नई दिल्ली: डिजिटल अरेस्ट से जुड़े स्कैम अभी भी जारी हैं, लेकिन अब उनमें कमी आ रही है. दिप्रिंट को मिले आंकड़ों के अनुसार 2025 में डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पिछले साल की तुलना में 86 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि पीड़ितों द्वारा गंवाई गई रकम में 66.4 प्रतिशत की कमी हुई.
गृह मंत्रालय के इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो साल में डिजिटल अरेस्ट मामलों की संख्या और पीड़ितों के वित्तीय नुकसान दोनों में तेज बढ़ोतरी हुई थी.
2024 में गंवाई गई रकम में करीब 465 प्रतिशत की बढ़ोतरी सहित तेज उछाल देखने के बाद अब रुझान उल्टा होता दिख रहा है.
2022 में अधिकारियों ने 39,925 मामले दर्ज किए थे, जिनमें 91 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. 2023 में यह संख्या बढ़कर 60,676 हो गई, जो 52 प्रतिशत की बढ़ोतरी थी. उसी साल वित्तीय नुकसान 272 प्रतिशत बढ़कर 339 करोड़ रुपये हो गया.
2024 में स्थिति और खराब हुई. मामले 103 प्रतिशत बढ़कर 1,23,672 हो गए, जबकि बताई गई नुकसान की रकम 465 प्रतिशत बढ़कर 1,918 करोड़ रुपये पहुंच गई.
2025 में गिरावट शुरू हुई. मामले घटकर 17,264 रह गए और कुल नुकसान 644 करोड़ रुपये रहा.
एक वरिष्ठ गृह मंत्रालय अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर द प्रिंट से कहा, “डिजिटल अरेस्ट घोटाले एक बड़ी समस्या बन गए थे.”
उन्होंने आगे कहा, “एसएमएस अलर्ट, कॉलर ट्यून, विज्ञापन और प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में जिक्र जैसे जागरूकता अभियान से मदद मिली. इन में से कई ठगी कॉल थाईलैंड, कंबोडिया और म्यांमार से चलने वाले नेटवर्क से जुड़ी मिलीं.”
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस महीने की शुरुआत में एक कार्यक्रम में कहा कि देश में हर साढ़े तीन सेकंड में एक व्यक्ति साइबर अपराधियों का शिकार बनता है और हर घंटे 97 से 100 लोग ठगे जाते हैं.
उसी अधिकारी ने कहा कि अभी भी मामले सामने आ रहे हैं और रकम बड़ी होती है, लेकिन जागरूकता अभियानों से इस समस्या को कम करने में मदद मिली है.
एक अन्य सूत्र के अनुसार, ज्यादातर डिजिटल अरेस्ट कॉल थाईलैंड और कंबोडिया में चल रहे “स्कैम फार्म” से आती हैं. पिछले साल दक्षिण-पूर्व एशिया में इन “स्कैम फार्म” में काम कर रहे 500 से ज्यादा लोगों को भारत वापस लाया गया.
यह कई अरब डॉलर का साइबर ठगी उद्योग भारतीय जांच एजेंसियों के रडार पर तब आया जब डिजिटल अरेस्ट मामलों में अचानक उछाल आया. तब से कई कॉल इन क्षेत्रों से जुड़ी मिलीं, लेकिन जांच में सीमित सफलता मिली है.
बाद की कार्रवाई का ज्यादा असर नहीं हुआ, क्योंकि पूरा नेटवर्क विदेशी देशों में काम करता है. कुछ एजेंट, म्यूल अकाउंट धारकों या सेशन इनिशिएशन प्रोटोकॉल प्रदाताओं की गिरफ्तारी से थाईलैंड, म्यांमार और कंबोडिया में औद्योगिक स्तर पर चल रहे सैकड़ों “स्कैम फार्म” पर खास असर नहीं पड़ता.
गृह मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, “ये स्कैम फार्म बहुत संगठित तरीके से काम करते हैं. एक हिस्सा लोगों का डेटा इकट्ठा करता है, जिसमें सोशल मीडिया, आधार और पैन की जानकारी शामिल होती है. इनके पास स्टूडियो भी बने होते हैं.” उन्होंने आगे कहा, “दूसरा हिस्सा पैसे को म्यूल अकाउंट में भेजता है.”
उन्होंने समझाया, “पैसा रोकने का एक ही तरीका है कि जल्दी प्रतिक्रिया दी जाए. एक गोल्डन आवर होता है और अगर तुरंत कार्रवाई करके पैसा रोक दिया जाए तो उसे बचाया जा सकता है.”
2021 में ठगी गई रकम में से सिर्फ 6 प्रतिशत को ही रोका जा सका था. 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 19 प्रतिशत हो गया, जिससे ज्यादा पैसा ठगों तक पहुंचने से रोका जा सका.
गृह मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि साइबर धोखाधड़ी के मामले में 2024 में कुल वित्तीय नुकसान 22,845 करोड़ रुपये था, जबकि 2025 में यह 22,495 करोड़ रुपये रहा.
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