scorecardresearch
Sunday, 19 July, 2026
होमदेश'वांगचुक हिरासत में नहीं हैं, जांच में सहयोग करें' : दिल्ली HC ने पत्नी आंगमो की याचिका खारिज की

‘वांगचुक हिरासत में नहीं हैं, जांच में सहयोग करें’ : दिल्ली HC ने पत्नी आंगमो की याचिका खारिज की

केंद्र की ओर से पेश हुए दिल्ली हाई कोर्ट के ASG ने कहा कि अगर कोर्ट को ज़रूरत लगे, तो वांगचुक को AIIMS भी भेजा जा सकता है.

Text Size:

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने विस्तार से सुनवाई करने के बाद पत्नी गीतांजलि अंगमो की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से उनकी पसंद के किसी निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की थी. अंगमो ने यह भी मांग की थी कि वांगचुक को तुरंत सरकारी अस्पताल से छुट्टी दी जाए.

जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने कहा, “सरकार ने वांगचुक को मेडिकल जरूरत के कारण अस्पताल में भर्ती कराया है. इसलिए अदालत इसे मनमाना फैसला नहीं मानती.” उन्होंने अपना फैसला 16 जुलाई को डिवीजन बेंच के दिए गए आदेश के आधार पर दिया.

अदालत ने अंगमो की याचिका पर नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 24 जुलाई को तय की.

जस्टिस पुष्कर्णा ने मौखिक आदेश में कहा, “यह नहीं कहा जा सकता कि उन पर कोई जोर-जबरदस्ती की जा रही है या उनके शरीर की स्वतंत्रता का उल्लंघन हो रहा है. अदालत यह भी ध्यान में रखती है कि वह हिरासत में नहीं हैं. वांगचुक अपनी इच्छा से किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए थे. डिवीजन बेंच के आदेश के अनुसार सरकार को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने का पूरा अधिकार था.”

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सोनम वांगचुक को डॉक्टरों का सहयोग करना चाहिए, जैसा कि सरकार ने अनुरोध किया है. अदालत ने कहा, “उनकी मेडिकल स्थिति को लेकर अंतिम फैसला उनका इलाज कर रही मेडिकल टीम करेगी और यह मेडिकल नियमों के अनुसार होगा.”

रविवार को दोपहर 2.30 बजे हाई कोर्ट की विशेष सुनवाई हुई. इससे पहले वांगचुक की पत्नी ने एक जरूरी याचिका दाखिल की थी. इसमें उन्होंने अदालत से मांग की थी कि उनके पति को लगातार अस्पताल में रोके रखना असंवैधानिक घोषित किया जाए और उन्हें तुरंत छुट्टी देकर उनकी पसंद के अस्पताल या मेडिकल सुविधा केंद्र में भेजने की अनुमति दी जाए.

अंगमो खुद अदालत में मौजूद थीं. उन्होंने अदालत को बताया कि उन्होंने वांगचुक के खून का सैंपल दूसरी राय लेने और पोटैशियम की अलग जांच के लिए मांगा था. उन्होंने बताया कि सफदरजंग अस्पताल ने उन्हें खून का सैंपल देने में 12 घंटे लगा दिए. उन्हें शनिवार रात लगभग आधी रात के समय सैंपल मिला, जब लगभग सभी निजी लैब बंद हो चुकी थीं.

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, जो अंगमो की ओर से पेश हुए, उन्होंने 16 जुलाई के आदेश का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि फिलहाल सफदरजंग अस्पताल में समस्या यह है कि वांगचुक को उनके निजी डॉक्टरों या वकीलों से मिलने नहीं दिया जा रहा और उनकी पत्नी को यह भी नहीं पता कि उन्हें कौन-सी दवाएं दी जा रही हैं. उन्होंने अदालत में कहा, “हमें अपनी पसंद के डॉक्टर और अस्पताल का अधिकार है.” उन्होंने बताया कि वेदांता अस्पताल उनकी मांग पर एंबुलेंस भेजने और वांगचुक को भर्ती करने के लिए तैयार है.

दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को 16 जुलाई के डिवीजन बेंच के आदेश की जानकारी दी, जिसमें सरकारी डॉक्टरों को वांगचुक की जांच करने की अनुमति दी गई थी. शर्मा ने आदेश का हवाला देते हुए कहा, “हर नागरिक की जान कीमती है और सरकार को उसे बचाने के लिए हर जरूरी मेडिकल कोशिश करनी चाहिए.”

सुनवाई के दौरान जस्टिस पुष्कर्णा ने पूछा कि ऐसी कौन-सी तत्काल स्थिति बनी थी कि सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाना पड़ा.

इस पर शर्मा ने कहा कि इस मौसम में 18 दिन तक भूखे रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है और गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं. उन्होंने अदालत से कहा, “हो सकता है अभी स्थिति गंभीर न हो, लेकिन बाद में इससे शरीर को झटका लग सकता है और हाइपोकैलेमिया यानी शरीर में पोटैशियम की कमी हो सकती है.”

सरकारी इलाज पर भरोसा दिलाते हुए शर्मा ने कहा कि भारत के राष्ट्रपति भी सरकारी डॉक्टरों से इलाज कराते हैं. उन्होंने बताया कि अस्पताल वांगचुक की सहमति से उन्हें बिना चीनी वाला इलेक्ट्रोलाइट दे रहा है.

शर्मा ने कहा, “यह हमारा कर्तव्य है और हमें सावधान रहना होगा कि अगर वह इलाज से इनकार करें, तब भी जरूरी मेडिकल सहायता उपलब्ध रहे. उन्हें डॉक्टरों पर पूरा भरोसा होना चाहिए. उनकी देखभाल की जा रही है, लेकिन डिवीजन बेंच के आदेश के अनुसार उन्हें इलाज कर रहे डॉक्टरों का सहयोग करना होगा.”

उन्होंने आगे कहा, “सरकारी नीति के अनुसार हम निजी मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करते. सफदरजंग अस्पताल बहुत अच्छा है. लेकिन अगर अदालत जरूरी समझे तो वांगचुक को एम्स भी भेजा जा सकता है.”

एम्स के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. अक्षय ने अदालत से कहा, “हम लगातार उनकी निगरानी कर रहे हैं. हमने उन्हें कुछ तरल पदार्थ और बिना चीनी वाला ओआरएस देना शुरू किया है. सामान्य ओआरएस नहीं दिया जा रहा. हम उनसे आईवी फ्लूइड लेने के लिए कह रहे हैं, लेकिन वह मना कर रहे हैं. उनके कुछ मेडिकल पैरामीटर सीमा पर हैं और कुछ सामान्य से थोड़ा नीचे हैं. अगर वह यह इलाज नहीं लेते हैं तो उनकी स्थिति और खराब हो सकती है.”

दूसरी ओर कपिल सिब्बल ने अदालत को याद दिलाया कि वांगचुक न तो हिरासत में हैं और न ही उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज है. उन्होंने यह भी कहा कि 16 जुलाई को जब डिवीजन बेंच का आदेश आया था, तब न तो वांगचुक और न ही उनकी पत्नी उस मामले में पक्षकार थे. इसलिए वह एकतरफा आदेश था.

आदेश सुनाने से पहले जस्टिस पुष्कर्णा ने सिब्बल से पूछा, “क्या अदालत की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह उनकी मेडिकल स्थिति का ध्यान रखे, खासकर डिवीजन बेंच के आदेश के बाद? लद्दाख में वह 35 दिन तक भूख हड़ताल पर रहे थे, लेकिन हमें नहीं पता कि हर इंसान का शरीर कैसे प्रतिक्रिया देता है.”

इस पर सिब्बल ने कहा कि सोनम वांगचुक ऐसी जगह रहना चाहते हैं जिसे उन्होंने खुद चुना हो, “…जहां मेरा परिवार, मेरे वकील और मेरे दोस्त मुझसे मिल सकें.”

अंगमो की याचिका में यह भी कहा गया कि जब वह कमरे में गईं तो वहां 20 पुलिसकर्मी मौजूद थे और उनकी बातें सुन रहे थे. याचिका में यह भी कहा गया कि वह ऐसे अस्पताल जाना चाहती हैं जहां वह सहज महसूस करें. इस पर शर्मा ने कहा कि “यह एक कार्यकर्ता की भाषा है.” उन्होंने आगे कहा, “यह आंदोलन चलाने का मंच नहीं है. आंदोलन बाद में किया जा सकता है. यह कानून की अदालत है.”

हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और दूसरे पक्षों को तीन दिन के भीतर अपना जवाब और स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया. अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के इस बयान का भी संज्ञान लिया कि वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट नियमित रूप से उनके परिवार के साथ साझा की जाएगी.

7 पन्नों के आदेश में जस्टिस पुष्कर्णा ने यह भी कहा, “सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से अस्पताल ले जाने भर से पहली नजर में उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह कदम लंबे समय तक भूख हड़ताल के कारण उनकी कमजोर मेडिकल स्थिति को देखते हुए उनकी जान की सुरक्षा के लिए उठाया गया था.”

सुनवाई के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए गीतांजलि अंगमो ने सरकार और दिल्ली पुलिस की दलीलों को “नाटक” बताया.

उन्होंने कहा, “अगर सरकार को सच में उनकी सेहत की इतनी चिंता थी, तो उन्हें इतनी सख्ती से उठाकर स्ट्रेचर पर क्यों ले जाया गया? सिर्फ मेडिकल जांच करके परिवार को बताया जा सकता था कि उनके शरीर में किसी चीज का स्तर कम है और इसलिए उन्हें अस्पताल ले जाना जरूरी है. लोकतंत्र में यही सही तरीका होता है. अगर सच में उनकी सेहत की चिंता होती, और मैं बिना किसी लाग-लपेट के यह कहना चाहती हूं, तो स्वास्थ्य को लेकर जो पूरी कहानी बताई जा रही है, वह सिर्फ एक नाटक है.”

उन्होंने कहा कि यह पुलिस, न्यायपालिका और शिक्षा व्यवस्था का “गलत इस्तेमाल” है. उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि वांगचुक 20 जुलाई को संसद तक होने वाले शांतिपूर्ण मार्च में शामिल न हो सकें.

इससे पहले रविवार को वांगचुक ने अपनी पत्नी के माध्यम से एक्स पर एक हस्तलिखित नोट साझा किया. इसमें उन्होंने कहा कि उन्हें सफदरजंग अस्पताल में “गैरकानूनी हिरासत” में रखा गया है. इस नोट में लोगों से 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा बुलाए गए संसद मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील भी की गई. इसमें इस मार्च को “भारत का दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन” बताया गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: क्या वांगचुक को हटाया जाना ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ? जंतर-मंतर पर सैकड़ों लोग समर्थन में जुटे


 

share & View comments