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Sunday, 1 February, 2026
होमहेल्थकैंसर-डायबिटीज की दवाएं सस्ती होंगी: 10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ योजना

कैंसर-डायबिटीज की दवाएं सस्ती होंगी: 10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ योजना

घरेलू बायोलॉजिक और बायोसिमिलर दवाओं को बढ़ावा देने के लिए केंद्र की 5 साल की 10,000 करोड़ रुपये की योजना, आयात पर निर्भरता घटेगी, इलाज होगा सस्ता.

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नई दिल्ली: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को केंद्रीय बजट 2026-27 में बायोलॉजिक और बायोसिमिलर दवाओं के देश में उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 10,000 करोड़ रुपये की ‘बायोफार्मा शक्ति’ योजना की घोषणा की. यह योजना अगले पांच साल तक लागू रहेगी.

संसद में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि भारत में अब बीमारियों का दबाव कैंसर, डायबिटीज और ऑटोइम्यून जैसी गैर-संचारी बीमारियों की ओर बढ़ रहा है. इन बीमारियों के इलाज में बायोलॉजिक दवाएं बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन उनकी कीमत ज्यादा होने के कारण आम लोगों तक इनकी पहुंच सीमित है.

उन्होंने कहा, “बायोलॉजिक दवाएं जीवन की गुणवत्ता और उम्र बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं, लेकिन इनकी ऊंची कीमत इलाज को महंगा बना देती है.”

इस योजना के तहत तीन नए राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NIPER) खोले जाएंगे, जहां दवा विकास से जुड़े छात्रों और शोधकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा. इसके साथ ही देश में मौजूद सात NIPER संस्थानों को भी बेहतर बनाया जाएगा.

बायोलॉजिक दवाएं जीवित कोशिकाओं या जीवों से बनाई जाती हैं. इनमें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, जीन थेरेपी, हार्मोन और एंजाइम जैसी दवाएं शामिल हैं. इनका इस्तेमाल कैंसर, डायबिटीज और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में होता है. ये दवाएं आम केमिकल दवाओं से अलग होती हैं क्योंकि इनकी संरचना ज्यादा जटिल होती है.

वहीं, बायोसिमिलर दवाएं बायोलॉजिक दवाओं के सस्ते विकल्प होती हैं. ये जेनेरिक दवाओं जैसी होती हैं, लेकिन बायोलॉजिक दवाओं की जटिलता के कारण इन्हें बनाना आसान नहीं होता.

पीपुल्स हेल्थ मूवमेंट के ग्लोबल कोऑर्डिनेटर और एनएचएसआरसी के पूर्व प्रमुख डॉ. टी. सुंदररमन ने इस कदम को समय की जरूरत बताया. उन्होंने कहा कि भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र में बायोलॉजिक दवाओं की भूमिका बहुत अहम होगी, लेकिन अभी ये दवाएं बेहद महंगी हैं.

उन्होंने कहा कि भारत को इन दवाओं की उपलब्धता के साथ-साथ इनके देश में उत्पादन की क्षमता भी बढ़ानी होगी. साथ ही उन्होंने दवाओं के कच्चे माल यानी एपीआई के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत बताई.

सी.के. बिड़ला अस्पताल, नई दिल्ली की इंटरनल मेडिसिन डायरेक्टर डॉ. मनीषा अरोड़ा ने कहा कि यह योजना भारत के बायोफार्मा सेक्टर को मजबूत कर सकती है. घरेलू उत्पादन और नियमों में सुधार से इलाज सस्ता होगा और इंसुलिन व मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसी दवाएं ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगी.

उन्होंने कहा कि बायोसिमिलर दवाओं में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कैंसर, डायबिटीज और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज की लागत कम होगी.

इसके अलावा सरकार 1,000 स्वीकृत क्लिनिकल ट्रायल केंद्रों का नेटवर्क भी बनाएगी, जहां नई दवाओं की जांच होगी. दवाओं की मंजूरी देने वाली संस्था CDSCO को भी मजबूत किया जाएगा, ताकि मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हो सके.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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