Friday, 12 August, 2022
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DMK खुद को स्थापित कर रही या अब भी ‘हिंदू विरोधी’ है? तमिलनाडु में मंदिर सुधारों पर उठ रहे सियासी सवाल

मंदिर प्रशासन के प्रशिक्षण के लिए संस्थान शुरू करने से लेकर तमिल और संस्कृत में प्रार्थना के विकल्प अपनाने तक द्रमुक सरकार मंदिर सुधारों पर जोर दे रही है.

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नई दिल्ली: तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ मामलों के मंत्री (एचआर एंड सीई) पी.के. शेखरबाबू पिछले कुछ समय से काफी व्यस्त व्यक्ति बने हुए हैं.

द्रमुक सरकार के इस कार्यकाल में जबसे पहला विधानसभा सत्र शुरू हुआ है, शेखरबाबू ने मंदिरों, पुजारियों और हिंदू धर्म से संबंधित कई कदम उठाने की शुरुआत की है. कुछ काम तो पिछले महीने सत्र शुरू होने से पहले ही हो चुके थे.

नई द्रमुक सरकार की तरफ से पहले 100 दिनों में किए गए कार्यों में मंदिर प्रशासन के प्रशिक्षण के लिए संस्थान, मुफ्त प्रसादम, दान में मिले आभूषणों को गोल्ड बार में बदलना, सभी जातियों के अर्चक (पुजारी), श्रद्धालुओं के लिए तमिल और संस्कृत में प्रार्थना का विकल्प, मंदिर परिसर में फूलों की खेती, लगभग 13,000 मंदिरों में पुजारियों को मासिक प्रोत्साहन, राज्य भर के मंदिरों में 10,000 सुरक्षा गार्डों की तैनाती आदि शामिल हैं.

सरकार ने कांचीपुरम में एकंबरेश्वर मंदिर के पास 100 करोड़ रुपये के वाणिज्यिक परिसर के निर्माण की भी घोषणा की है. शेखर बाबू ने बताया कि वाणिज्यिक परिसर मंदिरों की आय बढ़ाने के लिए कितना अहम है.

सरकार ने मंदिरों की भूमि को कम किराये पर लीज पर दिया है, 3.50 एकड़ से अधिक भूमि वाले मंदिरों के लिए टाइटल डॉक्यूमेंट प्रकाशित किए गए हैं और राज्य में मंदिरों की भूसंपत्ति के हर इंच को डिजिटाइज करने के लिए ड्रोन और जीपीएस सर्वेक्षण की योजना बनाई जा रही है.

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दिप्रिंट ने फोन कॉल और टेक्स्ट मैसेज के माध्यम से प्रतिक्रिया के लिए शेखरबाबू से संपर्क साधा लेकिन यह रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला.

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम या द्रमुक, जैसा कि आमतौर पर इसे कहा जाता है, का इतिहास जाति-विरोधी सामाजिक आंदोलन द्रविड़ कड़गम (डीके) से जुड़ा है, जिसकी स्थापना जातिगत असमानताओं के खिलाफ लड़ने वाले और एक घोर नास्तिक ई.वी. रामासामी (पेरियार) ने की थी.

पेरियार ने एक बार धर्म की अवधारणा की आलोचना करते हुए कहा था, ‘जिसने भगवान को बनाया वह मूर्ख है, जो भगवान की महिमा का बखान करता है वह बदमाश है, और जो भगवान की पूजा करता है वह बर्बर है.’

यद्यपि द्रमुक वैचारिक मतभेदों के कारण पेरियार से नाता तोड़ चुकी है, मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष एम.के. स्टालिन को घोषित तौर पर एक नास्तिक माना जाता है, यहां तक कि पार्टी को अक्सर हिंदू विरोधी होने के आरोप का सामना भी करना पड़ता है. मुख्यमंत्री के दिवंगत पिता और पूर्व द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि भी नास्तिक थे.

अब चाहे पार्टी ज्यादा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश कर रही हो या फिर भाजपा की धार्मिक राजनीति के जवाब में ऐसा कर रही हो द्रमुक की ‘मंदिर की राजनीति’ ने हर किसी का ध्यान आकर्षित किया है.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी हिंदू समाज के बीच खुद को फिर से स्थापित करने की जरूरत महसूस कर रही है, जबकि अन्य मंदिर सुधार के उसके लंबे इतिहास की ओर इशारा करते हैं. हालांकि, विपक्ष अपने इस आरोप पर अड़ा है कि द्रमुक ‘हिंदू विरोधी’ है, और कथित तौर पर हिंदू धर्म के खिलाफ टिप्पणियां करने का इसका इतिहास रहा है.

द्रमुक को हिंदू समाज के बीच खुद को स्थापित करना जरूरी लग रहा

मद्रास यूनिवर्सिटी में राजनीति और लोक प्रशासन विभाग के प्रमुख रामू मणिवन्नन ने कहा कि 1949 में पार्टी की स्थापना के बाद से ही द्रमुक ने हमेशा खुद को पेरियार के आंदोलन डीके से अलग दिखाने की कोशिश की है, न कि कट्टर नास्तिक के रूप में.
मणिवन्नन ने कहा, ‘द्रमुक के पास आस्तिकों का एक बड़ा जनाधार है, इसलिए वे इससे अलग नहीं जा सकते और धर्म की भूमिका को नकार नहीं सकते हैं. किसी को भी ब्राह्मणवाद के खिलाफ और भगवान विरोधी होने के बीच अंतर समझना चाहिए, द्रमुक का फोकस हमेशा ब्राह्मणवाद के खिलाफ रहा है.’

हालांकि, उन्होंने स्वीकारा कि हाल के दिनों में द्रमुक को ‘राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण हिंदू धर्म के साथ अपना जुड़ाव ज्यादा स्पष्ट’ करना पड़ रहा है. यह प्रतिस्पर्धा भाजपा से है, जिसने हाल में विनायक चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) के जुलूसों पर पाबंदी लगाने को लेकर सत्तारूढ़ द्रमुक सरकार को ‘हिंदू विरोधी’ करार दिया था.

मणिवन्नन ने साफ तौर पर कहा, ‘भाजपा की तरफ से स्पष्ट तौर पर राजनीतिक चुनौती मिल रही है, जो पिछले 10 सालों से राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है. द्रमुख को अब भाजपा के मुकाबले हिंदू समाज के भीतर धर्मनिरपेक्ष जगह में खुद को मजबूती से स्थापित करने की जरूरत महसूस हो रही है.’


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हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक, साहित्यकार और करुणानिधि के जीवनी के लेखक ए.एस. पन्नीरसेल्वम का कहना है कि इन सुधारों का विश्लेषण करते समय किसी को भी भाजपा को इसका श्रेय नहीं नहीं देना चाहिए. उनके मुताबिक, पुरानी द्रमुक सरकारों के समय भी मंदिर सुधार हुए थे, लेकिन ‘अन्नाद्रमुक सरकार की तरफ से 10 साल बरती गई निष्क्रियता’ के कारण अब अधिक स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहे हैं.

पनीरसेल्वम ने अतीत के सुधारों का जिक्र करते हुए कहा कि सभी जातियों के अर्चक और तिरुवरुर मंदिर रथ समारोह को करुणानिधि ने 1970 के दशक में लागू किया था.

पन्नीरसेल्वम ने कहा, ‘अभी आप जो देख रहे हैं वह तो बस आगे की एक कड़ी है.’ उन्होंने कहा कि द्रमुक के लिए आस्था व्यक्तिगत विश्वास का मामला है और यह इस बात से नहीं जुड़ा है कि राज्य पर शासन कैसे किया जाता है.

उन्होंने कहा, ‘डीके और द्रमुक के बीच यही अंतर रहा है. द्रमुक एक जाति, एक भगवान (ओंद्रे कुलम, ओरुवने देवन) में विश्वास करती है. उसके लिए समावेशी विकास राजनीति में अंतर्निहित है और उसका मानना है कि सामाजिक न्याय का मतलब है कि जाति कहीं भी, यहां तक आस्था के मामले में भी, बाधक नहीं हो सकती.’

डीएमके अब भी हिंदू विरोधी पार्टी : भाजपा

विपक्ष, खासकर भाजपा इस तरह के बयानों से सहमत नहीं है.

तमिलनाडु भाजपा के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा कि द्रमुक सरकार की तरफ से शुरू किए गए कई उपाय राज्य के कई मंदिरों में पहले से ही अपनाए जा रहे थे और यह कोई ‘नई अवधारणा नहीं’ है.

उनके मुताबिक, ये सभी उपाय ‘हिंदू विरोधी छवि’ वाली द्रमुक के लिए किसी भी तरह मददगार नहीं है.

उन्होंने इस टिप्पणी को उचित ठहराने के लिए अतीत के कुछ बयानों का उदाहरण दिया, जिसमें करुणानिधि ने टिप्पणी थी कि कि ‘हिंदू का मतलब चोर’ होता है और उन्होंने यह कहते हुए ‘भगवान राम का अपमान किया था कि क्या वह कोई इंजीनियर थे.’

स्टालिन की ओर इशारा करते हुए तिरुपति ने चुनाव से पहले तिरुचिरापल्ली के एक सम्मेलन की याद दिलाई जिसमें स्टालिन ने कहा था कि वह सनातन धर्म को उखाड़ फेंकेंगे.

तिरुपति ने कहा, ‘सनातन धर्म क्या है? यह हिंदू धर्म है.’

उन्होंने 2018 की तिरुचिरापल्ली की एक घटना का भी उदाहरण दिया जब स्टालिन ने जिले के एक मंदिर में अपनी यात्रा के दौरान पुजारियों की तरफ से लगाए गए मंजल कप्पू (हल्दी का टीका) को हटा दिया था.

सुधारों में कुछ नया नहीं : द्रमुक

इन दावों को खारिज करते हुए द्रमुक के राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा ने बताया कि जब करुणानिधि जीवित थे, तब वह भी मंदिरों के संरक्षण की दिशा में काम करते थे.

शिवा ने स्पष्ट किया, ‘कोई बदलाव नहीं हुआ है. मंदिर की गाड़ियों के जीर्णोद्धार से लेकर मंदिरों में पवित्र जल छिड़के जाने और पुजारियों का बोर्ड गठित करने तक सब कुछ कलाईनार (करुणानिधि) ने ही किया था. हम केवल इसे आगे बढ़ा रहे हैं और मंदिर की संपत्तियों का संरक्षण कर रहे हैं.

मौजूदा सुधारों के संबंध में शिवा ने बताया कि द्रमुक का विचार मंदिरों का संरक्षण करना और समाज के सभी वर्गों की जरूरतों का ख्याल रखा जाना ही रहा है.

सांसद ने कहा, ‘द्रमुक मूलत: धर्मनिरपेक्ष है और हम समाज के सभी वर्गों के लिए मंदिरों के दरवाजे खोलना चाहते हैं. यह भी हमारे समावेशी शासन का हिस्सा है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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