Thursday, 30 June, 2022
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‘हिंदू भीड़’ का हिस्सा होने के आरोपी मुस्लिम को कोर्ट ने जमानत दी- दिल्ली पुलिस के अपील करने की संभावना कम

कोर्ट ने पिछले महीने इस आधार पर उस मुस्लिम व्यक्ति को जमानत दे दी कि जिस पर ऐसी ‘गैरकानूनी भीड़’ का हिस्सा होने का आरोप लगा था जिसमें ज्यादातर हिंदू शामिल थे और दंगे के मामले में एक मुस्लिम की हत्या कर दी गई थी.

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में फरवरी 2020 के दंगों से जुड़े एक मामले में दिप्रिंट को मिली जानकारी के मुताबिक दिल्ली पुलिस की तरफ से एक ट्रायल कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील करने की संभावना नहीं है, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति को इस आधार पर जमानत दे दी गई थी कि वह उस ‘गैरकानूनी भीड़’ का हिस्सा नहीं हो सकता जिसमें ज्यादातर हिंदू थे और उन्होंने एक मुस्लिम की हत्या कर दी थी.

विशेष लोक अभियोजक मनोज चौधरी, जिन्होंने इस मामले में दिल्ली पुलिस की ओर से दलीलें पेश की थीं, ने दिप्रिंट को बताया कि उनकी जानकारी के मुताबिक 12 दिसंबर 2020 को सुनाए गए आदेश के खिलाफ अपील किए जाने का कोई इरादा नहीं है.

हत्या के मामले में आरिफ नामक शख्स को जमानत देने का फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा था, यह बात एकदम ‘असामान्य’ लगती है कि एक मुस्लिम लड़का उस ‘गैरकानूनी भीड़’ का हिस्सा होगा जिसमें ज्यादातर हिंदू समुदाय के सदस्य शामिल होंगे और उनका इरादा एक ही होगा कि दूसरे समुदाय (मुस्लिम) की संपत्ति और जनजीवन को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना.

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने अपने आदेश में कहा कि मामले में पीड़ित मुस्लिम था. वहीं, स्पष्ट तौर पर माना जा रहा है कि ‘गैरकानूनी भीड़’ के रूप में जमा ज्यादातर आरोपी हिंदू थे.

यह देखते हुए कि आरिफ एक मुस्लिम है, जज ने कहा कि वह पुलिस की इस दलील से सहमत नहीं हैं कि जमानत के लिए अपील करने वाला यह आरोपी इस ‘समान इरादे’ के साथ ज्यादातर हिंदुओं वाली दंगाई भीड़ में शामिल था, कि उसे मुस्लिम लोगों की हत्या करनी है.

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जज ने कहा, ‘…यह बात गले के नीचे नहीं उतरती कि ऐसे उत्तेजना भरे माहौल में एक मुस्लिम युवक उस ‘गैरकानूनी भीड़’ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगा जिसमें मुख्य रूप से हिंदू वर्ग के लोग शामिल हों और जो एक मुस्लिम लड़के को पीट-पीटकर मार डाले.’

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यादव ने आरिफ को 20,000 रुपये के निजी मुचलके पर जमानत देते हुए कहा, ‘ऐसे में प्रथम दृष्टया आवेदक को घटना के दिन समान इरादे के साथ उस ‘गैरकानूनी भीड़’ का हिस्सा नहीं माना जा सकता है.’

दिल्ली पुलिस ने इस आदेश को अभी तक चुनौती नहीं दी है और आगे भी ऐसा होने की गुंजाइश नज़र नहीं आ रही है.


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अदालत में दलीलें

आरिफ को कथित अपराध के लगभग दो महीने बाद 16 अप्रैल 2020 को गिरफ्तार किया गया था. इस मामले में 21 मार्च 2020 को एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें बताया गया कि 25 फरवरी को सांप्रदायिक दंगों के दौरान विभिन्न स्थानों पर चार शव बरामद किए गए थे.

उनमें से एक की पहचान अशफाक हुसैन के रूप में हुई थी, जिसकी हत्या के लिए आरिफ और चार हिंदुओं के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था.

आरिफ के वकील ने जहां गिरफ्तारी के साथ-साथ एफआईआर दर्ज किए जाने में ‘बेवजह देरी’ पर सवाल उठाया, वहीं चौधरी ने दलीलों के मुकाबले में अपराध की गंभीरता पर जोर दिया.

अभियोजन पक्ष ने आरिफ के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) का हवाला देते हुए कहा कि ये घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी को पुष्ट करता है. इसके अलावा, साइट के सीसीटीवी फुटेज में कथित तौर पर आरिफ को हाथ में पत्थर लिए दिखाया गया था. अभियोजक ने कहा कि उपद्रवी भीड़ ने पथराव किया, तोड़फोड़ की और कई दुकानों में आग लगा दी और तीन मुस्लिम लड़कों को पकड़ा और गंभीर रूप से पीटा. साथ ही कहा कि सीडीआर से वहां आरिफ की मौजूदगी की पुष्टि होती है.

हालांकि, पुलिस की दलीलों को खारिज करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि आरिफ अदालत के सामने पेश किए गए किसी भी सीसीटीवी या वीडियो फुटेज में दिखाई नहीं दे रहा. सीडीआर से पता चली लोकेशन के बारे में अदालत ने कहा कि आरिफ चूंकि उसी इलाके का निवासी था, इसलिए पुलिस के इस तर्क को अभियोजन के लिहाज से बहुत मजबूत नहीं माना जा सकता.

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि चूंकि दंगाई भीड़ का हिस्सा होने के आरोप आरिफ के खिलाफ एकदम पुख्ता नहीं होते हैं, इसलिए उस पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 यानी हत्या के आरोप के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. उन्होंने पुलिस को दिए गए आरिफ के इकबालिया बयान पर भरोसा करने से इनकार कर दिया, साथ ही कहा कि इसका कोई मतलब नहीं है.

कोर्ट ने कहा आरिफ के मामले की तुलना अन्य अभियुक्तों के साथ नहीं की जा सकती, जिन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि दूसरा पक्ष हिंदू समुदाय से था और उस भीड़ का हिस्सा था जिसने दूसरे समुदाय के लोगों को निशाना बनाया था.

यह देखते हुए कि मुकदमे में अभी एक लंबा समय लगने की संभावना है, अदालत ने तय किया कि आरिफ को सिर्फ इस वजह से अनंतकाल तक जेल में कैद नहीं रखा जा सकता कि इस मामले में दंगाई भीड़ में शामिल अन्य लोगों की पहचान करके गिरफ्तार किया जाना है.

अदालत ने कहा कि जमानत की शर्तों के तहत आरिफ को दयालपुर पुलिस स्टेशन के एसएचओ को अपना मोबाइल नंबर उपलब्ध कराना होगा, साथ ही न्यायाधीश ने कहा कि यह मोबाइल काम करता रहे, यह सुनिश्चित करना आरोपी की जिम्मेदारी है. इसके अलावा, आरिफ को अपने फोन पर आरोग्य सेतु एप इंस्टॉल करने के लिए भी कहा गया.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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