नई दिल्ली: पिछले तीन दशकों में भारत में ब्रेस्ट कैंसर के मामले बहुत तेज़ी से बढ़े हैं. 1990 के बाद से नए मामले लगभग पांच गुना बढ़ गए हैं—यह वृद्धि दुनिया भर में बढ़ते खतरनाक रुझान जैसी ही है. मंगलवार को द लांसेट ऑन्कोलॉजी में छपी एक नई ग्लोबल स्टडी में यह बात कही गई है.
स्टडी करने वाले शोधकर्ताओं ने 2023 के आंकड़ों की जांच की जिसमें कैंसर रजिस्ट्रियां, सरकारी रिकॉर्ड और जिन महिलाओं की मौत हो चुकी है उनके परिवारों से बातचीत शामिल थी और पाया कि 1990 के बाद से ब्रेस्ट कैंसर के मामले और मौतों की संख्या दोनों तेज़ी से बढ़े हैं.
2023 में भारत में ब्रेस्ट कैंसर के लगभग 2.03 लाख नए मामले दर्ज हुए, जो 1990 की तुलना में 477.8 प्रतिशत ज्यादा हैं. इसी अवधि में ब्रेस्ट कैंसर से मौतों की संख्या 1.02 लाख तक पहुंच गई, जो 352.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.
2023 में आयु-मानकीकृत घटना दर—यानि जनसंख्या बढ़ने और उम्र बढ़ने के असर को हटाकर निकाला गया आंकड़ा, प्रति एक लाख महिलाओं पर 29 (29.4) से ज्यादा नए मामले थी, जो 1990 की तुलना में 126.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाती है. आयु-मानकीकृत मृत्यु दर प्रति एक लाख महिलाओं पर 15 (15.5) से ज्यादा मौतें थी, जो तीन दशकों में 74 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.

यह स्टडी 204 देशों और क्षेत्रों में की गई थी.
ग्लोबल और डेवलपिंग देशों पर बढ़ता दबाव
स्टडी के अनुसार, दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर के मामले लगभग एक-तिहाई बढ़ने का अनुमान है. 2023 में 23 लाख से बढ़कर 2050 तक 35 लाख से ज्यादा हो सकते हैं. इसी दौरान हर साल होने वाली मौतें 7.64 लाख से बढ़कर लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती हैं.
यह अनुमान ऐसे समय में आया है जब ब्रेस्ट कैंसर पहले से ही दुनिया भर में महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर है और कैंसर से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2022 में 185 में से 157 देशों में यह महिलाओं में सबसे आम कैंसर था और हर साल लगभग छह लाख मौतों का कारण बना.
भारत की स्थिति उन कम और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) जैसी है, जहां ब्रेस्ट कैंसर के मामले और मौतें तेज़ी से बढ़ रही हैं. इसके उलट, कई अमीर देशों में मामले स्थिर हो गए हैं और बेहतर जांच और इलाज की सुविधा से मौतें कम हुई हैं.

उदाहरण के लिए, 2023 में मोनाको, अंडोरा, फ्रांस, जर्मनी और आयरलैंड जैसे उच्च आय वाले देशों में प्रति एक लाख महिलाओं पर 100 से ज्यादा नए मामले दर्ज हुए. वहीं अफगानिस्तान, सोमालिया और मोजाम्बिक जैसे कम आय वाले देशों में प्रति एक लाख महिलाओं पर 13 या उससे कम मामले दर्ज हुए.
हालांकि, दुनिया में सबसे ज्यादा मामले कुछ अमीर देशों में हैं, लेकिन वहां जांच की दर भी ज्यादा है, जबकि गरीब देशों में मामलों की बढ़ोतरी सबसे तेज़ देखी जा रही है.
1990 के बाद से कम आय वाले देशों में ब्रेस्ट कैंसर के नए मामलों में औसतन 147 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. वहीं उच्च आय वाले देशों में मौत की दर लगभग 30 प्रतिशत कम हुई है, लेकिन कम आय वाले देशों में मौत की दर लगभग दोगुनी हो गई है और प्रति एक लाख महिलाओं पर 24 मौतों तक पहुंच गई है.
सिर्फ 2023 में ही कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों की महिलाओं में दुनिया के कुल नए मामलों का 27 प्रतिशत हिस्सा था, लेकिन स्वस्थ जीवन के कुल खोए वर्षों का 45 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा, लगभग 1.1 करोड़ साल, इन्हीं देशों में दर्ज हुआ.
नाइजीरिया की डॉक्टर और महामारी विशेषज्ञ डॉ. ओलायिंका इलेसानमी, जो अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन में काम करती हैं और इस स्टडी की को-राइटर हैं, उन्होंने कहा, “कम और मध्यम आय वाले देश ब्रेस्ट कैंसर के बढ़ते बोझ से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. इन देशों में जीवनशैली और आबादी में बदलाव हो रहा है, लेकिन उनकी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है कि वह सही तरीके से मुकाबला कर सके. यहां रेडियोथेरेपी मशीनों, कीमोथेरेपी दवाओं और पैथोलॉजी लैब की कमी है और सामान्य इलाज भी काफी महंगा हो सकता है.”
उन्होंने कहा, “हालांकि, अमीर देशों में ब्रेस्ट कैंसर की जांच, पहचान और इलाज में सुधार के कारण मरीजों की ज़िंदा रहने की दर बढ़ रही है, लेकिन वहां भी किसी महिला का नतीजा इस बात पर निर्भर कर सकता है कि वह किस जगह रहती है.”
कम उम्र की महिलाओं को भी खतरा
हालांकि, ब्रेस्ट कैंसर ज्यादा उम्र की महिलाओं में ज्यादा पाया जाता है, लेकिन अब कम उम्र की महिलाएं भी बढ़ते खतरे में हैं.
2023 में 55 साल और उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं में प्रति एक लाख पर लगभग 161 नए मामले सामने आए. वहीं 20 से 54 साल की महिलाओं में प्रति एक लाख पर 50 नए मामले दर्ज हुए.
दुनिया भर में 1990 के बाद से कम उम्र की महिलाओं में मामलों की दर 29 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि ज्यादा उम्र की महिलाओं में यह दर लगभग स्थिर रही है.
डॉक्टरों का कहना है कि भारतीय क्लीनिकों में भी ऐसे ही रुझान देखे जा रहे हैं.
गुरुग्राम के पारस हॉस्पिटल में कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. शिप्रा गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया कि ब्रेस्ट कैंसर जो पहले ज्यादातर ज्यादा उम्र की महिलाओं से जुड़ा माना जाता था, अब कम उम्र के मरीजों में भी अक्सर पाया जा रहा है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “महिलाएं अब देर से बच्चे पैदा कर रही हैं, मोटापा बढ़ रहा है, इंसुलिन रेजिस्टेंस ज्यादा हो रही है, बहुत ज्यादा बैठकर रहने वाला लाइफस्टाइल हो गया है और प्रोसेस्ड व ज्यादा चीनी वाला खाना ज्यादा खाया जा रहा है. साथ ही शराब और तंबाकू का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है. ये सब मिलकर ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में ऐसी बढ़ोतरी कर रहे हैं, जैसी पहले कभी नहीं देखी गई.”
‘लाइफस्टाइल से बढ़ रहा है खतरा’
इस ग्लोबल स्टडी के मुताबिक 2023 में ब्रेस्ट कैंसर के कुल मामलों में से 28 प्रतिशत मामले छह ऐसे जीवनशैली से जुड़े कारणों से जुड़े थे, जिन्हें बदला जा सकता है. लाल मांस का ज्यादा सेवन सबसे ज्यादा जुड़ा पाया गया, इसके बाद तंबाकू का इस्तेमाल. हाई ब्लड शुगर, मोटापा, शराब का सेवन और कम शारीरिक गतिविधि भी ज्यादा खतरे से जुड़े पाए गए.
इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्युएशन और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर की को-सीनियर राइटर डॉ. मैरी एनजी ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, “जब दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर के एक-चौथाई से ज्यादा मामले छह ऐसे लाइफस्टाइल कारणों से जुड़े हैं जिन्हें बदला जा सकता है, तो अगली पीढ़ी के लिए इस खतरे की दिशा को बदलने के बहुत बड़े मौके मौजूद हैं.”
भारत में हाल के आधिकारिक आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता दिखाते हैं. पिछले महीने संसद में रखे गए नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के आंकड़ों के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर के मामले 2021 में लगभग 2.13 लाख से बढ़कर 2025 में 2.4 लाख हो गए. मौतें 2021 में 91,704 से बढ़कर 2025 में 1.03 लाख से ज्यादा हो गईं.
दिल्ली के सीके बिरला हॉस्पिटल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. मंदीप सिंह मल्होत्रा ने दिप्रिंट से कहा, “हमें रोकथाम, जल्दी पहचान और इलाज की सुविधा पर ध्यान देना होगा. लाइफस्टाइल में बदलाव, ज्यादा हेल्दी खाना, ज्यादा शारीरिक गतिविधि और नशे का कम इस्तेमाल बहुत ज़रूरी है.”
उन्होंने आगे कहा, “ब्रेस्ट की खुद जांच करने के बारे में जागरूकता फैलाना और मैमोग्राफी व एआई आधारित इमेजिंग जैसे जांच के साधनों तक बेहतर पहुंच कैंसर को जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है. समय पर और सबके लिए बराबर इलाज की सुविधा भी उतनी ही ज़रूरी है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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