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Wednesday, 11 March, 2026
होमहेल्थभारत में 2021 के बाद हर साल 28 हज़ार नए कैंसर मामले और 15 हज़ार मौतें बढ़ीं: सरकार ने संसद में कहा

भारत में 2021 के बाद हर साल 28 हज़ार नए कैंसर मामले और 15 हज़ार मौतें बढ़ीं: सरकार ने संसद में कहा

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रति व्यक्ति आधार पर बढ़ोतरी बहुत बड़ी नहीं, लेकिन ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में कम रिपोर्टिंग के कारण असली बोझ इससे ज्यादा हो सकता है.

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नई दिल्ली: भारत में पिछले पांच वर्षों में कैंसर के मामलों और इससे होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढ़ी है. संसद में साझा किए गए स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में मामलों में सबसे ज्यादा मामले बढ़े हैं.

अनुमान के मुताबिक, 2021 में देश में करीब 14.26 लाख कैंसर के मामले थे, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 15.7 लाख हो गए. यानी पांच साल में करीब 1.44 लाख नए मामले बढ़े. इसका मतलब है कि भारत में हर साल औसतन 28,000 नए कैंसर मामले बढ़ रहे हैं.

इसी अवधि में कैंसर के कारण होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ी है. 2021 में यह संख्या 7,89,202 थी, जो 2025 में बढ़कर 8,68,588 हो गई. यानी पांच साल में 79,386 मौतें बढ़ीं, जो 2021 के बाद हर साल 15,000 से ज्यादा कैंसर मौतों के बराबर है.

ये आंकड़े मंगलवार को राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने एक सवाल के जवाब में साझा किए. यह अनुमान भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम (एनसीआरपी) से लिए गए हैं.

बड़ी और अधिक आबादी वाले राज्यों में कैंसर के मामलों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है.

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई. यहां अनुमानित मामले 2021 में 2,06,088 से बढ़कर 2025 में 2,26,125 हो गए—यानी 20,000 से ज्यादा मामलों की बढ़ोतरी. इसके बाद बिहार और महाराष्ट्र का स्थान है, जहां इसी अवधि में 11,000 से ज्यादा नए मामले बढ़े.

इन राज्यों में कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ी है. उत्तर प्रदेश में 2021 से 2025 के बीच कैंसर से होने वाली मौत के आंकड़े 11,000 से ज्यादा बढ़े हैं, जो देश में सबसे ज्यादा है. बिहार में इस अवधि में 6,528 और महाराष्ट्र में 6,370 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं.

इन्फोग्राफिक: सोनाली डब/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: सोनाली डब/दिप्रिंट

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मुकुर्दीपी रे के अनुसार, यह बढ़ोतरी एनसीआरपी के अनुमान के मुताबिक ही है.

डॉ. रे ने दिप्रिंट से कहा, “यह रुझान हर साल धीरे-धीरे बढ़ोतरी को दिखाता है, जिसका मुख्य कारण जनसंख्या में वृद्धि और लोगों की बढ़ती उम्र है. पांच साल में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी—यानी हर साल करीब 28,000 अतिरिक्त मामले—पहले से ही संसाधनों की कमी झेल रही स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है. हालांकि, प्रति व्यक्ति आधार पर यह बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं है और औसत दर अभी भी लगभग 1 लाख आबादी पर 100 मामलों के आसपास है.”

डॉ. रे ने यह भी कहा कि मामलों में बढ़ोतरी का एक कारण बेहतर जांच सुविधाएं और कैंसर रजिस्ट्रेशन सिस्टम का मजबूत होना भी हो सकता है, न कि केवल बीमारी का अचानक बढ़ना.


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‘असल बोझ इससे ज्यादा हो सकता है’

सार्वजनिक स्वास्थ्य के नज़रिए से कैंसर के मामलों में यह बढ़ोतरी काफी महत्वपूर्ण है.

डॉ. रे ने बताया कि इससे उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे घनी आबादी वाले राज्यों पर स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ और बढ़ रहा है, क्योंकि यहां मरीजों की संख्या ज्यादा है.

उन्होंने कहा, “कुछ रजिस्ट्रियों के विश्लेषण में उम्र के हिसाब से मामलों की दर स्थिर दिखाई देती है, लेकिन ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में कम रिपोर्टिंग के कारण असली बोझ मौजूदा अनुमान से काफी ज्यादा हो सकता है.”

इस बढ़ते रुझान के पीछे कई कारण हैं. बेहतर जांच सुविधाएं, आधुनिक इमेजिंग तकनीक और कैंसर रजिस्ट्रियों का विस्तार कुछ हद तक इस बढ़ोतरी की वजह हो सकते हैं, लेकिन इसके अलावा कई वास्तविक कारण भी जिम्मेदार हैं.

डॉ. रे के अनुसार, “इनमें बढ़ती उम्र, तंबाकू का सेवन, अस्वस्थ खानपान, शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा और पर्यावरणीय कारक शामिल हैं. महानगरों में वायु प्रदूषण और कुछ क्षेत्रों में पानी का प्रदूषण भी कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है, खासकर उत्तर भारत के घनी आबादी वाले राज्यों में.”

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, कुछ पर्यावरणीय कारणों को भी कैंसर के खतरे से जोड़ा गया है. सरकार द्वारा उद्धृत 2025 की एक समीक्षा में कहा गया है कि औद्योगिक कचरे, कीटनाशकों, भारी धातुओं और दवाइयों के प्रदूषकों से पानी के स्रोतों के दूषित होने का संबंध रेक्टल और कोलोरेक्टल कैंसर से हो सकता है.

जल्दी पहचान की ज़रूरत

बढ़ते कैंसर मामलों से निपटने के लिए सरकार देशभर में कैंसर उपचार से जुड़ी सुविधाओं का विस्तार कर रही है.

‘स्ट्रेंथनिंग ऑफ टर्शियरी केयर कैंसर फैसिलिटीज स्कीम’ के तहत 19 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट और 20 टर्शियरी केयर कैंसर सेंटर को मंजूरी दी गई है, ताकि इलाज तक पहुंच बेहतर हो सके.

इसके अलावा मुंबई के टाटा मेमोरियल सेंटर ने वाराणसी, विशाखापत्तनम, न्यू चंडीगढ़, गुवाहाटी, संगरूर और मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में अस्पताल स्थापित किए हैं, जहां विशेष कैंसर उपचार दिया जा रहा है.

सभी 22 नए एम्स में भी कैंसर उपचार की सुविधाओं को मंजूरी दी गई है. वहीं झज्जर में नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट और कोलकाता में चित्तरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के दूसरे कैंपस को जांच, शोध और इलाज के लिए विकसित किया गया है.

केंद्रीय बजट 2025-26 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगले तीन साल में सभी जिला अस्पतालों में डे-केयर कैंसर सेंटर बनाने की घोषणा की थी. 2025-26 के लिए 297 केंद्रों को मंजूरी दी गई है. इनका उद्देश्य कीमोथेरेपी तक आसान पहुंच देना और बड़े अस्पतालों पर बोझ कम करना है.

वहीं आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) के तहत प्रति परिवार हर साल 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर मिलता है, जिसमें कैंसर का इलाज भी शामिल है.

डॉ. रे ने कहा, “सरकार की पहल से इलाज तक पहुंच बढ़ाने में प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी कई बड़ी चुनौतियां हैं. भारत में प्रशिक्षित ऑन्कोलॉजिस्ट की कमी है, रेडियोथेरेपी की सुविधाएं सीमित हैं और अधिकतर मरीजों में बीमारी का पता देर से चलता है. लगभग 60 से 70 प्रतिशत मरीज तब सामने आते हैं जब कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है.”

उन्होंने कहा कि स्तन, गर्भाशय ग्रीवा और मुंह के कैंसर की जनसंख्या आधारित स्क्रीनिंग को खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में और मजबूत करने की जरूरत है.

डॉ. रे ने कहा, “HPV टीकाकरण का विस्तार, तंबाकू छोड़ने के कार्यक्रमों को मजबूत करना और फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों के जरिए शुरुआती रेफरल सिस्टम को बेहतर बनाना जल्दी पहचान और बेहतर इलाज में बड़ी मदद कर सकता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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