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Thursday, 13 June, 2024
होमदेश‘लौटा दो पुरानी पेंशन’ : पेंशन योजना बहाल करने के लिए पूरे देश में लगातार तेज हो रहा आंदोलन

‘लौटा दो पुरानी पेंशन’ : पेंशन योजना बहाल करने के लिए पूरे देश में लगातार तेज हो रहा आंदोलन

विजय कुमार बंधु की पहल के तौर पर शुरू हुई ओपीएस की मांग अब यूपी, मध्यप्रदेश, हिमाचल, आंध्र प्रदेश और झारखंड में एक प्रमुख मुद्दा बन गई है और सपा ने तो इसे अपने चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बनाया है.

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नई दिल्ली: समाजवादी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में एक ऐसा मुद्दा शामिल है जिसकी लंबे समय से मांग की जा रही थी. सपा का इसे अपने घोषणापत्र में शामिल करना इस बात का प्रमाण है कि राज्य विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी ने इसे चुनावी वादे के रूप में शामिल किया है.

सपा के घोषणापत्र में जगह बनाने वाला नया मुद्दा है, देशभर के सरकारी कर्मचारियों की तरफ से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) बहाल किए जाने का आह्वान—जिसकी मांग कुछ राज्यों में तेजी से जोर पकड़ती जा रही है.

सपा की तरफ से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में ओपीएस का जिक्र किए जाने के संदर्भ में जेएलएनसीडी रस्तोगी इंटर कॉलेज में सरकारी लेक्चरर 44 वर्षीय विजय कुमार बंधु ने कहा, ‘हमें नई ऊर्जा मिल गई है.’

बंधु की ओपीएस बहाली की मांग को लेकर आंदोलन खड़ा करने में अहम भूमिका रही है और 2013 से ही वह इसे आगे बढ़ाने में जुटे. यही वजह है कि ये आंदोलन अब तक कई राज्यों में ठोस आकार ले चुका है.

सपा की तरफ से राजनीतिक स्वीकृति की मुहर ने इसे अन्य भारतीय राज्यों में भी गति दी है.

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हिमाचल प्रदेश में, जहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं, ओपीएस फिर लागू करने के मुद्दे पर भाजपा सरकार को विपक्ष के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों की आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ रहा है.

जब कांग्रेस ने इस सत्र में विधानसभा से वाकआउट किया और लाखों सरकारी कर्मचारियों ने इसका घेराव किया, तो भाजपा सरकार को ये मामला देखने के लिए एक समिति गठित करने पर बाध्य होना पड़ा.

झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 2019 के विधानसभा चुनावों के दौरान ‘एनपीएस (नेशनल पेंशन सिस्टम) है केवल टेंशन लौटा दो हमारी पुरानी पेंशन’ नारे का इस्तेमाल किया था.

अब, सरकारी कर्मचारी संघों की तरफ से उन पर अपना वादा पूरा करने का दबाव डाला जा रहा है, क्योंकि उनका दावा है कि इस मुद्दे की वजह से ही उन्हें जमकर वोट मिले थे और अब समय आ गया है कि वह इस योजना पर अमल करें.

इसी तरह, आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी ने 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने घोषणापत्र में राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली खत्म करने की घोषणा की थी. उन्होंने 31 मार्च तक ओपीएस बहाल करने का रोडमैप बना लेने की भी घोषणा की है.

वहीं, मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारी संगठनों ने 13 मार्च को भोपाल में आंदोलन करने की योजना बनाई है.

इसी तरह के घटनाक्रम छत्तीसगढ़ में भी सामने आए हैं, जहां अगले साल चुनाव होने वाले हैं.

ओपीएस मुद्दे पर जंग लड़ने वालों को 23 फरवरी को उस समय एक उल्लेखनीय जीत भी हासिल हुई जब राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने बजट सत्र के दौरान पुरानी पेंशन योजना वापस ले आई.

आंदोलनकारियों का कहना है कि पुरानी पेंशन योजना, जिसे जनवरी 2004 में केंद्र की तरफ 31 दिसंबर, 2003 के बाद भर्ती सरकारी कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) में बदल दिया गया था—में कर्मचारियों के लिए फायदेमंद कई प्रावधान शामिल थे जो नई योजना में नहीं हैं.

इसमें सबसे अहम बात तो यही है कि कर्मचारियों को वेतन से 10 प्रतिशत अंशदान देना होता है, जिसका प्रावधान ओपीएस में नहीं था. यही नहीं, ओपीएस के विपरीत एनपीएस में भविष्य निधि का भी कोई प्रावधान नहीं है.

2004 के बाद के कुछ सालों में अधिकांश राज्यों ने भी ओपीएस को भी समाप्त कर दिया था.

बहरहाल, जब बंधु ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर 2013 में एक संगठन शुरू किया जिसका लक्ष्य ‘पुरानी पेंशन योजना बहाल कराना’ था, तो किसी ने भी उन्हें गंभीरता से नहीं लिया.

छोटे पैमाने पर होने वाले उनके विरोध-प्रदर्शनों पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई ध्यान तक नहीं दिया गया.

उत्तर प्रदेश में सोमवार को आखिरी चरण का मतदान होने जा रहा है, इस बीच दिप्रिंट ओपीएस मुद्दे से जुड़े प्रमुख घटनाक्रमों पर एक नजर डाल रहा है, जिसने केवल एक पखवाड़े में ही इसे राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है.


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ओपीएस के लिए एक अकेले व्यक्ति की जंग

बंधु 2013 तक एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की पढ़ाई के बाद उन्होंने राज्य सिविल सेवा परीक्षा में अपनी किस्मत आजमाई, और बाद में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की तरफ से उनका चयन किया गया.

उन्होंने दिप्रिंट के साथ फोन पर बातचीत में बताया कि कैसे 2013 में एक छोटी-सी चर्चा ने उनकी जिंदगी बदल दी.

उन्होंने कहा, ‘एक चाचा को जब मैंने यह बताया कि मैं 2004 के मध्य में सेवा में शामिल हुआ था, उन्होंने मुझ पर दया भरी निगाहें डालते हुए कहा कि मुझे सुरक्षित पुरानी पेंशन योजना का लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि मैं नई पेंशन योजना श्रेणी में आता हूं.’

बंधु ने आगे बताया, ‘एनपीएस को लेकर बहुत सारी भ्रामक सूचनाएं थीं. हर कोई यह तो कहता था कि ‘कई फायदे होंगे’ लेकिन असल में क्या फायदा होगा, इस पर कोई सही जवाब नहीं मिलता. मैंने अखबारों की कटिंग एकत्र करनी शुरू की और पूरे मामले में ढंग से जानकारी जुटाई.’

बंधु ने बताया कि और तभी उन्हें अहसास हुआ कि उन्हें आगे एक लड़ाई लड़नी होगी.

अपने चाचा के साथ बातचीत के बाद उन्होंने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के लिए लड़ाई लड़ने के लिए एटीईडब्ल्यूए (ऑल टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन) नामक एक संगठन की स्थापना की.

उन्होंने बताया, ‘मेरे कुछ सहयोगी भी इसमें शामिल हुए और इस तरह हमने इस मिशन को शुरू किया.’

एटीईडब्ल्यूए ने 20 दिसंबर 2015 को एक छोटा-सा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया, जिसमें 700-800 लोग शामिल हुए.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘शुरुआत के लिए यह बुरा नहीं था क्योंकि हमने सोचा था कि यह एक गैर-मुद्दा है, और कोई भी हमें नोटिस नहीं करेगा.’

इसके बाद, 1 अप्रैल 2016 को एसोसिएशन ने ‘काला दिवस’ के तौर पर मनाया. फिर 1 मई 2016 को एक और रैली की जिसमें 40,000 से ज्यादा लोगों की भीड़ जुटी.

ओपीएस के मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर ध्यान आकृष्ट करने की बंधु की मुहिम अब रंग लाने लगी थी.

बंधु ने बताया, ‘अब तक, देशभर में लगभग 70 लाख लोग इससे प्रभावित हैं. अकेले यूपी में 13 लाख लोग हैं जो सीधे तौर पर इससे प्रभावित हैं.’

फिर, जाहिर तौर पर सोशल मीडिया में यह मुद्दा छा गया और यह विरोध जताने के सभी तरीकों के लिए एक वरदान साबित हुआ.

उन्होंने कहा, ‘2013 के बाद सोशल मीडिया पर आने से हमारी छोटी-सी लड़ाई को काफी बल मिला. इसने हमारे लिए राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होना आसान बना दिया. हमने एक फेसबुक पेज बनाया, जिसमें तीन लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारी जुड़े हैं. हमने राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं.’

पहला बड़ा मुकाम, एनएमओपीएस का गठन

इस आंदोलन को पहला बड़ा मुकाम 2018 में हासिल हुआ, जब बंधु और उनके समूह ने नई दिल्ली के राम लीला मैदान में एक बड़ी रैली की.

कई राज्यों के लगभग चार लाख लोगों ने रैली में हिस्सा लिया, जिसने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान भी आकृष्ट किया.

जैसे ही कई राज्यों में ओपीएस बहाल करने की मांग बढ़ी, एक नारा जोर पकड़ने लगा, ‘जो हमारी पेंशन की बात करेगा वही राज करेगा.’

बंधु का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में देशभर में ओपीएस समर्थक आंदोलन का नेतृत्व करने के कारण उनके खिलाफ 13 एफआईआर दर्ज की गई हैं.

उन्होंने कई राज्यों में ओपीएस की मांग करने वाले छोटे संगठनों के गठन में भी मदद की है.

2017 में ओपीएस के लिए आंदोलनरत सात राज्य संगठन (यूपी, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के संगठन) एक साथ आ गए और उन्होंने मिलकर एक संयुक्त संगठन नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (एनएमओपीएस) के तौर पर पंजीकरण कराया.

फिलहाल यह संगठन 22 राज्यों में सक्रिय है.

बंधु ने कहा, ‘छोटे पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों, रैलियों, हस्ताक्षर अभियानों और पदयात्रा से जुड़ी बैठकों से मुख्यमंत्री और भाजपा के शीर्ष नेता भी जुड़ रहे हैं…यही वजह है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा आकार लेता नजर आया है.’


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राजस्थान में जीत यूपी में वादा

20 जनवरी 2022 को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक प्रेस कांफ्रेंस की और सत्ता में आने पर ओपीएस बहाल करने का वादा किया.

तीन दिन बाद 23 फरवरी को अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने अपने बजट सत्र में पुरानी पेंशन योजना की शुरुआत कर दी.

इसे यूपी के मतदाताओं के लिए कांग्रेस के एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. हिमाचल प्रदेश में भी इसकी तरफ से ओपीएस बहाल करने की सरकारी कर्मचारियों की मांग का समर्थन किया जा रहा है.

एक संवाददाता सम्मेलन में अखिलेश यादव के साथ विजय कुमार बंधु | फोटो: विशेष व्यवस्था द्वारा

 

यद्यपि विशेषज्ञों का कहना है कि ओपीएस फिर से शुरू करना वित्तीय स्तर पर एक आपदा जैसा है, लेकिन राजनीतिक दल इसे दूसरी तौर पर देखते हैं क्योंकि सेवानिवृत्त और सेवारत सरकारी कर्मचारी एक नए वोट बैंक के रूप में उभरे हैं.

बंधु ने दावा किया कि ओपीएस के समर्थन के कारण हेमंत सोरेन को बड़ी संख्या में चुनाव ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारियों के पोस्टल बैलेट वोट मिले थे.

उन्होंने आगे कहा, ‘यह यूपी में भी नजर आ रहा है. पार्टियों की जीत के लिए पोस्टल बैलेट वोट काफी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.’

16 नवंबर, 2021 को देहरादून में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों ने धरना प्रदर्शन किया था.

13 फरवरी 2022 को नई पेंशन योजना कर्मचारी महासंघ ने मंडी, हिमाचल प्रदेश में एक पदयात्रा निकाली.

महासंघ का दावा है कि आगामी हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब दो लाख सरकारी कर्मचारी निर्णायक वोट बैंक साबित होंगे.

मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों भी जल्द ही इस मांग में शामिल हो गए. 25 फरवरी को सरकारी कर्मचारियों ने मार्च के मध्य में भोपाल में विरोध प्रदर्शन की घोषणा कर दी.

विभिन्न दलों के विधायकों ने योजना को फिर से लागू करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र भी लिखा.

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी मौजूदा मुख्यमंत्री से ओपीएस बहाल करने को कहा है.

ओपीएस बनाम एनपीएस

केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद उनके लिए केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) अधिनियम, 1972 के तहत पुरानी पेंशन योजना लागू की.

इसमें कर्मचारियों को कोई अंशदान नहीं देना होता था और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशनभोगी को उसके अंतिम आहरित वेतन की 50 प्रतिशत राशि वेतन के तौर पर मिलती थी. इसके अलावा सरकारी कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में पति या पत्नी को आहरित पेंशन की 25 फीसदी राशि दी जाती थी. ओपीएस में जीपीएफ (सामान्य भविष्य निधि) की सुविधा भी थी.

लेकिन, दिसंबर 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पुरानी पेंशन योजना को बंद कर दिया और एक नई योजना शुरू की—यह एक अंशदान-आधारित पेंशन योजना थी जिसे राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) कहा जाता है.

1 जनवरी, 2004 से सीजीएस (केंद्र सरकार सेवा) के तहत सभी नई भर्तियों के लिए एनपीएस अनिवार्य हो गई.

एनपीएस लाने के लिए सरकार ने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972, केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन का कम्यूटेशन) नियम, केंद्रीय सिविल सेवा (असाधारण पेंशन) नियम, सामान्य भविष्य निधि नियम और अंशदायी भविष्य निधि नियमों में संशोधन किया था.

नई पेंशन योजना में जीपीएफ का कोई प्रावधान नहीं है और कर्मचारियों को इसके लिए अपने मासिक वेतन का 10 प्रतिशत अंशदान भी करना होता है.

उत्तर प्रदेश में एक एनएमओपीएस रैली में सरकारी कर्मचारी | फोटो: विशेष व्यवस्था द्वारा

 

इसके अलावा, पेंशन राशि बाजार से जुड़ी हुई है और इसका नेशनल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) द्वारा लंबी अवधि के म्यूचुअल फंड में निवेश किया जाता है. इस प्रकार, सैद्धांतिक तौर पर पेंशन की राशि निकासी के समय बाजार मूल्य पर निर्भर करती है.

बंधु और विभिन्न कर्मचारी संघों का तर्क है कि पुरानी पेंशन योजना सरकारी कर्मचारियों के लिए सिक्योरिटी नेट के तौर पर काम करती थी.

उन्होंने कहा, ‘नई पेंशन योजना बाजार से जुड़ी है. अगर कोई इकोनॉमिक क्रैश हो जाए तो इसका सीधा असर हमारी पेंशन पर पड़ेगा.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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