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Wednesday, 25 March, 2026
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दिल्ली अदालत ने कश्मीरी अलगाववादी आसिया अंद्राबी को नरमी न देने के लिए कसाब से तुलना की

NIA कोर्ट ने कहा कि दोषी ठहराए गए तीनों लोगों—जिनमें उनके सहयोगी भी शामिल हैं—की गतिविधियां स्पष्ट रूप से अलगाववाद से जुड़ी हुई हैं; कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि सज़ा के मामले में नरमी बरतने से एक गलत संदेश जाएगा.

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नई दिल्ली: 26/11 के हमलावर अजमल कसाब की परछाई अलगाववादी आसिया अंद्राबी और उनकी दो साथियों पर तब मंडरा गई, जब मंगलवार को उन्हें सज़ा सुनाई गई. जज ने कहा कि भारत से कश्मीर को अलग करने और अलग-अलग गुटों के बीच दुश्मनी बढ़ाने वाली गतिविधियों पर उन्हें कोई पछतावा नहीं था; उनका यह रवैया बिल्कुल वैसा ही था जैसा पाकिस्तान के लश्कर आतंकवादी ने दिखाया था.

प्रतिबंधित संगठन ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ (DeM) की चेयरपर्सन अंद्राबी को, जो एक पूरी तरह से महिलाओं का संगठन था, उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. वहीं, उनकी दो साथियों—सोफी फहमीदा और नाहिदा नसरीन—को 30-30 साल की जेल की सज़ा दी गई. सोफी DeM की प्रेस सेक्रेटरी हैं, और नाहिदा इस संगठन की जनरल सेक्रेटरी हैं.

इन तीनों को जनवरी में दिल्ली की नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की एक अदालत ने दोषी ठहराया था. एजेंसी द्वारा इनकी गिरफ्तारी के लगभग सात साल बाद यह फैसला आया.

इन तीनों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B (आपराधिक साज़िश), 121A (सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साज़िश के लिए सज़ा), 153 (A&B) (धर्म के आधार पर गुटों के बीच दुश्मनी बढ़ाना और राष्ट्रीय एकता के लिए नुकसानदेह बातें कहना), 505 (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान देना) और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे और उन्हें दोषी ठहराया गया था. UAPA की ये धाराएं आतंकवादी हमले करने की साज़िश रचने, ऐसे कामों के लिए फंड जुटाने आदि से संबंधित हैं.

मंगलवार को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंद्र जीत सिंह ने टिप्पणी की कि अंद्राबी जिस ‘इक़ामत-ए-दीन’ की अवधारणा का पालन कर रही थीं, उसका ज़िक्र कहीं और नहीं मिलता—सिवाय पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बहावलपुर में रहने वाले दो विद्वानों की लिखी किताबों के.

पाकिस्तानी विद्वानों की उन्हीं किताबों का हवाला देते हुए जज ने कहा कि यह कुरान की एक बुनियादी अवधारणा है. इसके तहत व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन के सभी पहलुओं में इस्लाम को पूरी तरह से लागू करने की बात कही गई है. आरोपियों का मकसद यह था कि धर्म के आधार पर कश्मीर को पाकिस्तान में मिला दिया जाए.

अपनी बात को साबित करने के लिए जज ने काज़ी अब्दुल वदूद और मुहम्मद मुआविया खान की लिखी किताबों का हवाला दिया. ये दोनों ही बहावलपुर की इस्लामिया यूनिवर्सिटी के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग से जुड़े थे. पछतावे के मुद्दे पर, जज ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया जो कसाब के मामले में आया था—वह अकेला पाकिस्तानी आतंकवादी जो मुंबई में 26/11 के हमले के दौरान ज़िंदा पकड़ा गया था.

“मुहम्मद अजमल मुहम्मद आमिर कसाब @अबू मुजाहिद बनाम महाराष्ट्र राज्य नामक मामले में, 29.08.2012 को दिए गए अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि इस मामले का सबसे दुखद और परेशान करने वाला पहलू यह है कि अपीलकर्ता ने अपने किए पर कभी कोई पछतावा नहीं दिखाया. मौजूदा मामले में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है. किसी भी दोषी ने अपने कृत्यों के प्रति कोई पछतावा नहीं दिखाया है; बल्कि, यह कहा गया है कि उन्हें अपने किए पर गर्व है और वे आगे भी यही काम करते रहेंगे,” जज सिंह ने टिप्पणी की.

इसलिए, उन्होंने लिखा कि इन तीनों के प्रति दिखाई गई कोई भी नरमी एक गलत संदेश देगी. “दोषियों के प्रति दिखाई गई कोई भी नरमी, समान विचारधारा वाले अन्य लोगों को यह संदेश दे सकती है कि वे कुछ साल जेल में बिताकर ऐसे कृत्यों से बच निकल सकते हैं, और यह भारत के किसी हिस्से को अलग करने (विभाजन) के विचारों को बढ़ावा दे सकती है.”

अपनी ओर से, NIA ने सभी आरोपियों के लिए अधिकतम सज़ा की मांग की थी, यह कहते हुए कि ऐसे भड़काऊ भाषणों की बुराई को अधिकतम सज़ा देकर शुरू में ही कुचल दिया जाना चाहिए, जिससे ऐसे व्यक्तियों को एक कड़ा संदेश मिले. NIA ने अदालत के सामने तर्क दिया कि भारत ने आतंकवादी कृत्यों से बहुत नुकसान उठाया है, जिसमें पहलगाम, पुलवामा, उरी और लाल किले के पास हाल ही में हुए हमले शामिल हैं, जिनमें कई बेकसूर लोगों की जान चली गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए.

अदालत ने वकील के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सज़ा की मात्रा तय करते समय दोषियों की शिक्षा पर विचार किया जाना चाहिए. “दोषियों का शिक्षित महिलाएं होना, उनके कृत्यों के परिणामों के लिए उनकी जवाबदेही को कम करने के बजाय और बढ़ा देता है; क्योंकि एक शिक्षित व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि उसने अपने कार्यों के संबंध में सोच-समझकर फैसला लिया होगा, न कि कोई काम सहज-वृत्ति (बिना सोचे-समझे) से किया होगा.”

हालांकि, अदालत ने तीनों को IPC की धारा 121 (सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना) के तहत लगाए गए आरोप से बरी कर दिया. अदालत ने इसका कारण यह बताया कि उनके भाषणों और अवैध कृत्यों के परिणामस्वरूप ऐसी कोई गतिविधि सामने नहीं आई, जिसे सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के बराबर माना जा सके.

‘हमारे संघर्ष के लिए बंदूक ज़रूरी है’

NIA ने अपनी चार्जशीट में आरोप लगाया था कि अंद्राबी ने 1980 के दशक में DeM के बैनर तले धार्मिक सभाएं और जलसे आयोजित किए थे, जिनका घोषित उद्देश्य कश्मीर को भारत से अलग करना था. एजेंसी ने आरोप लगाया कि आसिया अंद्राबी और उनकी दो साथियों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके कई भड़काऊ भाषण फैलाए, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा युवा महिलाओं को DeM में शामिल होने और उनके मकसद का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया जा सके.

NIA ने अंद्राबी को एक और आतंकी संगठन, लश्कर-ए-जब्बार का मुखर समर्थक बताया और आरोप लगाया कि उन्होंने विभिन्न अलगाववादी नेताओं, विशेष रूप से मसर्रत आलम और सैयद अली शाह गिलानी के साथ मिलकर काम किया. एजेंसी ने उन्हें 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद कश्मीर घाटी में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों से भी जोड़ा था.

दोषसिद्धि के आदेश में जज द्वारा बताए गए अन्य सबूतों में अंद्राबी द्वारा जनवरी 2018 में एक स्थानीय अखबार को दिया गया एक इंटरव्यू भी शामिल है. “मुझे लगता है कि ज़्यादा से ज़्यादा युवा उग्रवादियों में शामिल होंगे और हमारा सशस्त्र संघर्ष दिन-ब-दिन मज़बूत होता जाएगा. भारतीय कब्ज़ा करने वाली सेनाओं द्वारा की जा रही हत्याएं और दुर्व्यवहार केवल उग्रवाद को ही बढ़ाएंगे. बंदूक हमारे लक्ष्य को पाने का ज़रिया है, लेकिन हमें अपने राजनीतिक संघर्ष को भी मज़बूत बनाना होगा. मेरा मानना है कि कश्मीर मुद्दा केवल जनमत संग्रह के ज़रिए ही हल हो सकता है. हालांकि, जनमत संग्रह करवाने के लिए हमें अपना संघर्ष जारी रखना होगा और उसके लिए बंदूक ज़रूरी है,” अंद्राबी ने उस इंटरव्यू में कहा था और जज ने NIA की दलीलों के आधार पर उस अंश को अपने फैसले में शामिल किया.

जज ने इंटरव्यू के उस अंश और अंद्राबी के अन्य लेखों और बयानों का हवाला देते हुए उन दलीलों को खारिज कर दिया कि उनकी गतिविधियां भारत के संविधान में दिए गए बोलने की आज़ादी के मौलिक अधिकार के दायरे में आती हैं.

“संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में यह साफ़ तौर पर कहा गया है कि जहां तक उचित प्रतिबंधों का सवाल है, बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी को हमेशा सीमित या प्रतिबंधित किया जा सकता है, अगर इससे भारत की संप्रभुता और अखंडता पर बुरा असर पड़ता हो. भारत के किसी हिस्से को बाकी भारत से अलग करने की कोशिश करना, भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने का एक साफ़ मामला है,” जज सिंह ने दोषसिद्धि के फैसले में यह टिप्पणी की. मौजूदा मामले में, कोर्ट ने कहा कि DeM की गतिविधियां कश्मीर को—जो भारत का एक अभिन्न अंग है—देश से अलग करने से जुड़ी थीं. इसके लिए ‘आत्म-निर्णय के अधिकार’ के दावे का बहाना बनाया गया था. इस मकसद को बढ़ावा देने के लिए अंद्राबी ने कई भाषण दिए और इंटरव्यू दिए, और दूसरों को भी अपने साथ जुड़ने के लिए उकसाया.

जज सिंह ने यह भी पाया कि अंद्राबी और उसके साथियों की गतिविधियों का मूल आधार यह सोच थी कि कश्मीर—जहाँ की लगभग 90 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है—को पाकिस्तान में चला जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह बात उनके उस नैरेटिव (कथानक) के साथ-साथ चल रही थी, जिसके अनुसार उपमहाद्वीप का बँटवारा ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ के आधार पर हुआ था, और जिसका आधार धर्म था.

उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि अंद्राबी और उसकी गतिविधियां उन दूसरे इलाकों के बारे में ऐसी ही बातें नहीं कर रही थीं, जहां मुसलमान बहुसंख्यक थे. जज सिंह ने कहा, “हालांकि, आरोपी महिला कश्मीर को भारत से अलग करके पाकिस्तान में मिलाने के अपने दावे का आधार धर्म को बताती है, लेकिन वह भारत में रहने वाले दूसरे मुसलमानों की स्थिति के बारे में—यहां तक कि उन इलाकों के बारे में भी जहां मुसलमानों की आबादी बहुसंख्यक हो सकती है—पूरी तरह से चुप है. आरोपी के पूरे नैरेटिव का केंद्र सिर्फ़ कश्मीर है, और कुछ नहीं.”

“दिलचस्प बात यह है कि आरोपी यह दावा कर रही है कि UN के प्रस्ताव के आधार पर उसे ‘आत्म-निर्णय का अधिकार’ हासिल है; लेकिन, साथ ही, वह यह भी दावा कर रही है कि कश्मीर तो पहले से ही पाकिस्तान का हिस्सा है और भारत ने कश्मीर पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है. इसलिए, यह साफ़ है कि आरोपी का संविधान के प्रति कोई निष्ठा नहीं है, वह संविधान में विश्वास नहीं रखती, और न ही वह संविधान तथा भारत की संप्रभुता को बनाए रखने के लिए तैयार है—क्योंकि वह भारत के एक अभिन्न अंग को अलग करने की मांग कर रही है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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