Monday, 27 June, 2022
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बेकार हुए ATM कार्ड, खाने की कमीः युद्ध के चलते यूक्रेन में ही नहीं, रूस में भी भारतीयों को हो रही परेशानी

रूस में रह रहे तमाम भारतीय छात्र अपने मेजबान देश के यूक्रेन पर हमला कर देने की वजह से लागू अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की आंच महसूस कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश छात्रों ने अभी वहीं रुकने का फैसला किया है.

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नई दिल्ली: रूसी हमले के कारण यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों की मुश्किलें तो मीडिया की काफी सुर्खियों में रहीं. उसी तरह रूस में रहकर पढ़ाई कर रहे छात्रों का भी बुरा हाल है. यूक्रेन पर हमले के कारण रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय और कॉर्पोरेट प्रतिबंधों की वजह से इन छात्रों को खाने-पीने का सामान न मिलने, और एटीएम कार्ड बेकार हो जाने जैसे तमाम संकटों का सामना करना पड़ रहा है.

मानसरोवर राय पर्म स्टेट यूनिवर्सिटी—जो बर्फीले और दुरूह यूराल पर्वतों के बीच स्थित है—में मेडिकल के पांचवें वर्ष के छात्र हैं. वैसे तो 24 वर्षीय राय अभी भी हर सुबह अपनी क्लास में जाते हैं और पढ़ाई के बाद अन्य साथियों के साथ यूनिवर्सिटी के पास ही स्थित अपने किराए के फ्लैट में लौटकर डिनर तैयार करते हैं. लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध जारी रहने के बीच उनका सामान्य जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है.

किराना स्टोर अब सिर्फ कैश लेते हैं लेकिन एटीएम ने उनका एसबीआई इंटरनेशनल कार्ड एक्सेप्ट करना बंद कर दिया है. वीजा और मास्टरकार्ड ने भी रूस में अपना ऑपरेशन निलंबित कर दिया है. राय के माता-पिता ने रूस की यात्रा करने वाले दोस्तों के हाथ डॉलर में नकदी भेजने की कोशिश की लेकिन उसे अभी तक यह मिली नहीं है.

राय के कुछ साथी नकदी लाने के लिए भारत लौट गए हैं, लेकिन वह अभी अपने एक रूसी सहपाठी से लिए उधार से काम चला रहा है.

राय कहते हैं, ‘अभी तो मैं अपने एक स्थानीय मित्र के माता-पिता से उधार लेकर काम चला रहा हूं. लेकिन अगर यही स्थिति जारी रही तो मुझे सिर्फ कैश लेने के लिए भारत जाना पड़ सकता है.

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कई अन्य छात्रों, खासकर उन्हें जो वीजा और मास्टरकार्ड के अपनी सेवाएं बंद करने के ऐलान से पहले एटीएम से पैसे निकालने से चूक गए थे, को भी कैश हासिल करने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

शेयर बाजार में गिरावट और रूबल की घटती कीमत के साथ रूस में रहने की लागत काफी बढ़ गई है. भोजन, कैश ट्रांसफर और अन्य जरूरतें पूरी करना महंगा हो गया है और आवश्यक वस्तुओं की कमी भी हो गई है.

रूस में भारतीय छात्रों को पानी की जगह बर्फ पिघलाकर काम चलाने जैसी मुश्किलों का सामना भले ही न करना पड़ रहा हो जैसी यूक्रेन में रहने वाले छात्रों ने झेली, लेकिन उन्हें भी सीमित संसाधनों में काम चलाना पड़ रहा है.

रूस में रह रहे कई छात्रों का कहना है कि यूक्रेन में छात्रों को जो कुछ भी झेलना पड़ा है उसकी तुलना में तो ये ‘मामूली असुविधाएं’ हैं, लेकिन सामान्य जीवन निश्चित तौर पर बाधित हो गया है और ऐसे में कुछ छात्र घर भी लौट गए हैं.


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नकदी की कमी, लेकिन कुछ मदद मिल रही है

रूस में रहने वाले भारतीय छात्रों के जीवन को तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन यूक्रेन पर अपने मेजबान देश के हमले के कारण लागू प्रतिबंधों की आंच उन्हें भी झेलनी पड़ रही है. कई छात्र भारतीय रुपये को रूबल में बदलने के तरीके तलाश रहे हैं, वहीं कुछ इसकी वजह से बड़ी मुश्किलों में भी फंस रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर मानसरोवर राय के साथियों में से एक ने रुपये को रूबल में बदलने के प्रयास में क्रिप्टो ट्रेडिंग ऐप पर अपने पैसा गंवा दिए. उन्होंने बताया, ‘क्रिप्टो ट्रेडिंग और रुपये को रूबल में बदलने के प्रयास में उन्हें 5,000 रुपये का नुकसान हुआ. हम सभी ऐसे साधन खोजने में जुटे हैं जिससे हमें नकदी मिल सके. हालांकि हमारे माता-पिता भारत से हमारे बैंक खातों में पैसा जमा कर रहे हैं, लेकिन इस पैसे को निकालना यहां एक चुनौती बन गया है.’ हालांकि, कुछ यूनिवर्सिटी छात्रों की मदद के लिए आगे आई हैं.

सरांस्क के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित नेशनल रिसर्च ओगेरेव मोर्दोविया स्टेट यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों के कैंपस प्रतिनिधि परेशान छात्रों को कैश मुहैया कराने में मदद कर रहे हैं.

नेशनल रिसर्च ओगेरेव मोर्दोविया स्टेट यूनिवर्सिटी का दृश्य । स्पेशल अरेंजमेंट

यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा, ‘हम उसे रुपये देते हैं और वह उसे उतनी ही राशि के रूबल में बदल देते हैं. हालांकि, हम एक सीमित राशि को ही बदलवा सकते हैं.’

छात्र ने आगे बताया कि यूनिवर्सिटी भी हमारे लिए स्थिति आरामदायक बनाने की कोशिश कर रही हैं. उसने कहा, ‘हमारी यूनिवर्सिटी ने एक सर्वे किया जिसमें हमसे प्रतिक्रिया मांगी गई. हमने परिसर में मुफ्त आवाजाही और वाई-फाई सुविधा का अनुरोध किया था, जो उन्होंने प्रदान कर दी है.’ इसके अलावा, यूनिवर्सिटी बढ़ते रहने के खर्च से निपटने में छात्रों की मदद के लिए हर दिन एक समय का भोजन भी मुफ्त में मुहैया करा रही हैं.

2021 में संसद को पेश सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, विदेशों में पढ़ने वाले करीब 11 लाख भारतीय छात्रों में से 16,500 रूस में और 18,000 यूक्रेन में हैं. इनमें से अधिकांश मेडिकल छात्र हैं जो भारत में सीटों की कमी और पढ़ाई का खर्च अधिक होने से एमबीबीएस कोर्स में दाखिला लेने में सक्षम न होने के कारण विदेशों का रुख करते हैं.

रूस में एक मेडिकल डिग्री पर 20 लाख से 27 लाख रुपये के बीच खर्च आता है जो कि भारत में निजी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में बहुत कम है जो 30 लाख रुपये से 1.5 करोड़ रुपये के बीच फीस वसूलते हैं.


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तमाम चीजों की किल्लत, खाने की राशनिंग, लेकिन छात्र काम चला रहे

नेशनल रिसर्च ओगेरेव मोर्दोविया स्टेट यूनिवर्सिटी में केरल के एक मेडिकल छात्र वजायिल जबरुल हक का कहना है कि उन लोगों की भोजन की किल्लत तो झेलनी पड़ रही है. लेकिन किसी न किसी तरह काम चला रहे हैं, जैसे अगर टमाटर स्टॉक में नहीं हैं या स्थानीय डिपार्टमेंट स्टोर पर इसकी राशनिंग की जा रही है तो खाना पकाने में उसकी जगह केचप का इस्तेमाल कर ले रहे हैं.

हक ने कहा, ‘हम इस तरह की किल्लतों के बीच जी रहे हैं. क्योंकि समस्या केवल आर्थिक है और जीवन के लिए कोई खतरा नहीं है, इसलिए हम इसमें काम चलाना सीख रहे हैं. चूंकि बाहर लागत बढ़ रही है, हमारी यूनिवर्सिटी भी भोजन, ट्रांसपोर्ट और वाई-फाई उपलब्ध कराने में हमारी मदद कर रही हैं.’

यूक्रेन की खारकीव सीमा—जहां जंग चल रही है—से करीब 1,000 किलोमीटर दूर उल्यानोवस्क स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 21 वर्षीय साक्षी शिंगला अपनी एक-एक पाई काफी संभालकर खर्च कर रही है.

वह कहती हैं, ‘खाने-कपड़े जैसी बुनियादी जरूरतों की चीजों के दाम काफी बढ़ गए हैं. बतौर छात्र यहां रहना काफी कठिन हो गया है. वह कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय पेमेंट गेटवे स्विफ्ट के माध्यम से मनी ट्रांसफर करना भी अधिक महंगा हो गया है, क्योंकि रुपये को डॉलर में और फिर रूबल में बदलना पड़ता है. ‘मनी ट्रांसफर के बढ़ते चार्ज की वजह से यहां कास्ट ऑफ लिविंग काफी बढ़ गई है.’

वीजा और मास्टरकार्ड दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत क्रेडिट और डेबिट कार्ड पेमेंट को नियंत्रित करते हैं, लेकिन इस महीने की शुरुआत में उन्होंने मास्को पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के तहत रूस में अपनी सेवाएं रोक दी है. मैकडॉनल्ड्स, कोका-कोला और स्टारबक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड ने भी अपना ऑपरेशन निलंबित कर रखा है.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आक्रमण के पहले हफ्ते में रूस में उपभोक्ता कीमतों में 2.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसमें खाद्य पदार्थों में सबसे अधिक वृद्धि हुई. जमाखोरी की खबरों के बीच कुछ दुकानों ने जरूरी खाद्यान्नों की बिक्री रोक दी है.

छात्रों का कहना है कि रूसी सरकार ने उन जरूरी सामानों की राशनिंग शुरू कर दी है जिन्हें आयात किया जाता है, और लोग जितनी चाहें उतनी खरीद नहीं कर सकते हैं.

लेकिन बस एक बात है जो छात्रों के लिए थोड़ी राहत पहुंचाने वाली है कि उन्हें जान-माल का कोई बड़ा खतरा नहीं है.

नार्थ ओस्सेटियन स्टेट मेडिकल अकादमी में अंतिम वर्ष के एक छात्र ने कहा, ‘मुझे पता है कि पैसा मिलना मुश्किल हो गया है और खाने की कीमतें बढ़ गई हैं लेकिन हमारे कैंपस के अंदर हम सुरक्षित हैं. हम आराम से सोते-जागते हैं और अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त रहते हैं. यहां स्थिति यूक्रेन जितनी खराब नहीं है.’

छात्र ने कहा, ‘हम कुछ कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, लेकिन बात छात्र हमें पता है कि कम बजट में कैसे रहना होता है.’


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अधिकांश छात्र वहीं रुके लेकिन कुछ लौट रहे

अधिकांश छात्र रूस में रुके हैं, इसका एक वजह तो यह है कि उन्हें लगता है कि वे उन चुनौतियों से निपट सकते हैं जिनका अभी सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा उन्हें यह भी लगता है कि भारत में अपने घर लौटना और ऑनलाइन कक्षाएं लेना भविष्य में उनकी संभावनाओं पर भारी पड़ सकता है.

फरवरी में भारत की राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद ने घोषणा की थी कि वह केवल ऑनलाइन मोड में किए गए मेडिकल कोर्स को ‘मान्यता और स्वीकृति’ नहीं देती है.

फिर भी, कुछ छात्र, खासकर पहले और दूसरे वर्ष की पढ़ाई करने वाले नकदी के अभाव और युद्ध के खतरों को देखते हुए घर लौट आए हैं.

उदाहरण के तौर पर 20 मार्च को उल्यानोवस्क स्टेट यूनिवर्सिटी के 10 छात्र भारत लौटे, इसके चार दिन बाद 35 और लौटे.

दूसरे वर्ष की 21 वर्षीय छात्रा स्नेहा मानकर, जिसने 20 मार्च को आए बैच के साथ लौटने का फैसला किया था, ने कहा कि उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसके माता-पिता वहां जारी जंग की स्थितियों और उसके पास कैश की कमी को लेकर चिंतित थे. स्नेहा ने बताया, ‘मैं महाराष्ट्र में अपने घर लौट आई हूं और अभी ऑनलाइन क्लासेज ले रही हूं.’

स्नेहा की चिंता यह है कि ऑनलाइन शिक्षा पर एनएमसी के ताजा नियमों के साथ वह अपनी विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा (एफएमजीई) के लिए उपस्थित नहीं हो पाएगी—जिसे विदेशी डिग्री वाले छात्रों को भारत में प्रैक्टिस के लिए पास करना अनिवार्य होता है. लेकिन वह भविष्य को लेकर आशान्वित हैं.

स्नेहा का कहना है, ‘मैं उम्मीद कर रही हूं कि यह नियम केवल चीन में भारतीय छात्रों के संदर्भ में है, जहां उन्हें कोई प्रैक्टिकल पढ़ाई करने को नहीं मिली है.’

पर्म स्टेट यूनिवर्सिटी के करीब 100 छात्र पहले ही नकदी की कमी और बढ़ी लागतों का हवाला देते हुए कैंपस छोड़कर भारत लौट चुके हैं.

अपना नाम न बताने की शर्त पर एक छात्र ने कहा, ‘छात्रों को अपनी यूनिवर्सिटी से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की जरूरत है और फिर वे अपने देश लौट सकते हैं. फिर वे अपने कोर्स की ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते है, लेकिन यह कब तक चलेगा?’

अपनी मेडिकल एजुकेशन के अंतिम वर्ष के अधिकांश छात्रों ने वहीं रुकने का फैसला किया है क्योंकि वे एफएमजीई के लिए पात्र होना चाहते हैं, जो उनका मानना है कि उनके करियर के लिए आवश्यक है.

इस बीच, जो तमाम छात्र वहां रुके हुए हैं, उनके माता-पिता की चिंता बढ़ती जा रही है.

उल्यानोवस्क स्टेट यूनिवर्सिटी की 21 वर्षीय छात्रा साक्षी शिंगला की मां कहती हैं, ‘हम अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित हैं. हमने उसे भारत लौटने और युद्ध समाप्त होने के बाद वापस लौटने के लिए भी कहा. हर दिन समाचारों में दूसरे देश रूस की निंदा करते दिखाई देते हैं…आप नहीं जानते कि कब देशों के बीच लड़ाई बढ़ जाए.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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