Thursday, 19 May, 2022
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बैंकर्स, इंजीनियर्स, रिसर्चर्स और अन्य पेशेवर लोग एडटेक प्लेटफॉर्म्स पर क्यों बन रहे हैं टीचर्स

किसी स्कूल या कॉलेज में नौकरी के लिए बीएड या नेट (NET) और पीएचडी योग्यता की ज़रूरत होती है, लेकिन एडटेक प्लेटफॉर्म्स उनपर ज़ोर नहीं देते. वो अपने शिक्षकों में बस विशेष ज्ञान की मांग करते हैं.

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नई दिल्ली: पिछले दो वर्षों में जब कोविड-19 ने दुनिया को वास्तविक जीवन के अनुभवों, दिनचर्या, कार्य और सेवाओं के, वर्चुअल विकल्प तलाशने की ओर ठेला है, तो डिजिटल लिविंग और लर्निंग को दिए गए बढ़ावे से, जिस क्षेत्र को सबसे अधिक लाभ हुआ है वो है एडटेक या एजुकेशन टेक्नॉलजी- जिसका मतलब ऑनलाइन शिक्षा और सेवाओं से होता है.

नवंबर 2021 में इंडिया ब्राण्ड ईक्विटी फाउण्डेशन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की एडटेक इंडस्ट्री जिसका मूल्य 2020 में 75 करोड़ अमेरिकी डॉलर आंका गया था, उसके 2025 तक 4 बिलियन डॉलर पहुंच जाने का अनुमान है. सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी (सीबीजीए) की ओर से प्रकाशित एक और रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि भारत में फिलहाल 4,530 एडटेक स्टार्ट-अप्स काम कर रही हैं, जिनमें से 435 केवल पिछले दो वर्षों में सामने आईं हैं.

इन प्लेटफॉर्म्स पर शिक्षा के पांच प्रमुख क्षेत्रों में पढ़ाई की जाती है- स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, कौशल शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, और ग़ैर-शैक्षणिक विषय (जैसे गाना, कोई यंत्र बजाना, या कोई नई भाषा बोलना).

लेकिन, दिलचस्प बात ये है कि ये एडटेक पोर्टल्स, न केवल छात्रों को घर बैठे अपने कौशल और ज्ञान को निखारने का मौक़ा देते हैं, बल्कि इस क्षेत्र ने बहुत लोगों को रोज़गार के अवसर भी पेश किए हैं, और इनमें सब शैक्षिक या अकादमिक पृष्ठभूमि से नहीं हैं.

इन एडटेक पोर्टल्स से जुड़े लोगों ने बताया, कि पहले के कॉर्पोरेट या अन्य पेशेवर पृष्ठभूमि के बहुत से लोगों को, इन प्लेटफॉर्म्स पर आकर पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है.

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जहां देश की औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में नौकरी के लिए, शिक्षकों या प्रोफेसरों को बीएड (स्कूलों के लिए) या नेट या पीएचडी योग्यता (कॉलेजों के लिए) की ज़रूरत होती है, वहीं एडटेक प्लेटफॉर्म्स फैकल्टी की भर्ती करते हुए, इन योग्यताओं के न होने को, कोई बंदिश नहीं समझते.

बल्कि, फैकल्टी सदस्य से मांगी गई योग्यता, उस प्लेटफॉर्म विशेष द्वारा पेश किए जा रहे कौशल/लर्निंग की नेचर पर निर्भर करती है. प्रमुख एडटेक प्रेलफॉर्म्स से जुड़े लोगों ने दिप्रिंट को बताया, कि उनके लिए पढ़ाने के काम में लगे बहुत सारे लोग, ग़ैर-शैक्षणिक पृष्ठभूमि से हैं, और उन्होंने पेशेवर तौर पर पहले कभी पढ़ाया नहीं है.

भारत में एडटेक क्षेत्र फिलहाल सरकार द्वारा विनियामित नहीं है, हालांकि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पिछले हफ्ते कहा, कि इन प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करने के लिए, सरकार एक आम नीति लाने की योजना बना रही है.

नीति के न होने से, वेतन में भी बहुत अंतर होता है- ऐसे ही एक प्लेटफॉर्म के प्रशासनिक हेड के अनुसार, 30,000 रुपए से लेकर 1.5 लाख प्रतिमाह या उससे भी अधिक- लेकिन बैंकर्स, इंजीनियर्स और रिसर्चर्स का इस करियर की ओर आकर्षित होना इस बात का संकेत है कि वेतन संतोषजनक है.

‘बहुत लोग विशिष्ट कौशल और ज्ञान के आधार के लिए आते हैं’

पैंतीस वर्षीय बैंकर संदीप वर्धन एक दशक तक अलग अलग निवेश कंपनियों में काम करने के बाद, पिछले साल एडटेक टीचर बन गए. वो कॉलेज छात्रों को बैंकिंग और वित्त पढ़ाते हैं और उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं.

एक दूसरे एडटेक प्लेटफॉर्म यूनेक्स्ट का फैकल्टी पूल, जो कॉलेज छात्रों और काम करने वाले पेशेवरों की ज़रूरतें पूरी करता है, एक मिश्रित बैग है जिसमें पूर्व शिक्षक और ग़ैर-शिक्षक शामिल हैं. यूनेक्स्ट के चीफ अकैडमिक ऑफिसर और फैकल्टी सदस्य भास्करन श्रीनिवासन ने कहा, ‘हम में से अधिकांश अकादमिक पृष्ठभूमि से नहीं हैं. बहुत से लोग दूसरे उद्योगों से हैं, और अपने विशिष्ट कौशल और ज्ञान के लिए प्लेटफॉर्म के साथ जुड़ते हैं’.

ख़ुद भास्करन योग्यता के हिसाब से एक इंजीनियर हैं, जिनके पास प्रोडक्ट डेवलपमेंट का 28 साल से अधिक का अनुभव है, और 11 साल तक वो मणिपाल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस से जुड़े रहे हैं. मणिपाल समूह और फिर यूनेक्स्ट में आने से पहले, उन्होंने पेशेवर तौर पर कभी नहीं पढ़ाया था.

बीएड या पढ़ाने की ऐसी ही कोई अन्य ट्रेनिंग अतिरिक्त फायदा पहुंचा सकती है, लेकिन इसका न होना भर्ती के समय किसी संभावित उम्मीदवार के खिलाफ नहीं जाता.

स्कूली छात्रों को कोडिंग और रोबोटिक्स जैसे कौशल सिखाने वाले एक एडटेक प्लेटफॉर्म, स्टेमरोबो टेक्नॉलजीज़ के सह-संस्थापक अनुराग गुप्ता ने कहा, ‘वैसे तो हमारे यहां ऐसा कोई नियम नहीं है, कि उम्मीदवार के पास बीएड या पीजीसीई होनी चाहिए, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इंटरव्यू के दौरान उन्हें ज़्यादा फायदा मिलता है, अगर उनके पास बीएड या बीटीसी के साथ कोई तकनीकी डिग्री होती है’.

उन्होंने आगे कहा, ‘चूंकि हम रोबोटिक्स, एआई, इंजीनियरिंग कोर्सेज़ पढ़ाते हैं, इसलिए हम ऐसे उम्मीदवार तलाशते हैं, जिनके पास इनसे जुड़ा अनुभव या योग्यताएं होती हैं, अच्छी कम्यूनिकेशन स्किल्स होती है, और साथ ही बच्चों को संभालने की सलाहियत होती है. उनमें बाल मनोविज्ञान समझने की क्षमता होनी चाहिए’.

एक प्लेटफॉर्म के एक शिक्षक के एनुसार, पारंपरिक शिक्षण संस्थानों और एडटेक प्लेटफॉर्म्स के बीच, फैकल्टी के चयन के मानदंड चुनने में अंतर का कारण ये है, कि पारंपरिक और ऑनलाइन शिक्षा में पढ़ाने के बीच ‘फर्क’ होता है.

नाम छिपाने की शर्त पर शिक्षक ने कहा, ‘स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षक छात्रों को जीवन के लिए तैयार करते हैं, और उन्हें अपने भविष्य में कोई भी भूमिका अपनाने के योग्य बनाते हैं. जबकि एडटेक प्लेटफॉर्म्स में शिक्षक एक विशिष्ट प्रकार का कौशल या ज्ञान सिखाते हैं’.


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‘पहले दिन को लेकर नर्वस था’

भर्ती के अपेक्षाकृत ढीले मानदंडों की बदौलत वो लोग भी इसमें आ सकते हैं जिन्हें पढ़ाने का शौक़ है, लेकिन इस बदलाव के लिए पढ़ाने का अनुभव न होने के कारण, पहले दिन की घबराहट एक आम बात होती है, और ये एक ऐसी चीज़ है जिसमें किसी दूसरे काम में बिताए गए वर्षों से कोई सकून नहीं मिलता.

लवीश मदन ने यूसी बर्कले से अर्थशास्त्र में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद, भारत में दो साल तक एक कॉर्पोरेट जॉब में काम किया. लेकिन इस नौकरी में उन्हें संतुष्टि नहीं मिली, और 2020 में वो एक एडटेक प्लेटफॉर्म में आ गए, जो जीमैट और कैट परीक्षाओं की तैयारी में छात्रों की सहायता करता है’.

मदन के लिए, जो स्वभाव से अंतर्मुखी थे, टीचिंग की ओर ये बदलाव बहुत सहज नहीं था. शिक्षण के अपने पहले दिन को याद करते हुए, उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘मैं सच में बहुत नर्वस था. हालांकि मुझे अपना कंप्यूटर कैमरा चलाकर अपना परिचय कराना था, लेकिन मैंने वो नहीं किया और अपने छात्रों से कह दिया, कि मेरे कैमरे में कुछ दिक़्क़त थी. मैं समझता हूं कि ये एक लग्ज़री है, जो मुझे नहीं मिल सकती थी, अगर ये एक ऑनलाइन टीचिंग प्लेटफॉर्म न होता’.

एक साल से अधिक हो गया है, लेकिन ये पता लगाना उनके लिए अभी भी एक चुनौती बना हुआ है, कि छात्र किसी सिद्धांत को समझ पाए हैं कि नहीं’.

मदन ने कहा, ‘वो अपने कैमरे बंद कर देते हैं, इसलिए मैं उन्हें देख नहीं सकता, और बहिर्मुखी छात्र तो ख़ूब बातें करते हैं, लेकिन जो अंतर्मुखी हैं वो नहीं बोलते. पढ़ाने के उस हिस्से को मैं अभी भी समझने की कोशिश कर रहा हूं’.

छात्र की समझ का अंदाज़ा लगाना एक ऐसी चीज़ है, जिसे फैकल्टी के सबसे आत्मविश्वासी और अनुभवी सदस्य भी, अकसर एक चुनौती मानते हैं.

यूनेक्स्ट के वर्धन के लिए ये अनुभव कोई चुनौती नहीं था. 35 वर्षीय बैंकर ने कहा, ‘ये काफी हद तक किसी बोर्डरूम प्रेज़ेंटेशन की तरह था. अपने पहले दिन मैंने उन्हें अपने बारे में बताया, मैंने अपने करियर में बदलाव क्यों किया, और कैसे वो भी मेरी तरह वित्तीय क्षेत्र में सफल हो सकते हैं’.

लेकिन जब उन्होंने पढ़ाना शुरू किया, तो उन्हें अकसर संदेह रहता था कि क्या उनके छात्र उन्हें समझ पा रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘जटिल सिद्धांतों को तोड़कर छात्रों के लिए सरल विचारों के रूप में पेश करना एक चुनौती था. मेरे लिए जो चीज़ आसान है, ज़रूरी नहीं कि सीखने वाले के लिए भी वो आसान हो, और मुझे इसी बात को समझना पड़ा’.

उन्हीं के विचारों का समर्थन दिव्यज्योति मिश्रा भी करते हैं, जो स्टेमरोबो में सीनियर इनोवेशन इंजीनियरिंग टीचर हैं, और जिनके पास इलेक्ट्रॉनिक्स व कम्यूनिकेशन इंजीनियरिंग में बी-टेक डिग्री है. उन्होंने बताया कि बतौर शिक्षक अपने शुरुआती वर्षों में –उन्होंने 2016 में शुरू किया था- युवा छात्रों के लिए जटिल सिद्धांतों को सरल करके समझाना, उनके लिए एक चुनौतीपूर्ण काम था.

‘मैं छोटे बच्चों को कोडिंग, रोबोटिक्स, और आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस जैसे सिद्धांत पढ़ाता हूं. हम जो मॉड्यूल तैयार करते हैं उसे छोटे बच्चों की समझ के स्तर के हिसाब से रखना पड़ता है…शुरू में ये एक चुनौती था, लेकिन अब चीज़ें काफी व्यवस्थित हो गई हैं,’ ये कहना था मिश्रा का जिनके नीचे अब 10 और लोग काम कर रहे हैं.

शायद ये समझना ज़रूरी है कि ‘टीचिंग चाहे फिज़िकल हो या ऑनलाइन, इसका सार वही रहता है और वो है पढ़ाना’,ये कहना था बायजूज़ में टीचर और वीपी प्रोडक्ट डेवलपमेंट शंकर एन कृष्णा का, जिन्हें अब इस प्लेटफॉर्म के साथ जुड़े हुए क़रीब सात साल हो गए हैं.

कृष्णा, जिनके पास नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी से लाइफ साइंसेज़ में पीएचडी है, ने कहा कि वो ‘पढ़ाने के अपने शौक़ को आगे बढ़ाने के लिए भारत वापस आ गए’. उन्होंने कहा, ‘आज, मैं बायजूज़ लर्निंग एप पर ऊंची कक्षाओं को बायोलॉजी और कैमिस्ट्री पढ़ाता हूं, और 6 से 10वें ग्रेड तक साइंस पढ़ाता हूं. चल रही महामारी शिक्षा क्षेत्र के लिए एक संक्रमण बिंदू साबित हुई है’.

‘ज़्यादा लचीलापन, बेहतर वेतन’

जहां एडटेक उद्योग में आई तेज़ी ने, ग़ैर-शिक्षण पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए करियर के नए अवसर पैदा किए हैं, वहीं उसने शिक्षकों को भी चुनने के लिए काम के ज़्यादा विकल्प दिए हैं.

दिल्ली की एक 39 वर्षीय स्कूल टीचर, दिल्ली की समृति देसाई देश भर के अलग अलग निजी स्कूलों में 15 साल तक पढ़ाने के बाद, 2020 में एडटेक प्लेटफॉर्म से जुड़ीं थीं.

देसाई ने, जो के-12 शिक्षा (किंडरगार्टन से क्लास 12 तक) के लिए काम करने वाले एक प्लेटफॉर्म से जुड़ी हैं, कहा, ‘नियमित स्कूल के शिक्षकों को भी ऑनलाइन शिक्षण पर आना पड़ा, पीपीटीज़ बनाने पड़े, और छात्रों से बातचीत के अपने तरीक़ों को बदलना पड़ा. इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न ऐसी भूमिका में आ जाऊं, जहां मुझे काम के घंटों के मामले में लचीलापन मिल जाए, और पैसा भी ज़्यादा मिल जाए. मैं सितंबर 2020 में इस एडटेक कंपनी के साथ आ गई, जिसमें फिलहाल काम कर रही हूं’.

सरदेसाई के इस बदलाव के पीछे एक मुख्य कारण है, वो लचीलापन जो प्लेटफॉर्म्स पर मिल जाता है. चूंकि उनका काम छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी कराना है, इसलिए कभी कभी वो अपना लेक्चर पहले ही तैयार कर लेती हैं, जब उनके लिए लाइव क्लास लेना संभव नहीं होता.

उन्होंने कहा कि इस काम के साथ जो वित्तीय भत्ते मिलते हैं, वो एक अतिरिक्त बोनस है.

ऊपर हवाला दिए गए एक एडटेक प्लेटफॉर्म के वरिष्ठ प्रशासनिक हेड ने कहा, ‘शिक्षकों के वेतन कुछ बातों पर निर्भर करते हैं- वो किस कंपनी के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें किस रोल में रखा गया है (पूर्ण-कालिक या अंश-कालिक), और उनकी योग्यता’.

एक दूसरे प्लेटफॉर्म के एक वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य ने दिप्रिंट को बताया, कि रोबोटिक्स और एआई जैसे ख़ास विषय पढ़ाने वाले, एक दिन में 4 लाख रुपए तक कमा सकते हैं.

इस टीचर ने कहा, ‘लेकिन वो एक बहुत सीनियर लेवल पर होता है… ऐसी मिसालें बहुत कम हैं लेकिन हैं ज़रूर. जब लोग कॉर्पोरेट नौकरियां छोड़कर इन प्लेटफॉर्म्स में आ रहे हैं, तो यक़ीनन कोई आर्थिक लाभ है जिसके लिए वो आ रहे हैं’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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