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Friday, 1 March, 2024
होमएजुकेशनबच्चों को कोडिंग क्लासेज से बाहर निकाल रहे माता-पिता, महामारी के दौरान बढ़े ट्रेंड का बुलबुला क्यों फूटा

बच्चों को कोडिंग क्लासेज से बाहर निकाल रहे माता-पिता, महामारी के दौरान बढ़े ट्रेंड का बुलबुला क्यों फूटा

माता-पिता अपने बच्चों को व्हाइटहैट जूनियर और कैंपके-12 जैसे प्लेटफॉर्म से हटा रहे हैं क्योंकि उन्हें इसका कोई मतलब नजर नहीं आ रहा है. हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इसे लेकर हाइप भले ही कम हो गई है लेकिन उम्मीदें अभी बाकी हैं.

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नई दिल्ली: आयशा खत्री, जो अब 10 साल की है, दो साल पहले जब एक ऑनलाइन कोडिंग कोर्स के जरिये मोबाइल ऐप बनाना सीख रही थीं, तब उसके सॉफ्टवेयर डेवलपर माता-पिता के गर्व की कोई सीमा नहीं रही थी. लेकिन अब उन्हें इस सबका कोई औचित्य नजर नहीं आता और उन्होंने उसे इस क्लास से हटा लिया है.

वे ऐसा करने वाले अकेले अभिभावक नहीं हैं. दिप्रिंट से बात करने वाले कई अभिभावकों ने कहा कि उन्होंने अपने बच्चों को व्हाइटहैट जूनियर, कैंपके-12 और इसी तरह के तमाम अन्य लोकप्रिय कोडिंग-फॉर-किड्स प्लेटफॉर्म से हटा लिया है, क्योंकि उन्हें इसके कोई मायने नजर नहीं आ रहे हैं.

कुछ ही साल पहले की बात है, जब बच्चों को कोडिंग सिखाने का क्रेज बढ़ा. महामारी के दौरान स्कूल बंद होने के कारण कई माता-पिता को लग रहा था कि घर से कोडिंग सीखकर उनके बच्चे एक उपयोगी तकनीकी कौशल हासिल कर लेंगे. अपने बच्चे को कोडिंग सीख रहे साथी छात्रों से पीछे न रहने देने के कारण भी यह ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ा था.

इसकी एक बड़ी वजह काफी आक्रामक विज्ञापन रणनीति भी रही, जिन्हें देखकर माता-पिता को यही लगता था कि कोडिंग सीखकर उनका बच्चा अगला मार्क जुकरबर्ग बन सकता है या फिर सात साल की उम्र में टेडएक्स स्पीकर तो बन ही जाएगा. कम से कम उच्च-मध्यम वर्ग के माता-पिता को तो यह सपना पूरा करने के लिए प्रति वर्ष 40,000 रुपये अतिरिक्त खर्च करना भी उपयुक्त लग रहा था, यह बात अलग है कि 2020 के शुरुआत से ही ऐसे विज्ञापनों को ‘भ्रामक’ होने के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था.

लेकिन ऐसा लगता है कि यह बुलबुला आखिरकार फूट गया है. माता-पिता इन प्लेटफार्मों के तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं और इस पर भी कि बच्चे आखिर कितना सीख रहे हैं.

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आयशा की मां आकांक्षा खत्री ने कहा, ‘जब मेरी बेटी महामारी के दौरान कोडिंग सीख रही थी, तो यह उसे व्यस्त रखने का एक अच्छा तरीका था. धीरे-धीरे हमने महसूस किया कि वह इन कक्षाओं में कुछ नया नहीं सीख रही. यह बहुत ही बुनियादी स्तर की जानकारी थी और वास्तव में कोडिंग भी नहीं थी. यह मूल रूप से किसी को कैनवा (ऑनलाइन ग्राफिक डिजाइन प्लेटफॉर्म) पर कार्ड डिजाइन करने का तरीका सिखाने जैसा था. इसमें कोई मौलिकता नहीं है.’

खुद एक सॉफ्टवेयर डेवलपर आकांक्षा ने पिछले साल अपनी बेटी को कोडिंग क्लास से बाहर निकाल लिया. उन्होंने बताया कि उसी बैच में कई अन्य बच्चों ने भी क्लास छोड़ दी है.

कई अन्य अभिभावकों ने भी धीरे-धीरे यही रुख अपनाना लिया और इससे स्टार्टअप्स को फंडिंग संकट का सामना करना पड़ रहा है. देश के कुछ कोडिंग-फॉर-किड्स प्लेटफॉर्म मुश्किल में आ गए हैं.

व्हाइटहैट जूनियर बंद होने को लेकर बढ़ती अटकलों के बीच इसकी मूल कंपनी बायजू ने पिछले हफ्ते दावा किया कि कोडिंग प्लेटफॉर्म ‘ऑप्टिमाइजेशन’ के दौर से गुजर रहा है. हालांकि, एडटेक उद्योग के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया है कि व्हाइटहैट जूनियर पिछले कुछ महीनों से बमुश्किल ही कोई कारोबार कर रहा है.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इसी तरह कोडिंग क्लास चलाने वाले कैंपके-12 ने इस महीने की शुरुआत में अपने 70 प्रतिशत कर्मचारियों को हटा दिया है.

तो, क्या इन घटनाक्रम से यह समझा जाए कि बच्चों के लिए कोडिंग एक पुरानी चीज हो गई है और इसे पढ़ाने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की उपयोगिता खत्म हो गई है? इस पर उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं है. कोडिंग अभी भी बच्चों के लिए एक उपयोगी कौशल है, लेकिन इसे पढ़ाने के तौर-तरीकों में बदलाव होने वाला है.


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माता-पिता का मोहभंग हुआ

शुरू में जब अभिभावक कोडिंग कक्षाओं के लिए साइन अप करने की होड़ में शामिल हुए तो उनमें से कई को उम्मीद थी कि उनके बच्चे, जिनमें कुछ अभी भी प्राइमरी स्कूल में हैं, अपना संज्ञानात्मक कौशल सुधारेंगे और संभवतः सॉफ्टवेयर क्षेत्र में एक आकर्षक कैरियर की प्रतिस्पर्द्धा के लिए अभी से तैयार हो जाएंगे.

हालांकि, समय बीतने के साथ कई अभिभावकों का यह देखकर इससे मोहभंग हो गया गए हैं कि उनके बच्चों ने कोई महत्वपूर्ण तकनीकी कौशल हासिल नहीं किया है.

गुड़गांव निवासी अभिभावक रेखा आहूजा ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि कोडिंग क्लास से उनके बेटे ने कुछ खास सीखा है जो अब 14 साल का है.

उन्होंने कहा, ‘मेरे बेटे को नहीं पता कि प्लेटफॉर्म के जरिए मोबाइल ऐप बनाने के बाद क्या करना है. जब वह कोडिंग सीख रहा था, और उन सभी ऐप्स को डिजाइन कर रहा था, तो उसका आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया था, लेकिन उसके बाद क्या हुआ?’

आहूजा ने कहा, ‘मुझे लगता है कि बच्चों को तकनीक के साथ सहज बनाने और उन्हें यह सिखाने के अलावा कि सॉफ्टवेयर का बैकएंड कैसे काम करता है, कोडिंग ने बच्चों को कुछ खास नहीं सिखाया.’

आकांक्षा खत्री को भी कुछ इसी तरह की शिकायत है. उन्होंने कहा, ‘जब तक बच्चे कंपनी के डिजाइन किए सॉफ्टवेयर पर सीख रहे थे, उन्हें पता था कि क्या करना है लेकिन इससे आगे क्या होता है, इसके बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था.’

अभिभावकों का यह भी कहना है कि उनके बच्चों ने इस विषय में रुचि खो दी है और महामारी के कारण लगी पाबंदियां पूरी तरह हटने के बाद से वे और अधिक आउटडोर एक्टिविटी पसंद कर रहे हैं.

नोएडा में रहने वाले अभिभावक राजीव दुबे ने कहा कि उनकी बेटी कोडिंग कक्षाओं में शामिल होने के लिए चिल्लाती थी, लेकिन उसका उत्साह कम हो गया और जबसे उसके स्कूल में नियमित कक्षाएं शुरू हुईं तो उसके पास बहुत ज्यादा समय ही नहीं बचता था.

दुबे ने कहा, ‘मैं वैसे भी अपनी बेटी को ऐसा कुछ सिखाने के लिए सालाना 40,000 रुपये खर्च करने के पक्ष में नहीं था जिसका वह भविष्य में कोई इस्तेमाल नहीं करने वाली थी, लेकिन साथियों के दबाव में आकर ऐसा किया. चूंकि उसके अन्य दोस्त जा रहे थे, उसने जोर देकर कहा कि मैं उसे भी इन कक्षाओं में दाखिला दिला दूं.’

क्या बच्चों के लिए कोडिंग अभी भी प्रासंगिक है?

दिप्रिंट ने एडटेक उद्योग के जिन विशेषज्ञों से बात की, उन्होंने माना कि कोडिंग प्लेटफॉर्म ने अपनी चमक खो दी है. हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों को कोडिंग सिखाना अभी भी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

सीधे स्कूलों के साथ काम करने वाले एक कोडिंग प्लेटफॉर्म के सह-संस्थापक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत प्रोग्रामिंग सीखना अधिक संस्थागत हो गया है.

उन्होंने कहा, ‘एनईपी में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि कोडिंग शिक्षा के अंतर्गत क्या आना चाहिए और किस उम्र में बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए. जरूरत के लिहाज से यह अब भी बेहद प्रासंगिक है.’

एनईपी में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ‘कोडिंग से जुड़ी गतिविधियां मध्य चरण में शुरू की जाएंगी’, जिसका मतलब कक्षा 6-8 के संदर्भ में है. इसमें 11 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे शामिल होते हैं.

उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि हाइप खत्म हो गई है क्योंकि जो कंपनियां चर्चा की वजह बनी हुई थीं, उनके पास फंडिंग की कमी हो गई है.

उन्होंने कहा, ‘कोविडकाल में एक अलग ही तरह की स्थिति थी और लगभग हर कंपनी ने उस दौरान पैसे जुटाए. इसके बाद उन्होंने बाजार में आगे बढ़ने के लिए फंडिंग का इस्तेमाल किया और चर्चाओं में छाई रहीं. हालांकि, एक समय के बाद केवल वही बचे रह पाए जिनके पास अधिक टिकाऊ व्यवसाय योजना थी.’

अब बंद हो चुके एक कोडिंग प्लेटफॉर्म के मुंबई में रहने वाले संस्थापक ने दिप्रिंट को बताया कि जो लोग बच गए हैं, उन्होंने अपने मॉडल को बी2सी (व्यवसाय से उपभोक्ता) से बी2बी (व्यवसाय से व्यवसाय) में बदल दिया है और स्कूलों के साथ काम करना शुरू कर दिया है.

बाद वाले मॉडल में कोडिंग प्लेटफॉर्म शुल्क लेकर कक्षाओं के लिए विशेषज्ञ और सॉफ्टवेयर प्रदान करके स्कूलों के साथ सहयोग करते हैं. चूंकि स्कूलों में छात्रों की संख्या अधिक है, इसलिए ये प्लेटफॉर्म कम फीस लेने में सक्षम हैं.

उन्होंने कहा, ‘अब जब स्कूलों में कोडिंग सिखाई जा रही है, तो फीस में भारी कमी आई है. लोगों को भी अपने बच्चों को कोडिंग सिखाने के लिए इतना खर्च करने की जरूरत नहीं रह गई है. ग्रुप क्लासेज में लगने वाला शुल्क अब प्रति वर्ष 2,400 रुपये (प्रति बच्चा) तक कम हो गया है.’

(अनुवाद: रावी द्विवेदी | संपादन: आशा शाह )

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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