशित घटनाओं के कारण भी हो सकते हैं. ये विविधताएं राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य का आकलन करने में आरई (एक उत्सुकता से देखी गई संख्या) की विश्वसनीयता को कम करती हैं.


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उधारी अधिक रहती है

महामारी से प्रभावित वर्ष में राज्यों का ऋण-से-जीडीपी अनुपात अनुपात बढ़कर 31.1 प्रतिशत हो गया. चालू वर्ष में इसके घटकर 29.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है. राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन समीक्षा समिति, जिसकी अध्यक्षता एन.के. सिंह ने राज्यों के लिए ऋण-से-जीडीपी अनुपात 20 प्रतिशत करने की सिफारिश की थी.

चालू वर्ष की उधारी प्रवृत्ति व्यापक अंतर-राज्य असमानताओं को दर्शाती है. उदाहरण के लिए, चालू वर्ष के पहले आठ महीनों में उत्तर प्रदेश ने अपने बजटीय उधार का लगभग 21 प्रतिशत समाप्त कर दिया है. यह देखते हुए कि इसने कैपेक्स के लिए 21 प्रतिशत आवंटित किया है, राज्य के पास शेष महीनों में अपने पूंजीगत व्यय को वित्तपोषित करने के लिए उधार लेने की गुंजाइश है. पंजाब, केरल, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने अप्रैल-नवंबर के दौरान अपने उधारी लक्ष्यों का पर्याप्त हिस्सा समाप्त कर दिया है.

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चित्रण: रमणदीप कौर | दिप्रिंट

पुरानी पेंशन प्रणाली को वापस लेने से राज्यों के वित्तीय प्रदर्शन को खतरा 

कुछ राज्यों द्वारा पुरानी पेंशन प्रणाली को वापस लेने से राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए जोखिम का एक नया स्रोत बन गया है. 2000 के दशक की शुरुआत में, यह अहसास बढ़ रहा था कि पुरानी पेंशन प्रणाली टिकाऊ नहीं थी. सिविल सेवकों (और पेंशनभोगियों) के पेंशन वादों का शुद्ध वर्तमान मूल्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 60 प्रतिशत है. अस्थिर पेंशन देनदारियों के आसपास बढ़ती चिंताओं ने नए पेंशन ढांचे के डिजाइन का नेतृत्व किया.

राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों ने पुरानी पेंशन प्रणाली को वापस लेने का विकल्प चुना है. रिपोर्ट बताती है कि यह आने वाले वर्षों में अनफंडेड पेंशन देनदारियों के संचय को जोखिम में डालता है. इसके बजाय, संवर्धित पूंजीगत व्यय के माध्यम से उत्पादक क्षमताओं के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.

(राधिका पांडे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में सीनियर फेलो हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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