गुरुग्राम: फरीदाबाद के एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस को सितंबर 2007 में 49.87 लाख रुपये में 12,019 वर्ग मीटर, यानी करीब तीन एकड़ सरकारी ज़मीन मिली. बदले में उसे गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करना था.
हालांकि, एचएसवीपी पोर्टल पर अपलोड डेटा एक अलग कहानी बताता है: एक आईपीडी (इनडोर पेशेंट डिपार्टमेंट) भर्ती, शून्य ओपीडी (आउटडोर पेशेंट डिपार्टमेंट) विजिट और अब तक शून्य रुपये का दर्ज लाभ. यह डेटा पांच साल का है.
फरीदाबाद में ही मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट विद मल्टीस्पेशलिटी को अक्टूबर 2005 में 2.67 करोड़ रुपये में 16,185 वर्ग मीटर, यानी करीब चार एकड़ ज़मीन मिली. इसके पोर्टल डेटा में सिर्फ तीन मरीजों का इलाज दिखाया गया है, सभी ओपीडी और कोई आर्थिक लाभ दर्ज नहीं. यह भी पांच साल का डेटा है.
ये तथ्य सोमवार को हरियाणा विधानसभा में एक सवाल के जवाब में सामने आए. नूंह से विधायक आफताब अहमद ने पूछा था कि गुरुग्राम और फरीदाबाद में कितने अस्पतालों को रियायती दर पर सरकारी ज़मीन मिली, शर्तें क्या थीं और सबसे महत्वपूर्ण, पिछले पांच साल में उन शर्तों के तहत कितने गरीब मरीजों का वास्तव में इलाज हुआ.
सरकार के जवाब के अनुसार, हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी, पहले एचयूडीए) ने 11 अस्पतालों को साइट आवंटित की—चार गुरुग्राम में और सात फरीदाबाद में. जवाब में यह भी सामने आया कि ज्यादातर अस्पताल, जिन्हें सरकार से बहुत ज्यादा सब्सिडी पर ज़मीन मिली, गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में नाकाम रहे हैं.
यह मामला अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करने के कुछ महीने बाद सामने आया. यह नोटिस मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय की जनहित याचिका पर जारी हुआ था. उन्होंने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि देश के बड़े प्राइवेट अस्पताल, जिन्हें रियायती या बहुत कम कीमत पर सरकारी जमीन मिली, वे ईडब्ल्यूएस और बीपीएल मरीजों को मुफ्त इलाज देने की अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे हैं.
अस्पताल और उन्हें मिली जमीन
गुरुग्राम में, हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) ने चार अस्पतालों—आर्टेमिस मेडिकेयर सर्विसेज, फोर्टिस हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, मेदांता द मेडिसिटी और संजीवनी लाइफ केयर मेडिकल सेंटर को ज़मीन दी. कुल मिलाकर करीब 66 एकड़ जमीन दी गई, जिसकी कुल कीमत लगभग 13.57 करोड़ रुपये थी. इनमें से अकेले मेदांता को 43 एकड़ जमीन मिली, जो 2004 में 6.70 करोड़ रुपये में दी गई थी.
फरीदाबाद में, सात अस्पतालों को ज़मीन दी गई—अंशु हॉस्पिटल, मेट्रो मल्टीस्पेशलिटी (मेट्रो हॉस्पिटल), क्यूआरजी हॉस्पिटल, एशियन हॉस्पिटल (ब्लू सैफायर हेल्थ केयर), सर्वोदय हॉस्पिटल (अंशु हॉस्पिटल की एक यूनिट), मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट विद मल्टीस्पेशलिटी और द मेट्रो स्पेशलिटी प्राइवेट लिमिटेड—कुल मिलाकर 23 एकड़ ज़मीन, जिसकी कुल कीमत लगभग 8.42 करोड़ रुपये थी.
सरकार ने क्या वादा किया था
गरीबों के फ्री ट्रीटमेंट पर राज्य की पॉलिसी के दो मुख्य चरण रहे हैं, एक 2008 में और दूसरा रिवाइज्ड वर्जन दिसंबर 2022 में.
2008 की हुडा पॉलिसी सर्कुलर (13 अगस्त 2008) के अनुसार, हुडा सेक्टर में जमीन पाने वाले अस्पतालों को अपने कुल ओपीडी मरीजों में से 20 प्रतिशत को फर्स्ट-कम-फर्स्ट-सर्व के आधार पर फ्री आउटडोर ट्रीटमेंट देना था.
इनडोर मरीजों के लिए, उन्हें अपनी कुल बेड क्षमता का 10 प्रतिशत इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन के लिए फ्री रखना था.
सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों के लिए थोड़ा अलग नियम था. उन्हें अपने फंक्शनल बेड का 20 प्रतिशत पर सब्सिडाइज्ड रेट (नॉर्मल चार्ज का 30 प्रतिशत) पर इलाज देना था, इसके अलावा 20 प्रतिशत मरीजों को फ्री ओपीडी देना था.
2008 की पॉलिसी के तहत एलिजिबिलिटी केवल बीपीएल कार्ड होल्डर्स, क्लास-4 गवर्नमेंट एम्प्लॉइज, और उन लोगों तक सीमित थी जिनकी मंथली इनकम 5,000 रुपये से ज्यादा नहीं थी और जो हरियाणा के डोमिसाइल थे.
2022 की पॉलिसी में इन गाइडलाइंस को रिवाइज और कंसोलिडेट किया गया. इनकम सीमा 5,000 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति महीना कर दी गई. सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों से कहा गया कि वे कुल फंक्शनल बेड का 20 प्रतिशत रिजर्व रखें और स्लैब-बेस्ड सब्सिडी सिस्टम फॉलो करें: अगर बिल 5 लाख रुपये तक है तो ट्रीटमेंट फ्री होगा; 5 लाख से 10 लाख रुपये के बिल पर नॉर्मल चार्ज का 10 प्रतिशत लिया जाएगा; और 10 लाख रुपये से ज्यादा के बिल पर नॉर्मल चार्ज का 30 प्रतिशत लिया जाएगा. एलिजिबिलिटी में आयुष्मान भारत कार्ड होल्डर्स और फैमिली आइडेंटिटी कार्ड होल्डर्स को भी शामिल किया गया.
दोनों पॉलिसी में अस्पतालों को अलग रजिस्टर मेंटेन करने, हर क्वार्टर रिपोर्ट सबमिट करने, और मरीजों की डिटेल एचएसवीपी पोर्टल पर अपलोड करने को कहा गया था.
एक मॉनिटरिंग कमेटी, जिसमें एचएसवीपी एडमिनिस्ट्रेटर चेयरपर्सन होता है, डिस्ट्रिक्ट सिविल सर्जन, डिस्ट्रिक्ट रेड क्रॉस सोसाइटी के प्रेसिडेंट, और एस्टेट ऑफिसर शामिल होते हैं, को हर क्वार्टर मीटिंग करके कंप्लायंस रिव्यू करना था.
अस्पतालों ने वास्तव में क्या किया
विधायक आफताब अहमद के इस सवाल का जवाब कि कितने गरीब मरीजों का इलाज हुआ, यहीं पर सरकार और अस्पताल दोनों के लिए मामला असहज हो जाता है.
सरकार के जवाब के अनुसार, बताए गए 11 अस्पतालों में से केवल 8 अस्पताल ही एचएसवीपी पोर्टल पर डेटा डाल रहे हैं.
तीन अस्पताल—फोर्टिस हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, संजीवनी लाइफ केयर मेडिकल सेंटर और मेट्रो की एक यूनिट—बिल्कुल भी डेटा अपलोड नहीं कर रहे हैं.
जो आठ अस्पताल डेटा डाल रहे हैं, उनके पोर्टल पर उपलब्ध सभी सालों के कुल आंकड़े दिखाते हैं कि कुल 8,086 मरीजों का इलाज हुआ, जिसमें 7,445 ओपीडी विजिट और 641 आईपीडी एडमिशन शामिल हैं. कुल दर्ज आर्थिक लाभ 5,00,92,123 रुपये है.
अस्पताल के अनुसार आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं. आर्टेमिस मेडिकेयर सर्विसेज ने 2,914 मरीजों का इलाज किया (2,639 ओपीडी, 275 आईपीडी), जिसमें दर्ज लाभ 58.61 लाख रुपये है. मेदांता द मेडिसिटी ने 751 मरीजों का इलाज किया (626 ओपीडी, 125 आईपीडी), जिसमें लाभ 3.89 करोड़ रुपये है. फरीदाबाद के एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में सिर्फ एक मरीज दिखाया गया है, एक आईपीडी एडमिशन, शून्य ओपीडी और दर्ज लाभ शून्य है.
मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट विद मल्टीस्पेशलिटी (एक एंट्री) में सिर्फ तीन मरीज दिखाए गए हैं. क्यूआरदी हॉस्पिटल में 913 मरीज दिखाए गए हैं, लेकिन दर्ज आर्थिक लाभ शून्य है. सर्वोदय हॉस्पिटल में 2,915 मरीज दिखाए गए हैं, सभी ओपीडी, शून्य आईपीडी, और फिर से लाभ की राशि शून्य है.
सिर्फ हरियाणा में ही नहीं
जब अगस्त में सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस एन. वी. अंजारिया और आलोक आराधे की बेंच सुनवाई कर रही थी, तब याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट संजय पारिख ने कोर्ट को बताया था कि कई राज्यों की CAG रिपोर्ट में लगातार नियमों का पालन नहीं करने की बात सामने आई है.
महाराष्ट्र में, 113 पब्लिक ट्रस्ट अस्पतालों में से सिर्फ 11 की टेस्ट-चेकिंग हुई और उनमें से ज्यादातर नियमों का पालन नहीं करते पाए गए. ओडिशा में, अपोलो हॉस्पिटल्स सहित अस्पतालों को 45.68 करोड़ रुपये की जमीन सिर्फ 3.28 करोड़ रुपये की रियायती कीमत पर दी गई, लेकिन वे अपने फ्री ट्रीटमेंट के दायित्व को पूरा नहीं कर पाए. याचिका में हरियाणा के एक मामले का भी जिक्र किया गया, जहां 64,000 भर्ती मरीजों में से सिर्फ 118 EWS मरीजों का 2017 में मुफ्त इलाज हुआ.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
