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प्रदूषण के चलते दिल्ली में लोग रोज़मर्रा की दिनचर्या में मास्क पहन कर निकल रहे हैं. (फोटो: पीटीआई)
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नई दिल्ली: भारत में हर आठ में से एक मौत के पीछे वायु प्रदूषण है. ये नवीनतम आंकड़ा पत्रिका लैंसेट प्लैनेट हेल्थ 2018 में छपा है.

इंडियन काउंसिल आॅफ मेडिकल ​रिसर्च (ईसीएमआर) के डॉ बलराम भार्गव ने शोध को जारी करते हुए कहा, ‘भारत की आठ में से एक मौत वायु प्रदूषण से हो सकती है. वायु प्रदूषण सीओपीडी, मधुमेह, दिल का दौरा पड़ना, फेफड़े के कैंसर से दौरों जैसे रोगों के पीछे कारण हो सकता है. वायु प्रदूषण का असर बच्चों में ज़्यादा होता है क्योंकि उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती हैं.’

भारत के हर राज्य में मृत्यु, रोग और आयु पर वायु प्रदुषण के असर का व्यापक शोध किया गया है. 2017 में 12.4 लाख मौतें वायु प्रदूषण से हुईं जिसमें 6.7 लाख मौंते बाहरी पारटिक्युलेट मैटर और 4.8 लाख मौतें घर में होने वाली प्रदुषित हवा से हुईं. आधे से ज्यादा वायु प्रदूशण से मरने वाले 70 साल से कम उम्र के थे.


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दुनिया की कुल आबादी का 18 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता है और भारत में वायु प्रदुषण से समय से पहले मृत्यु और सेहत में गिरावट 26 प्रतिशत लोगों में हुई.

शोध में साथ ही कहा गया है कि अगर भारत की आयु संभावना 1.7 साल बढ़ जाती अगर वायु प्रदूषण का स्तर उससे कम रहता जितने से उसका स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

ये शोध आईसीएमआर, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, स्वास्थ्य शोध विभाग और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने मिल के किया हैं.


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भार्गव का हांलाकि कहना था कि हालिया उपायों से घर के अंदर होने वाला वायु प्रदूषण कम हुआ है.

ग्रीनपीस के वरिश्ठ कैंपेनर सुनील दहिया कहते हैं, ‘आखिकार हमारे पास एक भारतीय शोध है जो इस बात पर ज़ोर देता है कि देश में 12.4 लाख लोग वायु प्रदूषण से मारे जाते हैं और एक भी आदमी ऐसी हवा में सांस नहीं लेता जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुरक्षित मानकों पर हो.’ वे कहते हैं कि ‘आंकड़े कहते हैं कि हम वायु प्रदुषण को कम करने में देर नहीं कर सकते और ये हमें समयबद्ध तरीके से युद्ध स्तर पर करना होगा. जो कीमत हमें चुकानी पड़ रही है वह बहुत ज्यादा है. राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को जल्द लागू किया जाना चाहिए और प्रदूषण कम करने के लक्ष्य तय होने चाहिए. सभी की जवाबदेही तय होनी चाहिए और कानूनी समर्थन इन कदमों को प्राप्त होना चाहिए.’

बलराम भार्गव का कहना था कि ‘हम इस बारे में स्पष्ट जानते हैं कि वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु होने की दर बढ़ जाती है. पीएम 2.5 खून में प्रवेश कर के हृदय में अवरोध उत्पन्न कर सकता हैं.’

भार्गव का कहना है कि परोक्ष साक्ष्य जैसे खून में संक्रमण, और खून में सीसा मिलना सभी पीएम 2.5 के प्रभाव को दर्शाते हैं.


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उन्होंने साथ ही कहा कि पीएम 2.5 की खून में परख नहीं किया जा सकता, पर जिस बात का जवाब नहीं है वो ये कि ‘पीएम 2.5 क्या सीधे मृत्यु का कारक होता है, या बीमारी का.’

शोध के वरिष्ठ लेखक प्रो. ललित डंडोना ने दिप्रिंट को बताया कि विभिन्न गुटों की तुलना और अंतराष्ट्रीय देशांतर शोध के आधार पर वायु प्रदूषण को दोनों बीमारी और मौत के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है.

ये शोध तीन साल तक किया गया. ये शोध इस बात पर ज़ोर देता है कि वायु प्रदुषण के विभिन्न स्रोतों का निवारण किया जाना चाहिए. वायु प्रदुषण के भारत में विभिन्न स्रोतों, यातायात के साधनों, निर्माण कार्य, उद्योग और थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले धुएं, घरों और व्यवसायिक ठोस ऊर्जा का इस्तेमाल, कूड़े और कृषि कचरे को जलाना, डीज़ल जनरेटर और हाथ से सड़क की धूल की सफाई सभी का निदान ढूंढने की ज़रूरत है.


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