नई दिल्ली: भारत की गिग इकॉनमी पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ी है और यह रोज़गार के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले स्रोतों में से एक बनकर उभरी है. लेकिन ताज़ा इकोनॉमिक सर्वे ने चेतावनी दी है कि इस बढ़त के साथ आय की स्थिरता, श्रमिक सुरक्षा और तकनीकी बदलाव से जुड़े जोखिम भी बढ़े हैं.
गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में कहा गया है कि गिग वर्कफोर्स FY 2021 में 77 लाख से बढ़कर FY 2025 में लगभग 1.2 करोड़ हो गई है. इसकी वजह स्मार्टफोन का व्यापक प्रसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का बढ़ना और UPI आधारित भुगतान का विस्तार है.
सर्वे, जिसे मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने तैयार किया है, में कहा गया है, “अब भारत की कुल वर्कफोर्स का 2 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गिग वर्कर्स का है. गिग वर्कर्स की वृद्धि कुल रोज़गार वृद्धि से तेज़ है. 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चर गिग्स के वर्कफोर्स का 6.7 प्रतिशत होने का अनुमान है, जो GDP में 2.35 लाख करोड़ रुपये का योगदान देंगे.”
सेक्टर में उच्च विकास क्षमता के बावजूद, सर्वे ने गिग वर्कर्स की लगातार बनी कमजोरियों की ओर इशारा किया है. इसमें कहा गया है कि 40 प्रतिशत गिग वर्कर्स की मासिक आय 15,000 रुपये से कम है, जबकि आय में उतार-चढ़ाव और “थिन-फाइल” क्रेडिट हिस्ट्री यानी पहले का बहुत कम या कोई क्रेडिट रिकॉर्ड न होना, उन्हें औपचारिक वित्त तक पहुंच से वंचित करता है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम काम के आवंटन, प्रदर्शन की निगरानी, मज़दूरी और मांग-आपूर्ति के मिलान को नियंत्रित करते हैं, जिससे एल्गोरिदमिक पक्षपात और बर्नआउट को लेकर चिंताएं बढ़ती हैं.”
इसमें आगे कहा गया है कि सीमित स्किलिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व मशीन लर्निंग जैसी तकनीकी प्रगति के कारण नौकरी जाने का डर भी श्रमिकों की असुरक्षा को बढ़ाता है.
हालांकि नए लेबर कोड्स ने सोशल सिक्योरिटी कवरेज, वेलफेयर फंड्स और बेनिफिट पोर्टेबिलिटी का दायरा बढ़ाकर गिग वर्कर्स को औपचारिक रूप से मान्यता दी है, लेकिन सर्वे ने कहा है कि आगे चलकर अधिक एल्गोरिदमिक पारदर्शिता और श्रमिकों के अनुकूल प्रथाएं ज़रूरी होंगी.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोज़गार
सर्वे ने यह भी बताया है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोज़गार का रुझान बड़े कारखानों की ओर बढ़ रहा है, जो नौकरी की गुणवत्ता और श्रम उत्पादकता में सुधार का संकेत देता है.
FY 2024 में, बड़े ऑपरेशनल कारखानों में मैन्युफैक्चरिंग वर्कफोर्स के लगभग 79 प्रतिशत लोग काम कर रहे थे. वहीं, 100 से कम कर्मचारियों वाली छोटी इकाइयों की संख्या कुल कारखानों का तीन-चौथाई से अधिक थी, लेकिन उनमें केवल 21 प्रतिशत श्रमिक कार्यरत थे.
सर्वे के मुताबिक, बड़े कारखाने न सिर्फ़ ज़्यादा लोगों को रोज़गार देते हैं, बल्कि अधिक मज़दूरी और प्रति व्यक्ति अधिक नेट वैल्यू एडेड भी पैदा करते हैं, जो बेहतर उत्पादकता को दर्शाता है.
FY 2014 से FY 2024 के बीच बड़े कारखानों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई और इसमें 97 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि छोटे कारखानों में यह बढ़ोतरी केवल 26 प्रतिशत रही.
नतीजतन, रिपोर्ट के अनुसार, बड़े यूनिट्स में रोज़गार वृद्धि काफ़ी तेज़ रही. कुल कार्यरत लोगों की संख्या में कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट 6 प्रतिशत रही, जबकि छोटे कारखानों में यह सिर्फ़ 2 प्रतिशत थी.
सर्वे इस रुझान को एक सकारात्मक संरचनात्मक बदलाव मानता है, क्योंकि बड़े कारखानों में रोज़गार आमतौर पर अधिक औपचारिक, बेहतर वेतन वाला और अधिक उत्पादक होता है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों की गुणवत्ता मज़बूत होती है.
रोज़गार बाज़ार
इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, हाल के वर्षों में भारत में रोजगार बढ़ा है. इसमें संरचनात्मक सुधारों, टैक्स को सरल बनाने और स्किल डेवलपमेंट पर लगातार ध्यान ने मदद की है.
सर्वे में कहा गया है, “डीरिगुलेशन, GST 2.0 और राज्यों द्वारा लागू लेबर रिफॉर्म जैसे कदमों ने लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन और उद्योग व सेवाओं में रोज़गार वृद्धि में योगदान दिया है.”
अप्रैल से सितंबर 2025 के दौरान यानी FY 2026 की पहली छमाही में, करंट वीकली स्टेटस के तहत बेरोज़गारी घटी, जबकि लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन स्थिर रहा.
केवल FY 2026 की जुलाई–सितंबर तिमाही में ही 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 56.2 करोड़ लोग रोज़गार में थे. रिपोर्ट के मुताबिक, यह पिछली तिमाही की तुलना में 8.7 लाख नौकरियों की बढ़ोतरी को दर्शाता है.
सर्वे ने भारत के रोज़गार ढांचे में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच तेज़ अंतर को भी उजागर किया है. ग्रामीण इलाकों में लगभग 58 प्रतिशत रोज़गार कृषि से जुड़ा है, जो ग्रामीण श्रम को समाहित करने में इसकी अहम भूमिका दिखाता है. वहीं, लगभग 63 प्रतिशत नौकरियां स्वरोज़गार की हैं, जो खेती और अपने खाते के काम पर निर्भरता को दर्शाती हैं.
दूसरी ओर, शहरी रोज़गार पर सेवाओं का दबदबा है, जहां लगभग 62 प्रतिशत श्रमिक इस सेक्टर में काम करते हैं. नियमित वेतन या सैलरी वाली नौकरियां कुल शहरी रोज़गार का लगभग आधा हिस्सा हैं.
हालांकि गैर-कृषि गतिविधियों की ओर धीरे-धीरे झुकाव बढ़ रहा है, फिर भी कुल स्तर पर यानी ग्रामीण और शहरी वर्कफोर्स को मिलाकर कृषि में 42 प्रतिशत से अधिक रोज़गार बना हुआ है.
सर्वे ने कहा है कि खासकर ग्रामीण इलाकों में कृषि पर यह निर्भरता और खेती से जुड़ी मौसमी उतार-चढ़ाव वाली गतिविधियां इस बात को रेखांकित करती हैं कि नौकरी की गुणवत्ता और आय की स्थिरता सुधारने के लिए लक्षित नीतियों की ज़रूरत है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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