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Sunday, 21 April, 2024
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तेजी से बढ़ रही है दिल्ली में गरीबों की संख्या, स्कूली शिक्षा की स्थिति सबसे खराब

नीति आयोग की रिपोर्ट से पता चलता है कि दिल्ली के 11 जिलों में से पांच में 2016 और 2021 के बीच बहुआयामी गरीबी में वृद्धि देखी गई. शहर की बहुआयामी गरीबी में शिक्षा की हिस्सेदारी भी बढ़ी है.

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नई दिल्ली: भारत ने बहुआयामी गरीबी को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन इस प्रगति की गति असमान रही है. यह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में काफी स्पष्ट रूप से दिखता है. दिल्ली में जहां कुछ जिलों में बहुआयामी गरीबी काफी कम हुई है, लेकिन अन्य जिलों में यह बढ़ी है.

नीति आयोग द्वारा जुलाई में जारी नवीनतम बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) रिपोर्ट से पता चला कि दिल्ली में बहुआयामी गरीबी के तहत रहने वाले लोगों की हिस्सेदारी में गिरावट आई है. 2016 में जहां यह 4.43 प्रतिशत थी, 2021 में वह घटकर 3.43 प्रतिशत हो गई है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दिल्ली के सभी जिलों में बहुआयामी गरीबी कम हुई है. शहर के 11 जिलों में से लगभग आधे में बहुआयामी गरीबी बढ़ रही है.

राष्ट्रीय राजधानी के जिलों की अगर बात करे तो उत्तरी दिल्ली में बहुआयामी गरीबी में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई है. 2016 में, उत्तरी दिल्ली की लगभग 2.41 प्रतिशत आबादी इसके तहत थी जो 2021 में बढ़कर 6.26 प्रतिशत हो गई.

दूसरे शब्दों में कहें तो, 2016 में उत्तरी दिल्ली के प्रत्येक 41 निवासियों में एक व्यक्ति बहुआयामी गरीबी का शिकार था, लेकिन पांच साल बाद यह आंकड़ा 16 निवासियों में से एक पर पहुंच गया.

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इसी प्रकार, पश्चिमी दिल्ली में बहुआयामी गरीबी 2.29 प्रतिशत से बढ़कर 4.68 प्रतिशत, दक्षिण पश्चिम दिल्ली में 2.16 प्रतिशत से बढ़कर 3.15 प्रतिशत, नई दिल्ली में 4.16 प्रतिशत से बढ़कर 4.83 प्रतिशत और मध्य दिल्ली में 3.84 प्रतिशत से बढ़कर 3.88 प्रतिशत हो गई. 2011 की जनगणना के अनुसार, इन पांच जिलों में कुल मिलाकर दिल्ली की 36 प्रतिशत आबादी निवास करती है.

Delhi multidimensional poverty chart
चित्रण: प्रज्ञा घोष | दिप्रिंट

MPI में कुल 12 चीजों को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट तैयार किया जाता है. इसमें जीवन स्तर, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित आय से परे गरीबी का मूल्यांकन किया जाता है. रिपोर्ट 2015-16 (एनएफएचएस-4) और 2019-21 (एनएफएचएस-5) में आयोजित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के पिछले दो दौरों के डेटा का इस्तेमाल कर बनाई जाती है.

खासरकर कुछ जिलों में बहुआयामी गरीबी में वृद्धि के बावजूद, दिल्ली में अभाव सिर्फ 3.43 प्रतिशत जनसंख्या को है, जो राष्ट्रीय गरीबी के कुल 14.96 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है.

लेकिन जबकि दिल्ली में 12 संकेतकों में से अधिकांश में बहुआयामी गरीबी में कमी देखी गई है, शिक्षा का क्षेत्र एक महत्वपूर्ण अपवाद है.

‘स्कूल में उपस्थिति का अभाव’

भारत की बहुआयामी गरीबी में कमी मुख्य रूप से पानी, बिजली की उपलब्धता आदि जैसे जीवन स्तर के संकेतकों में सुधार का परिणाम है, जैसा कि दिप्रिंट ने पहले बताया था. दूसरी ओर, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषय अभी भी चुनौती बने हुए हैं.

दिल्ली के मामले में, बहुआयामी गरीबी में स्वास्थ्य और जीवन स्तर का योगदान कम हो गया है, जबकि शैक्षिक अभाव बढ़ गया है.

Graphic: Prajna Ghosh | ThePrint
चित्रण: प्रज्ञा घोष | दिप्रिंट

2016 में, दिल्ली में बहुआयामी गरीबी में स्वास्थ्य का योगदान लगभग 47 प्रतिशत था, लेकिन 2021 तक यह गिरकर 43 प्रतिशत हो गया. इसी तरह जीवन स्तर के बाकी संकेतक, जो 2016 में 22.02 प्रतिशत का योगदान करते थे, 2021 में गिरकर लगभग 19 प्रतिशत हो गए.

इसके विपरीत, दिल्ली में शैक्षिक अभावों का योगदान बढ़ा है. 2016 में, यह बहुआयामी गरीबी का 31 प्रतिशत था, लेकिन 2021 तक यह बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया जो लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.

आंकड़ों को विस्तृत स्तर पर देखें तो, दिल्ली में छात्रों की स्कूल में उपस्थिति कमी है.

Delhi school attendance deprivation
चित्रण: प्रज्ञा घोष | दिप्रिंट

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, एक परिवार को स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में वंचित माना जाता है यदि “कोई भी स्कूल जाने वाला बच्चा उस उम्र तक स्कूल नहीं जाता है जिस उम्र में वह 8वीं कक्षा पूरी करेगा”.

दिल्ली में, दो एनएफएचएस सर्वेक्षणों के बीच स्कूल में उपस्थिति की कमी में बढ़ोतरी देखी गई है.

2016 में, 2.63 प्रतिशत परिवारों ने इस मोर्चे पर अभाव का अनुभव किया, जो 2021 तक बढ़कर 2.77 प्रतिशत हो गया.

सीधे शब्दों में कहें तो, 2016 में आठवीं कक्षा के 1,000 बच्चों में से 263 बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे. यह संख्या 2021 तक बढ़कर 277 हो गई, जो दर्शाता है कि प्रति 1,000 अतिरिक्त 14 बच्चे उस उम्र में स्कूल नहीं जा रहे थे, जब उन्हें कक्षा 8 में पढ़ना चाहिए था.

गौरतलब है कि यह सिर्फ दिल्ली ही नहीं है जहां स्कूल में उपस्थिति में कमी बढ़ी है. कुल मिलाकर, भारत में स्कूल में उपस्थिति की कमी 5.04 प्रतिशत से बढ़कर 5.27 प्रतिशत हो गई है. इसलिए, दिल्ली में अभाव में वृद्धि राष्ट्रीय औसत से थोड़ी कम है. संक्षेप में, जबकि दिल्ली में 2016 की तुलना में 2021 में प्रति 1,000 पर 14 अधिक स्कूल न जाने वाले बच्चे थे, पूरे देश का का औसत 21 प्रतिशत था.

‘और डेटा की जरूरत’

दिल्ली के स्कूल में उपस्थिति की कमी में वृद्धि के बारे में निष्कर्ष निकालना मुश्किल है.

उदाहरण के लिए, चूंकि MPI रिपोर्ट में प्रत्येक संकेतक के लिए जिला-वार डेटा का अभाव है, इसलिए रिपोर्ट से यह अनुमान लगाना संभव नहीं है कि शैक्षिक अभाव किसी भी तरह से राजधानी के कुछ जिलों में बहुआयामी गरीबी में वृद्धि के साथ संबंधित है.

इस साल की शुरुआत में, वित्त मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान, नेशनल इंस्टीट्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) की सुकन्या बोस ने एक वर्किंग पेपर का सह-लेखन किया, जिसमें बताया गया कि 89 प्रतिशत स्कूल कैसे चलते हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दिल्ली सरकार को स्कूल में क्लासेज की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

हालांकि, दिप्रिंट से बात करते हुए, बोस ने कहा कि दिल्ली में स्कूल में उपस्थिति की कमी के आंकड़ों में मामूली वृद्धि के चलते किसी वड़े निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “काफी निचले स्तर पर आकर, यह संकेतक चिपचिपा साबित हो रहा है. मैं (एनएफएचएस के) के डेटा में छोटे अंतर पर ज्यादा ध्यान नहीं दूंगी. ध्यान रखना होगा कि कि पुडुचेरी और चंडीगढ़ जैसे कई अन्य अपेक्षाकृत छोटे लेकिन उन्नत शहरों में भी इसी तरह की प्रवृत्ति है.”

हालांकि, बोस ने कहा कि नीति आयोग की स्कूल में उपस्थिति की कमी की परिभाषा बहुत संकीर्ण थी, और इस प्रकार समस्या को काफी कम करके आंका गया है.

उन्होंने कहा, “एनएफएचएस में उपस्थिति संकेतक को काफी “ढीले तरीके से परिभाषित” किया गया है, एनआईटीआई रिपोर्ट इसे केवल ‘स्कूल-उम्र के बच्चों’ तक सीमित करती है, जिसका अर्थ है पांच साल और उससे अधिक उम्र के बच्चे, और इस उम्र तक वे स्कूल जाते हैं या नहीं. वे कक्षा 8 पूरी करेंगे.”

उन्होंने आगे कहा, “प्री-स्कूल पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया गया है, हालांकि एनएफएचएस में डेटा मौजूद है. यह उच्च उपस्थिति दर (कम अभाव) का कारण है. यह समस्या को कम करके आंकता है!”

बोस ने कहा, “दिल्ली के जिलों और बाकी क्षेत्रों में अंतर (अभाव में) महत्वपूर्ण हैं. क्या हम और भी फिसल रहे हैं? इस उपस्थिति सूचक के आधार पर कहना कठिन है. कुछ लोग कह सकते हैं कि नमूना आकार जिला-स्तरीय विश्लेषण के लिए पर्याप्त बड़ा नहीं है.”

बोस का सुझाव है कि भारत में शैक्षिक अभाव की समस्या के वास्तविक आकार का आकलन करने के लिए, शिक्षा पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) दौर की तरह “एक अखिल भारतीय घरेलू स्तर का सर्वेक्षण होना चाहिए”. उन्होंने कहा कि इस तरह के सर्वेक्षण में कई संकेतक शामिल होने चाहिए.

उन्होंने कहा, “कोविड के बाद के संदर्भ में और जनगणना की जानकारी के अभाव में यह बिल्कुल आवश्यक है.”

(संपादनः ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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