नई दिल्ली: संसद में गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में कहा गया है कि भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल आर्थिक रूप से ठोस और सामाजिक रूप से संवेदनशील होना चाहिए.
एक बड़े चैप्टर— ‘भारत में AI इकोसिस्टम का विकास’ — में विस्तार से बताया गया है कि AI किस तरह ग्लोबल इकॉनमी को बदल रहा है और तेज़ तकनीकी बदलावों समेत लगातार बनी अनिश्चितताओं के माहौल में एक व्यावहारिक रणनीति पेश कर रहा है.
सर्वे ने “बॉटम-अप, एप्लिकेशन-फोकस्ड” रणनीति की वकालत की है, जो आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को प्राथमिकता देती है और वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान से जुड़ी होती है. इसमें कहा गया है कि बढ़ती अनिश्चितता और संसाधनों की सीमाओं को देखते हुए भारत को AI को लेकर सतर्क रुख अपनाना चाहिए और इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि देश की AI रणनीति सही तरीके से योजनाबद्ध हो, ताकि समय से पहले तकनीकी लॉक-इन या अत्यधिक रेगुलेशन से बचा जा सके.
रिपोर्ट ने एक रोडमैप भी पेश किया है, जिसमें पहले समन्वय बनाने, फिर क्षमताएं विकसित करने और अंत में नीति तैयार करने पर ध्यान देने की बात कही गई है.
प्रभावी संसाधन उपयोग को आसान बनाने के लिए रिपोर्ट ने छोटे, ओपन-वेट मॉडल्स पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव दिया है, जो किसी खास सेक्टर या एप्लिकेशन से जुड़े हों.
सर्वे ने भारत के लिए एक केंद्रीय चुनौती को रेखांकित किया है. इसमें यह सवाल शामिल है कि देश घरेलू स्तर पर क्या बनाए, ग्लोबल लेवल पर क्या हासिल करे, किसे जल्दी रेगुलेट करे और किसे जानबूझकर विकसित होने दे. रिपोर्ट के मुताबिक, अनुभव से मिली समझ भारत को शुरू से ही ऐसे AI सिस्टम डिज़ाइन करने का मौका देती है जो संसाधनों के लिहाज़ से अधिक कुशल हों और सार्वजनिक उद्देश्यों से जुड़े हों, साथ ही तैनाती के साथ-साथ रेगुलेशन को भी चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाए. इससे भारत को अधिक मज़बूत और समावेशी AI रास्ता अपनाने का अवसर मिलता है.
‘AI इकोनॉमिक काउंसिल’
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने देश में AI के इस्तेमाल को दिशा देने के लिए एक ‘AI इकोनॉमिक काउंसिल’ बनाने का प्रस्ताव भी रखा है. अमेरिका और ब्रिटेन में AI गवर्नेंस से तुलना करते हुए दस्तावेज़ में कहा गया है कि बदलते हालात में भारत को AI से जुड़े कानून तेज़ी से विकसित करने की ज़रूरत है. यह काउंसिल अन्य AI गवर्नेंस निकायों से स्वतंत्र रूप से काम करेगी और इसका दायरा केवल नैतिक और सामाजिक उपयोग तक सीमित नहीं रहेगा.
सर्वे ने यह भी कहा है कि जैसे-जैसे AI का उपयोग बढ़ेगा, रेगुलेटर्स को इस पर नियंत्रण रखना होगा कि इसका इस्तेमाल कहां और कैसे किया जा रहा है. इसमें खास तौर पर छात्रों द्वारा जेनरेटिव AI के अत्यधिक उपयोग को लेकर चेतावनी दी गई है, खासकर तब जब इसका इस्तेमाल सोचने और रचनात्मकता के विकल्प के रूप में किया जाए, क्योंकि यह लंबे समय में नुकसानदेह हो सकता है.
सर्वे में यह भी देखा गया है कि विश्वविद्यालयों में AI का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है और कई छात्र संज्ञानात्मक गतिविधियों के लिए AI पर निर्भर हो रहे हैं. जब यह अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग के साथ जुड़ता है, तो पढ़ने, आलोचनात्मक सोच और विश्लेषणात्मक लेखन जैसी क्षमताएं कमजोर हो सकती हैं. समय के साथ इससे मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है, उत्पादकता घट सकती है और भविष्य के काम के अवसर सीमित हो सकते हैं.
AI स्टार्टअप्स और डेटा का उपयोग
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26, जिसने AI के ज़माने में डेटा को एक स्ट्रेटेजिक रिसोर्स बताया है, ने इसके अलावा एक नया फ्रेमवर्क भी प्रस्तावित किया है ताकि यह देखा जा सके कि भारतीय डेटा का इस्तेमाल, शेयर और मॉनेटाइज़ेशन कैसे किया जाता है, साथ ही स्टार्टअप और इनोवेशन को भी बचाया जा सके. हालांकि, इसमें यह भी जोड़ा गया है कि छोटी कंपनियों, रिसर्च लैब्स और भारतीय या सॉवरेन AI मॉडल डेवलप करने वाली फर्मों को इनोवेशन को रोकने से बचने के लिए कम सख्त कंप्लायंस ज़रूरतों का सामना करना चाहिए.
सर्वे के मुताबिक, भारत में 100 मिलियन से ज़्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं, जिससे यह दुनिया के सबसे डिजिटल रूप से बाज़ारों में से एक है. इतने बड़े यूज़र बेस के कारण भारत में भारी मात्रा में डेटा पैदा होता है. डेटा की यह मात्रा और विविधता भारतीय बाज़ार के लिए AI उत्पाद विकसित करने वाली कंपनियों के लिए एक बड़ा लाभ है.
अब तक, भारत ने कॉर्पोरेट ऑपरेशंस को आसान बनाने, निवेश आकर्षित करने और ग्लोबल डेटा फ्लो से फायदा उठाने के लिए सख्त डेटा लोकलाइज़ेशन ज़रूरतों से परहेज किया है. हालांकि, इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि इस अप्रोच का विस्तार किया जाना चाहिए ताकि भारत अपने डेटा से ज़्यादा वैल्यू हासिल कर सके.
सर्वे ने यह सुझाव दिया है कि सभी डेटा को भारत में ही रखने की अनिवार्यता के बजाय “अकाउंटेबल पोर्टेबिलिटी” की ओर बढ़ा जाए. इस तरीके में डेटा सीमाओं के पार जा सकता है, लेकिन जो कंपनियां भारतीय डेटा को “बड़े” पैमाने पर प्रोसेस करती हैं, खासकर बड़े या सामान्य उद्देश्य वाले AI मॉडल को ट्रेन करने के लिए, उन्हें भारतीय रेगुलेटर्स के प्रति जवाबदेह रहना होगा.
ऐसी संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय डेटा ऑडिट योग्य, ट्रेस करने योग्य और वापस हासिल किया जा सके, भले ही उसका प्रोसेसिंग देश के बाहर क्यों न किया गया हो.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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