scorecardresearch
Sunday, 14 July, 2024
होमदेशइज़रायल-फ़िलिस्तीन के लिए 2 राज्य समाधान : इस विचार का इतिहास, नेतन्याहू का रुख और भारत का स्टैंड

इज़रायल-फ़िलिस्तीन के लिए 2 राज्य समाधान : इस विचार का इतिहास, नेतन्याहू का रुख और भारत का स्टैंड

द्वि-राज्य समाधान, उन क्षेत्रों में 2 देशों- इज़राइल और फ़िलिस्तीन- के वजूद की कल्पना करता है जिसे कभी फिलिस्तीन के लिए ब्रिटिश ने तय किया था. इसे 1947 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्तावित किया था.

Text Size:

नई दिल्ली : इस सप्ताह की शुरुआत में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इज़रायली समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू से बात की और गाज़ा के नियंत्रण वाले फ़िलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास के साथ जारी युद्ध में नई दिल्ली के समर्थन का आश्वासन दिया. जबकि मोदी ने दो-राज्य समाधान का कोई जिक्र नहीं किया, विदेश मंत्रालय (एमईए) ने बाद में कहा कि इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष को लेकर वार्ता की बहाली और दो-राज्य समाधान पर भारत की स्थिति हमेशा “एक जैसी” रही है.

एमईए के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने गुरुवार को एक प्रेसवार्ता में कहा, “फ़िलिस्तीन पर हमारी स्थिति लंबे समय से स्थायी और एक जैसी रही है. भारत ने हमेशा सुरक्षित और मान्य सीमाओं के भीतर, इज़रायल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर और शांति से रहने वाले फ़िलिस्तीन के एक संप्रभु, स्वतंत्र और कार्यशील, विकासशील राज्य बने रहने के लिए सीधी बातचीत फिर से शुरू करने की वकालत करता रहा है. वह स्थिति जस की तस है.”

इज़रायल रक्षा बलों (आईडीएफ) के अनुसार, हमास ने 7 अक्टूबर को इज़रायल पर एक अभूतपूर्व हवाई और जमीनी हमला किया, जिसमें 1,300 से अधिक इज़राइली मारे गए और कम से कम 3,200 लोग घायल हो गए है. इसके बाद इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच जारी संघर्ष को लेकर द्वि-राज्य समाधान का सवाल एक बार फिर सामने आ गया है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजराइल के जवाबी हमले में कम से कम 2,200 फ़िलिस्तीनी मारे गए हैं.

इज़रायली रक्षा बलों ने क्षेत्र पर जमीनी हमले की तैयारी के साथ गाज़ा से लगी सीमा पर टैंक और सैनिकों को तैनात कर दिया है और 10 लाख से अधिक फिलिस्तीनियों को पट्टी के दक्षिण में स्थित जगह को खाली करने को कहा है. लेकिन इससे उन समाधानों पर सवाल उठता है जिन पर अतीत में फ़िलिस्तीन और इज़रायल के बीच संघर्ष के समाधान के लिए चर्चा हुई है.

दो-राज्य समाधान उन क्षेत्रों में दो देशों – इज़रायल और फ़िलिस्तीन – के वजूद की बात करता है जो कभी ब्रिटिश शासन के अधीन फ़िलिस्तीन क्षेत्र था. फ़िलिस्तीन के शासन क्षेत्र को दो राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव पहली बार 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने दिया था, जब इसने UNGA प्रस्ताव 181 (II) पारित किया था. संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावित बंटवारे में, कहा गया था कि ब्रिटिश शासन वाले क्षेत्र को भविष्य में यहूदी राज्य के तौर पर लगभग 55 प्रतिशत भूमि दी जाएगी, जबकि बाकी 45 प्रतिशत अरब राज्य (फिलिस्तीन) को देने की बात कही गई थी.

हालांकि, 1948 में इज़रायल की स्थापना के 75 साल बाद भी इस मुद्दे पर संघर्ष जारी है.

भारत में फ़िलिस्तीनी राजदूत, अदनान अबू अल हैजा ने दिप्रिंट को बताया है कि रामल्ला इसको भी स्वीकार करने को तैयार है. “…एक-राज्य समाधान को अगर इज़रायली इसे स्वीकार करते हैं तो हम उनके साथ एक लोकतांत्रिक राज्य में रहने के लिए तैयार हैं.”


यह भी पढ़ें : हमास ने फ़िलिस्तीन के मकसद को कमजोर कर दिया है, इसमें अब तक तटस्थ भारत के लिए चलना कठिन होगा


नेतन्याहू और टू स्टेट समाधान

सार्वजनिक रूप से, नेतन्याहू ने अक्सर संकट को समाप्त करने की दिशा में दो-राज्य समाधान को स्वीकार किया है. हालांकि, वह अपने स्टैंड में इस बात का प्रतिवाद करते हैं कि बंटवारे का वास्तविक कार्यान्वयन कैसे होगा.

इस साल फरवरी में सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में, नेतन्याहू ने कहा था कि वह दो-राज्य समाधान के लिए तैयार हैं, ताकि फिलिस्तीनियों को अपने क्षेत्रों पर शासन करने के लिए आवश्यक शक्तियां मिलें, लेकिन ‘सुरक्षा’ शक्तियां नहीं मिलेंगी, जैसे कि सेना बनाने या पुलिस बनाने का अधिकार. उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि इज़रायल को जॉर्डन नदी के पश्चिम में सुरक्षा बनाए रखने का अधिकार होगा – संक्षेप में, पूरे वेस्ट बैंक में. इस व्यवस्था में कोई आधुनिक समानता की बात नहीं है, जहां एक राज्य को खुद पर शासन करने का अधिकार तो है, लेकिन अपनी सुरक्षा का प्रबंधन करने का नहीं.

लेकिन उनकी वर्तमान सरकार के बुनियादी सिद्धांत इस बात पर ज़ोर देते हैं कि “यहूदी लोगों को इज़रायल की भूमि के सभी हिस्सों पर विशेष और अभिन्न अधिकार देते हैं.” ये सिद्धांत एक दस्तावेज़ में बताए गए थे, जिसकी घोषणा सरकार के शपथ लेने से पहले की गई थी और यह कोई कानूनी समर्थन नहीं रखता, लेकिन यह इसके एजेंडे और प्राथमिकताओं पर प्रकाश डालता है.

फ़िलिस्तीनियों समेत बाकी लोग भी हैं, जिन्होंने यहूदियों और अरबों दोनों को अधिकार दिए जाने वाले एक संघ के रूप में एक-राज्य समाधान की मांग की है. 2004 में, फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण के तत्कालीन प्रधानमंत्री, अहमद कुरेई ने कहा था, “हम एक-राज्य समाधान की ओर जाएंगे… कोई अन्य समाधान नहीं,” क्षेत्र की सीमाओं को एकतरफा फिर से निर्धारित करने के इज़रायल के फैसले की प्रतिक्रिया में कही थी.

हालांकि, एक आम यहूदी और अरब राज्य के लिए कोई भी समाधान शासन के सिद्धांतों की स्थापना की कठिनाई से भरा हुआ है. और इज़रायली दक्षिणपंथ के कुछ राजनेताओं ने एक अन्य प्रकार के एक-राज्य समाधान की दलील दी है – मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यकों के तौर पर एक यहूदी देश के रूप में इज़रायल या केवल इज़रायल का अस्तित्व और कोई फ़िलिस्तीन नहीं, जिसे नफ्ताली बेनेट ने 2013 में सार्वजनिक रूप से कहा, जो बाद में प्रधानमंत्री बने थे.

दो-राज्य समाधान के आइडिया का सामने आना

अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस के एक संक्षिप्त विवरण के अनुसार, आधुनिक दो-राज्य समाधान कैंप डेविड समझौते से सामने आया, जो 1978 में मिस्र और इज़रायल के बीच हस्ताक्षरित एक शांति संधि से हुआ, जिसमें फिलिस्तीनियों को खुद के शासन के लिए कुछ हिस्से दिए गए थे.

दिसंबर 1988 में, फ़िलिस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) ने इज़रायल के वजूद के अधिकार को मान्यता दी, जिससे दो-राज्य समाधान पर सहमत होने की उसकी इच्छा का संकेत मिला. आखिर में, 1993 और 1995 के बीच, तेल अवीव ने ओस्लो समझौते I और II पर हस्ताक्षर करने के लिए यासर अराफात के पीएलओ के साथ काम किया, जिससे फिलिस्तीनियों को खुद के सीमित शासन का अधिकार दिया गया और 5 साल के भीतर एक संप्रभु फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का वादा किया गया, दिप्रिंट ने इसकी पहले रिपोर्ट की थी.

ओस्लो समझौते को जल्द ही शांति के रोडमैप द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया, जिसकी घोषणा 2003 में फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण और इज़रायल के बीच की गई थी. समझौते में एक दूसरे को पारस्परिक मान्यता और दो-राज्य समाधान की स्वीकृति के साथ-साथ इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष को निपटाने के लिए तीन चरण के रोडमैप की रूपरेखा बनाई गई.

हालांकि, आगे की बातचीत विफल रही और 2007 से गाजा पट्टी पर नियंत्रण रखने वाले और फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे बड़े संगठनों में से एक हमास ने कम से कम 2017 तक दो-राज्य समाधान को खारिज किया, जैसा कि दिप्रिंट ने पहले रिपोर्ट किया था.

भारत और 1947 के विभाजन की योजना

संयुक्त राष्ट्र की 1947 में बंटवारे की पहली योजना थी, जिसमें तत्कालीन ब्रिटिश शासनादेश के तहत दो राज्यों का प्रस्ताव रखा गया था. इसे क्षेत्र में यहूदी संगठनों ने स्वीकार कर लिया, जबकि अरबों ने इसे अस्वीकार कर दिया. उस समय संयुक्त राष्ट्र के सदस्य भारत ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया था.

मीडिया रिपोर्टों और विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, भारत की पॉजिशन संयुक्त राष्ट्र बंटवारे की योजना के खिलाफ थी. 1936 की शुरुआत में, जवाहरलाल नेहरू ने ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद’ के परिणामस्वरूप फ़िलिस्तीन में स्थिति की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया था. 1947 में, भारत ने एक एक संघीय राज्य को प्राथमिकता दी, जिसमें यहूदियों और अरबों दोनों को स्वायत्तता और यरूशलम को एक विशेष दर्जा देने का समर्थन किया.

एमईए के एक संक्षिप्त विवरण के अनुसार, नेहरू की सरकार ने 1950 में आधिकारिक तौर पर इज़रायल को मान्यता दी थी, लेकिन 42 साल बाद, 1992 तक भारत के इसके साथ पूर्ण राजनयिक संबंध नहीं थे.

1948 की शुरुआत में, इतिहासकार राशिद खालिदी ने अपनी पुस्तक ‘द आयरन केज’ में लिखा है, फ़िलिस्तीन के शासन क्षेत्र में रहने वाले 2 मिलियन लोगों में से, अरबों की संख्या लगभग 1.4 मिलियन थी और उनके पास लगभग 90 प्रतिशत निजी भूमि थी.

हालांकि, उस वर्ष के अंत तक 7,50,000 अरबों को या तो निष्कासित कर दिया गया या क्षेत्र से भाग गए, इज़रायल ने पूर्व अधिकार क्षेत्र के 78 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करता है. 1948 में प्रथम अरब-इज़रायल युद्ध के अंत में, लगभग 1,50,000 फ़िलिस्तीनी नये स्थापित किए गए राज्य इज़रायल में रह गए थे. खालिदी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि शेष जॉर्डन या मिस्र द्वारा नियंत्रित अधिकार क्षेत्रों – क्रमशः वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी – के भीतर रहते थे.

1949 में युद्धरत पक्षों के बीच हस्ताक्षरित एक युद्धविराम ने जॉर्डन, मिस्र, इज़रायल और सीरिया द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों के बीच एक सीमा बनाई – जिसे आमतौर पर ‘ग्रीन लाइन’ के रूप में जाना जाता है. ग्रीन लाइन को अक्सर फ़िलिस्तीन द्वारा दो-राज्य समाधान की बातचीत के शुरुआती बिंदु के रूप में माना जाता है – जो कि 1967 से पहले की सीमाओं के तौर पर भी जाना जाता है.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहले प्रस्तावित मूल विभाजन योजना में जो सवाल सामने आया था, वह यरूशलम शहर पर नियंत्रण का था. यह शहर यहूदी और मुस्लिम दोनों धर्मों के लोगों के लिए पवित्र माना जाता है. 1947 में, संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव दिया कि शहर को एक अलग दर्जे के साथ अंतर्राष्ट्रीय शासन के तहत लाया जाए.

हालांकि, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र ने कहा, 1948 के युद्ध के अंत तक, यरूशलम का 80 प्रतिशत हिस्सा इज़रायल के नियंत्रण में आ गया था.

1967 में 6 दिन चले युद्ध के बाद, इज़रायल, क्रमशः जॉर्डन और मिस्र को, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी से निष्कासित करने और फ़िलिस्तीन के ब्रिटिश शासन के बाकी क्षेत्रों पर कब्जा करने में सक्षम हो गया. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने 1967 में प्रस्ताव 242 (1967) को पारित किया, जिसमें क्षेत्र में ‘न्यायसंगत और स्थायी शांति’ का आह्वान किया गया. प्रस्ताव में 1967 के युद्ध के दौरान कब्जे वाले क्षेत्रों से इज़रायली सशस्त्र बलों की वापसी का भी आह्वान किया गया.

1980 में, इज़रायल ने अपनी संसद द्वारा येरूशलम कानून पारित करने के बाद यरूशलम को पूर्ण और एकीकृत, इज़रायल की राजधानी घोषित कर दिया.

(संपादन: इन्द्रजीत)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें : गलत हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी करवाने से एलर्जी, सदमा और मौत भी हो सकती है, इसलिए पहले डॉक्टर को जानें


 

share & View comments