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Tuesday, 17 February, 2026
होमहेल्थNEET-PG कट-ऑफ विवाद: 95 हज़ार नए एस्पिरेंट्स योग्य, मेरिट पर उठे बड़े सवाल

NEET-PG कट-ऑफ विवाद: 95 हज़ार नए एस्पिरेंट्स योग्य, मेरिट पर उठे बड़े सवाल

नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने कहा कि पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल सीटें खाली न रहें, इसलिए कट-ऑफ कम किया गया. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है.

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नई दिल्ली: नीट-पीजी 2025 काउंसलिंग के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल कम करने के अपने फैसले का बचाव करते हुए, नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस बदलाव से मेरिट से कोई समझौता नहीं हुआ, क्योंकि एडमिशन रैंक के आधार पर होते हैं और चुने गए एस्पिरेंट्स को डिग्री या डिप्लोमा पाने के लिए अपना कोर्स पूरा करना ही होगा.

बोर्ड ने कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि कट-ऑफ कम होने के बाद 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार नीट-पीजी 2025 काउंसलिंग में भाग लेने के योग्य हो गए, जिससे कुल संख्या 1,28,116 से बढ़कर 2,24,029 हो गई.

उसने चेतावनी दी कि अगर कोर्ट बोर्ड के फैसले को वापस लेने का आदेश देता है, तो इससे उन एस्पिरेंट्स को नुकसान होगा, जो इस मामले में पक्ष नहीं हैं.

NBEMS ने अपने हलफनामे में कहा, “यह जनहित में होगा कि सभी खाली सीटें भर दी जाएं, ताकि एस्पिरेंट्स स्पेशलाइजेशन कर सकें और अपने चुने हुए क्षेत्र में ज्यादा कुशल बन सकें.” NBEMS एक सरकारी संस्था है, जो पूरे भारत में मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं कराती है.

परीक्षा और नतीजे

2025 की नीट-पीजी परीक्षा, जो पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल और डेंटल एडमिशन के लिए होती है, पिछले साल 3 अगस्त को कराई गई थी. करीब 2.42 लाख एस्पिरेंट्स ने परीक्षा दी थी, जबकि पूरे देश में करीब 52,000 पीजी मेडिकल सीटें उपलब्ध थीं. 19 अगस्त को घोषित नतीजों में 1.28 लाख एस्पिरेंट्स काउंसलिंग के लिए योग्य हुए थे.

कई महीने बाद, 13 जनवरी को, NBEMS ने एक नोटिस जारी कर नीट-पीजी काउंसलिंग के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ परसेंटाइल को बहुत कम कर दिया, ताकि सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में हज़ारों खाली पीजी सीटें भरी जा सकें.

संशोधित नियम के अनुसार, आरक्षित वर्ग के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 40 से घटाकर शून्य कर दिया गया; सामान्य वर्ग के लिए 50वें परसेंटाइल से घटाकर 7वां परसेंटाइल कर दिया गया और सामान्य वर्ग के दिव्यांग एस्पिरेंट्स के लिए 45वें परसेंटाइल से घटाकर 5वां परसेंटाइल कर दिया गया.

व्यवहारिक रूप से, रिपोर्ट्स के अनुसार, इसका मतलब था कि आरक्षित वर्ग में 800 में से माइनस 40 अंक पाने वाले एस्पिरेंट्स भी योग्य हो गए, जबकि सामान्य वर्ग के लिए 800 में से 103 अंक और सामान्य वर्ग के दिव्यांग एस्पिरेंट्स के लिए 800 में से 90 अंक पर्याप्त थे.

जब यह सामने आया कि बहुत कम अंक पाने वाले एस्पिरेंट्स को पोस्ट-ग्रेजुएट सीटें मिल गईं, तो इस बदलाव की जनता में कड़ी आलोचना हुई.

उदाहरण के लिए, रोहतक में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज ने 800 में से 4 अंक पाने वाले उम्मीदवार को एमएस ऑर्थोपेडिक्स की सीट दे दी. तेलंगाना के कालोजी नारायण राव यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज में, 1 से 99 अंक पाने वाले 20 एस्पिरेंट्स को पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स में एडमिशन दिया गया.

कोर्ट में मामला

यह मामला कोर्ट तब पहुंचा, जब यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (यूडीएफ), सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन और अन्य लोगों ने NBEMS द्वारा पात्रता मानदंड कम करने के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की.

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि यह मामला “मानकों” से जुड़ा है.

बेंच ने कहा था, “सवाल यह है कि क्या इन मानकों से समझौता किया जा रहा है” और केंद्र सरकार को इस फैसले के पीछे का कारण बताते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा था.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस बदलाव से मेरिट कमजोर होती है और यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है.

याचिकाकर्ताओं के वकील सत्यम सिंह राजपूत ने कहा: “एस्पिरेंट्स को मनमाने तरीके से दिए गए अतिरिक्त अंक मेरिट के आधार पर सिलेक्शन को कमजोर करते हैं और संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं.”

उन्होंने आगे कहा: “यह हेरफेर, जो कथित रूप से निजी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े लोगों द्वारा किया गया, मेरिट और योग्यता के बजाय व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता देता है. ऐसी गड़बड़ियां भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सीधा खतरा हैं, क्योंकि इससे कम योग्य लोगों को महत्वपूर्ण मेडिकल पदों पर रखा जा सकता है, जिससे पूरे देश में मरीजों के इलाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है.”

सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को करेगा.

सरकार का पक्ष

इस महीने की शुरुआत में संसद में बोलते हुए, स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि क्वालिफाइंग परसेंटाइल कम किया गया “ताकि कीमती पीजी मेडिकल सीटें खाली न रहें.” पटेल ने यह भी कहा कि सीटों का पूरा उपयोग सुनिश्चित करने के लिए पिछले शैक्षणिक वर्षों में भी ऐसे कदम उठाए गए थे.

नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने, नाम न बताने की शर्त पर, कहा कि एडमिशन प्रक्रिया में ज्यादा स्पष्टता, स्थिरता और अनुमान की सुविधा देने के लिए नीट-पीजी सिस्टम में बड़े सुधार की योजना बनाई जा रही है.

अधिकारी ने कहा, “नीट-पीजी काउंसलिंग (2025) के दो राउंड के बाद 18,000 पीजी की सीटें खाली रह गई थीं, जिनमें से 5,000 से ज्यादा सरकारी मेरिट सीटें थीं. इससे साबित होता है कि यह सुधार निजी कॉलेजों के लिए नहीं है, जैसा गलत तरीके से बताया जा रहा है. अगर सरकारी सीटें खाली हैं, तो समस्या सिस्टम में है — न कि व्यापार से जुड़ी.”

अधिकारी ने आगे कहा, “एक राष्ट्रीय परीक्षा, जिसमें उसकी एक-तिहाई ट्रेनिंग क्षमता खाली रह जाए, यह तर्कसंगत नहीं है.”

एनएमसी वह संस्था है, जो भारत में मेडिकल शिक्षा की नीतियां बनाती है और नीट के नियम तय करती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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