Thursday, 11 August, 2022
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दिल्ली: 125 कोविड डेड बॉडी दफ़न कराने वाले शमीम ने कहा- न तो मिले पर्याप्त पीपीई किट, न ही इंश्योरेंस

दिल्ली गेट स्थित 'कब्रिस्तान अहले इस्लाम' के सुपरवाइज़र मोहम्मद शमीम पिछली 3 पुश्तों से यहां काम कर रहे हैं. अब कोविड वाली डेड बॉडी भी दफ़नवाने में लगे शमीम की मांग है कि उन्हें भी इंश्योरेंस समेत अन्य सुविधाएं दी जाएं.

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नई दिल्ली: देश की राजधानी में कोविड-19 से मरने वालों को दफ़नाने के लिए दिल्ली गेट स्थित ‘कब्रिस्तान अहले इस्लाम’ में लाया जा रहा है. यहां के सुपरवाइज़र मोहम्मद शमीम पिछली तीन पुश्तों से लाशों को दफ़न कराने का काम करते आए हैं. अब कोविड वाली डेड बॉडी भी दफ़न कराने के काम में लगे शमीम की मांग है कि बाकी के ‘कोरोना वॉरियर’ की तरह सरकार उन्हें भी इंश्योरेंस समेत अन्य सुविधाएं दे.

दिप्रिंट से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘अभी तक मैंने 125 लाशों को दफ़न कराने का काम किया है. इनमें कोविड पॉज़िटिव के अलावा ऐसे भी मृतक थे जिन्हें कोविड होने की शंका थी.’ शमीम के मुताबिक 45 एकड़ के इस कब्रिस्तान के करीब 6 बीघा ज़मीन को कोविड के लिए रखा गया है जिसमें आधी ज़मीन अब तक इस्तेमाल हो चुकी है.


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हालांकि, उनका काम लोगों को ये बताना है कि मृतक के शरीर को एंबुलेंस से उतारने के बाद दफ़नाने तक क्या-क्या करें. ऐसे में उन्हें हर बार मृतक के पास नहीं जाना पड़ता लेकिन कई बार जब लावारिस लाशें आ जाती हैं या परिवार वाले शरीर को छूने से मना कर देते हैं तो उन्हें शव दफ़नाने का भी काम करना पड़ता है.

अब तक ऐसे 5-6 शवों को दफ़नाने का काम कर चुके शमीम का कहना है कि अब तक उन्हें महज़ 25-30 पीपीई किट मिले हैं. उनका कहना है कि शव को दफ़न करने के काम में तीन चार लोग लगते हैं. जब ये काम करना होता है तो उन्हें कब्रिस्तान के मौलाना समेत अन्य लोगों की मदद लेनी पड़ती है.

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कई बार ऐसे लोग भी आते हैं जिनके पास किट्स नहीं होतीं. उन्होंने मांग करते हुए कहा, ‘सरकार हमें ज़्यादा पीपीई किट मुहैया कराए ताकि हम ख़ुद को तो बचा ही सकें, बाकियों की भी मदद कर सकें.’ उनका कहना है कि उन्हें हर बार डेड बॉडी के करीब नहीं जाना होता लेकिन परिवार वालों और बॉडी लाने वाली एबुलेंस वाले तो उनके संपर्क में आते ही हैं.

ऐसी बातों का ख़तरा बताते हुए उन्होंने सरकार से इंश्योरेंस समेत उन तमाम सुविधाओं की भी मांग की है जो किसी भी कोरोना वॉरियर को मिल रही है. उनका तर्क है, ‘कब्रगाह और काम भले प्राइवेट हो लेकिन डेड बॉडी सरकारी अस्पतालों से आ रही हैं. सरकार ने ही हमें यहां इन बॉडीज़ को दफ़नाने को कहा है.’

इन्हीं ख़तरों का हवाला देते हुए वो तमाम सुविधाओं की मांग करते हैं. उनका ये भी कहना है कि इससे सिर्फ़ उन्हें ही नहीं उनके परिवार को भी ख़तरा है. कब्रितान में ही झुग्गी में रहने वाले शमीम का वैसे तो पूरा परिवार यहीं रहता है लेकिन वो अपने माता-पिता और बच्चों के सपंर्क में नहीं आते और सिर्फ़ अपनी बीबी के साथ रहते हैं.

जिस कमरे में वो रहते हैं वो कोई 8 से 10 फीट का होगा जिसमें मुश्किल से किसी सोशल डिस्टेंसिंग की गुंजाइश है. उन्हें और उनकी बीबी को लाख़ सैनिटाइज़ेशन के बाद भी वायरस फै़लने का डर लगा रहता है. उनकी बीबी पीरो हाजरा ने कहा, ‘वापस आने के बाद इन्हें नहलवाने और कपड़े बदलवाने का काम मैं ही करती हूं.’

उन्होंने ये भी कहा कि वो अपने पति को खाना तक अलग देती हैं लेकिन वायरस से महमारी को लेकर जो माहौल है उससे भय बना रहता है. हाजरा का असली दर्द तब निकल कर सामने आया जब उन्होंने कहा कि उनके पति और वो अपने बच्चों से 2 महीने से दूर से ही सपंर्क करते हैं.

इसकी वजह ये है कि शमीम ने 55 दिनों से एक दिन की छुट्टी नहीं ली और लगातार अपने काम में लगे हुए हैं. ऐसी मेहनत के बावजूद उन्हें एक बॉडी के लिए महज़ 100 रुपए की रकम मिलती है. 25 साल से ये काम कर रहे शमीम को इसके अलावा और कुछ भी नहीं मिलता.

बृहस्पतिवार को अपनी कोविड पीड़ित मां की बॉडी लेकर यहां पहुंचे मोहम्मद नदीम (बदला हुआ नाम) ने शमीम के काम की तरीफ़ करते हुए कहा, ‘इन्होंने ने ही बताया कि हमें रस्सी और पीपीई किट लेकर आना है. उन्होंने गाइडलाइन समझाई और हमें तैयार कराने से लाश को दफ़नाने तक में काफ़ी मदद की.’

इस कब्रिस्तान में प्रकृतिक मौत मरने वालों को भी दफ़नाया जाता है और कोविड वालों को भी. हालांकि, दोनों को दफ़नाए जाने में काफ़ी अंतर है. पहले के लिए 3-4 फिट का गड्ढा खुदता है और दूसरे के लिए 9-10 फिट का. कोविड बॉडीज़ के लिए गड्ढे की खुदाई में जेसीबी मशीन लगती है.


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यहां जेसीबी से खुदाई करने वाले शेर सिंह ने बताया कि करीब 9-10 फिट का गड्ढा खोदते हैं. उससे ज़्यादा में पानी आ जाता है. कोविड की बॉडी को काफ़ी गहरे में दफ़नाया जा रहा है. शेर ने भी शमीम की तारीफ़ करते हुए कहा कि वो समझाते रहते हैं कि बॉडी आए तो गड्ढा खोदकर दूर चले जाया करो.

यही दूरी गैर-कोविड और कोविड वाली डेड बॉडी के साथ आए परिवारों में भी दिखती है. शमीम बताते हैं कि गैर-कोविड वाले अपने मृतक को नहलाते हैं और बड़े सलीके से दफ़नाते हैं. कोविड तो आख़िरी वक्त में प्यार दिखाने का भी मौक़ा नहीं देता. परिवार वालों में घबराहट ऊपर से रहती है. ऐसे में कुछ लोग शमीम को बख्शीश के तौर पर कुछ दे जाते हैं.

हालांकि, सरकारी मदद की बात पर लौटते हुए शमीम कहते हैं ऐसे भयानक समय में उन्हें बख्शीश के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए.

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