करण पांडे की फाइल तस्वीर
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नई दिल्ली: दर्जनों दस्तावेज़ उठाती हुई, वह नई दिल्ली के पटियाला हाउस न्यायालय के परिसर की रजिस्ट्री में कदम रखती है. फिर जल्दी से वहां एक अर्जी लिखती है, उस पर साइन करती है, अटेस्ट करवाती है और जमा करने से पहले फोटोकॉपी करवाती है.

एक और अर्जी के लिए उनका गंतव्य है — दिल्ली हाई कोर्ट.

पिछले पांच सालों से 45 वर्षीया मंजू पांडे 2013 में दिल्ली पुलिस द्वारा गोली से मारे गए अपने 19 वर्षीय पुत्र करण पांडे के लिए न्याय पाने की चाहत में दिल्ली के कोर्ट परिसरों के चक्कर काटती फिर रही हैं.

और इस प्रक्रिया में, गृहिणी मंजू बताती है कि सरकारी दफ्तर में वे एक कदम भी न रख पाती थी, अब उन्होंने कानूनी कागज़ातों को पढ़ने में महारत हासिल कर गयी है.

सोमवार को उनके निरंतर प्रयासों ने एक बड़ा मोड़ लिया: एक ज़िला न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को इंस्पेक्टर रजनीश परमार के खिलाफ केस दर्ज करने को कहा जिन्होंने 2013 में कथित तौर पर करण और उनके दोस्तों पर सरेआम गोली चलाई थी. वे केंद्रीय दिल्ली के कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में मोटरसाइकलों पर स्टंटबाज़ी करने वाले गुटों का में शामिल थे.

कथित तौर पर गोली करण को लगी जो पिछली सीट पर बैठे थे और उनकी मौत हो गयी.

‘28 जुलाई 2013 की उस रात ने मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल कर रख दी. मैंने पहले कभी कोई सरकारी दफ्तर नहीं देखा था. कभी कोई कानूनी दस्तावेज़ नहीं देखे, लेकिन अब मैं सब जानती हूं. अब मुझे पता है कि कैसे अर्ज़ी डालनी है, रजिस्ट्री कहां पर है, दस्तावेज़ों को अटेस्ट कैसे करना है, कहां पर अर्जी डालनी है और कैसे आरटीआई फाइल करनी है.’

उन्होंने कहा कोर्ट का परिसर अब उनकी ज़िंदगी का एक सामान्य हिस्सा बन गया है. उन्होंने कहा ‘हालात सब कुछ सीखा देते हैं.’

मंजू एक एकल मां थीं, और करण उनका इकलौता पुत्र था. अब वे मालवीय नगर स्थित अपने घर में अकेले ही रहती हैं और उत्तम नगर स्थित एक प्रॉपर्टी से मिलने वाले किराये से अपना गुज़ारा कर रही हैं.

“ऐसे कई मौके आए हैं जब मैं एक दम टूटा हुआ महसूस करती थी, लाचार महसूस करती थी, सोते वक़्त रोती थी — पूरी तरह से टूटी हुई थी. पर मेरे कमरे में पड़ी मेरे बेटे की इकलौती तस्वीर ने मुझे बहुत हिम्मत दी. मैं उसे निराश नहीं कर सकती. मैं उसकी फोटो देखती हूं और फिर खड़ी हो उठती हूं. मैं अंत तक लड़ाई लड़ती रहूंगी.

पत्र, अपीलों और आरटीआई का लम्बा सिलसिला

मंजू ने बताया कि कई सालों तक उन्होंने दिल्ली पुलिस के कमिशनरों, गृह मंत्री, राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन और उपराज्यपाल को इंस्पेक्टर परमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए चिट्ठियों पे चिट्ठियां लिख कर भेजा.

उन्होंने बताया कि कई दिन तो वे दिल्ली पुलिस के हेडक्वार्टर, पटियाला हाउस कोर्ट के परिसर और स्थानीय पुलिस स्टेशन के चक्कर ही लगाती रह जाती थीं, और उनको खाली हाथ लौटना पड़ता.

मंजू ने कहा, ‘पहले तो उन्होंने (दिल्ली पुलिस) मुझे सांत्वना दिखाई मुझे कहा करते थे कि मुझे न्याय मिलेगा. लेकिन मीडिया ने इस केस को तवज्जो देनी बंद कर दी, तो वे मुझसे दूर भगाने लगे. एक उच्च पुलिस अधिकारी ने मुझे मेरे मुंह पर यह भी कह दिया कि उस इंस्पेक्टर के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जाएगा और मुझे समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. मुझे यह भी कहा गया कि मुझे 50 लाख रुपये का मुआवज़ा मिल चूका है और मुझे उसी से संतुष्ट रहना चाहिए.’

कथित तौर पर पुलिस की इस निष्क्रियता के चलते, मंजू  पुलिस के खिलाफ खुद से सबूत इकट्ठे करने पर मजबूर हो गयीं. मंजू ने कई आरटीआई फाइल की, उन्होंने इंस्पेक्टर के सर्विस रिकॉर्ड की जानकारी मांगी, कोर्ट में अर्जी दायर की ताकी उसके खिलाफ हुई पूछताछ की डिटेल निकलवा सकें, और पुलिस को भी इस केस से जुड़े सबूत देने को कहा जिसमें सीसीटीवी फुटेज भी शामिल है.

मंजू ने बताया, ‘जब मानवाधिकार आयोग ने भी मेरी मदद न की, तब मैंने अर्ज़ियां डालनी शुरू कर दी ताकि इस इंस्पेक्टर का पर्दाफाश कर सकूं. मैंने आरटीआई के बारे में पढ़ना शुरू किया और थोड़ी सी मदद के साथ इंस्पेक्टर के पुराने रिकॉर्ड के बारे में जानकारी पाने के लिए भी अर्ज़ी डाली. मैंने यह पाया कि वह दो मामलों में शामिल है और इसकी जानकारी मैंने विजिलेंस कमीशन को भी दी.’

‘मुझे तो इस बात का कोई अंदाज़ा ही नहीं था कि ऐसा डिपार्टमेंट भी होता है’.

दो भिन्न जांच और कोर्ट का सख्त आदेश

मंजू इस मामले की एक भी सुनवाई पर अनुपस्थित नहीं रही हैं. ‘मेरे वकील इस केस में मेरा प्रतिनिधित्व कर रहे थे, लेकिन वो भी रुक गए. इसके बाद में खुद ही जाने लगी और जज के आगे सबूत भी रखने लगी. अब मैं इस केस की फाइलों से इतनी वाक़िफ़ हो चुकी हूं कि मैं यह केस खुद लड़ सकती हूं.

दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया ‘हमनें विभागीय स्तर पर इसकी जांच की और एक विस्तृत रिपोर्ट जमा कर दी है. अब इस नए आर्डर के साथ हम इस मामले को देखेंगे और उसी हिसाब से एक्शन भी लेंगे”.

आपको बता दें कि पुलिस की विभागीय स्तर हुई जांच में परमार को क्लीन चिट मिल गयी थी.

पांडे की मौत ने 2013 में खूब सुर्खियां बंटोरी थी. इस मामले को लेकर कई जांच पड़ताल हुई, जिसमें एक मजिस्ट्रेट स्तर की, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की और विभागीय स्तर की जांच भी शामिल थीं.

वहीं जहां मजिस्ट्रेट लेवल जांच ने इंस्पेक्टर को दोषी ठहराया, विभागीय स्तर की जांच ने उन्हें क्लीन चिट दे दी.

दिल्ली पुलिस को दिए कोर्ट के सख्त आर्डर में कहा गया था की वह इंस्पेक्टर के खिलाफ कोई भी कार्रवाई न होने से वो ‘त्रस्त थी’. कोर्ट ने कहा, ‘यहां, पूरी प्रणाली यही दर्शा रही है कि शिकायतकर्ता का ही कोई दोष है. और इस प्रक्रिया में 5 अमूल्य साल भी बर्बाद हो गए.”

कोर्ट के आर्डर से मंजू ने ‘राहत की सांस ली’ और कहा कि अब वे इंस्पेक्टर को जेल में देखना चाहती हैं. ‘जिस आदमी ने मेरे बेटे को जान से मार दिया, वो आज भी पुलिस में काम कर रहा है. उसके खिलाफ केस दर्ज करना तो दूर, उसे एक भी दिन के लिए सस्पेंड नहीं किया गया या डिस्ट्रिक्ट लाइन्स में भेजा गया जहां जांच चल रही थी.’

“मैं तो बस उसे सलाखों के पीछे देखना चाहती हूं, और उसी दिन मैं शांति से बैठूंगी. यही अब मेरी ज़िंदगी का एकमात्र मकसद बन चुका है.”

कोर्ट ने पुलिस को इस मामले में तीन हफ़्तों में एक विस्तृत रिपोर्ट भेजने के निर्देश भी दिए हैं.

मंजू ने कहा, ‘ अगर कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस कोई कार्रवाई करती है, तो ठीक है, नहीं तो मैं हाई कोर्ट में जाने को अभी से तैयार हूं. मेरी अर्ज़ी तैयार है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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