नई दिल्ली: 16वें वित्त आयोग के लिए कराई गई एक स्टडी के अनुसार, भारत को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद कमियों को पूरा करने के लिए हर साल 2.25 लाख करोड़ और चाहिए. इसके अलावा, स्वास्थ्य ढांचे की कमी को पूरा करने के लिए 1.31 लाख करोड़ और की ज़रूरत है.
ये अनुमान नेशनल हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर (NHSRC) ने तैयार किए हैं. इस अध्ययन में स्वास्थ्य ढांचे के मानकों, स्टाफ की कमी, और घरों द्वारा दवाओं व जांच पर किए जाने वाले खर्च के आंकड़ों का इस्तेमाल कर सरकारी स्वास्थ्य खर्च का विश्लेषण किया गया.
स्टडी में पाया गया कि आबादी की ज़रूरतें पूरी करने और लोगों की जेब से होने वाले खर्च पर निर्भरता कम करने के लिए सरकारी फंडिंग अभी भी कम है.
इसमें कहा गया है, “यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) की ओर बढ़ने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च का महत्व दुनिया भर में माना गया है. भारत में यूएचसी की दिशा में प्रगति के लिए सरकार की भूमिका बेहद अहम है.”
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को संसद में 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट पेश की थी, साथ ही केंद्रीय बजट भी रखा गया था. केंद्रीय बजट 2026-27 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 1.06 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया, जो 2025-26 की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत ज्यादा है.
आर्थिक सर्वेक्षण 2023–24 के अनुसार, वित्त वर्ष 2024 तक सरकारी स्वास्थ्य खर्च जीडीपी का 1.9 प्रतिशत हो गया था, जो 2021-22 के मुकाबले बहुत ही मामूली बढ़ोतरी है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 ने 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा था, जिसे भारत पहले ही चूक चुका है.
मौजूदा कमियों की संरचना
स्टडी में कहा गया है कि नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (एनएचए) के सबूत बताते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च धीरे-धीरे बढ़ा है.
एनएचए के आंकड़ों के अनुसार, जो केवल 2021-22 तक उपलब्ध हैं, जीडीपी में सरकारी स्वास्थ्य खर्च (जीएचई) का हिस्सा 2014-15 में 1.13 प्रतिशत से बढ़कर 2021–22 में 1.84 प्रतिशत हो गया. इसी अवधि में कुल सरकारी खर्च में इसका हिस्सा भी 3.9 प्रतिशत से बढ़कर 6.12 प्रतिशत हो गया.
रिपोर्ट के अनुसार, इसी समय कुल स्वास्थ्य खर्च में सरकारी खर्च का हिस्सा 29 प्रतिशत से बढ़कर 48 प्रतिशत हो गया.
हालांकि, इससे ढांचागत कमियां खत्म नहीं हुई हैं. रिपोर्ट में कहा गया है, “प्रगति के बावजूद, सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की पर्याप्त उपलब्धता और सरकारी संस्थानों में सेवाओं की डिलीवरी को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं.”
एनएचए के आंकड़ों के मुताबिक, घरों को अब भी स्वास्थ्य पर बड़ा खर्च खुद उठाना पड़ रहा है, क्योंकि जेब से किया जाने वाला खर्च (OOPE) अभी भी कुल स्वास्थ्य खर्च का करीब 45 प्रतिशत है.
अध्ययन के लेखकों ने कहा है, “स्वास्थ्य पर जेब से किया जाने वाला खर्च एक नुकसानदायक तरीका माना जाता है, क्योंकि इससे घरों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है.”
इस अध्ययन में मिश्रित पद्धति अपनाई गई है. इसमें इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड्स (आईपीएचएस) के तहत तय ढांचे के मानकों को नेशनल सैंपल सर्वे के कॉम्प्रिहेंसिव एनुअल मॉड्यूलर सर्वे 2022–23 के घरेलू खर्च के आंकड़ों के साथ जोड़ा गया है.
स्टडी में पब्लिक हेल्थ सिस्टम के दो हिस्सों को देखा गया है—ढांचा और सेवा डिलीवरी. ढांचे की लागत में सब-हेल्थ सेंटर, प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर बनाना शामिल है. सेवा डिलीवरी की लागत में स्टाफ की सैलरी, दवाओं पर खर्च और जांच जैसी चीज़ें शामिल हैं.
इस विश्लेषण में मेडिकल कॉलेज जैसे तृतीयक इलाज को शामिल नहीं किया गया है और सिर्फ प्राथमिक और द्वितीयक इलाज पर ध्यान दिया गया है.
फंडिंग गैप का अनुमान लगाने के लिए स्टडी में दो स्थितियों का मॉडल बनाया गया. पहली स्थिति में सिर्फ वे लोग शामिल हैं जो सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं. दूसरी स्थिति में पूरी आबादी को शामिल किया गया है, जिसमें दवाओं और जांच पर घरों के खर्च को अधूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का संकेत माना गया है.
पहली स्थिति में, जहां सिर्फ सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने वाले लोग शामिल हैं—सेवा डिलीवरी का अंतर 56,594 करोड़ या करीब 409 रुपये प्रति व्यक्ति आंका गया है. पूरी आबादी को शामिल करने पर यह अंतर बढ़कर 2.25 लाख करोड़ या 1,627 प्रति व्यक्ति हो जाता है.
स्टडी में कहा गया है, “सेवा डिलीवरी के लिए ज़रूरी संसाधनों के मामले में राज्यों के बीच काफी अंतर है.”
दूसरी स्थिति में राष्ट्रीय सेवा डिलीवरी गैप का 16 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश का है. इसके बाद पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र का नंबर आता है.
आईपीएचएस के जनसंख्या मानकों और मौजूदा सुविधाओं की कमी के आधार पर, स्टडी ने कुल ढांचागत कमी 1.31 लाख करोड़ आंकी है. यह कमी राज्यों में समान रूप से नहीं बंटी है. बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल मिलकर कुल ढांचागत कमी का आधे से ज्यादा हिस्सा रखते हैं.
प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो देश में औसतन ढांचागत कमी 945 प्रति रुपये व्यक्ति बैठती है, जिसमें राज्यों के बीच बड़ा अंतर है.
इसमें पाया गया है कि सरकार के नेतृत्व में स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी, लोगों तक इलाज की पहुंच बढ़ाने और घरों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए बहुत ज़रूरी है. स्टडी में कहा गया है, “सरकार द्वारा दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवाएं सभी के लिए सुलभ स्वास्थ्य प्रणाली बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.”
लेखकों का कहना है कि पूंजीगत खर्च और राजस्व खर्च—दोनों पर ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि भारत को एक तरफ ढांचे की कमी और दूसरी तरफ कम फंड वाली स्वास्थ्य सेवाओं, दोनों का सामना करना पड़ रहा है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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