Tuesday, 5 July, 2022
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बिहार के 17 केंद्रीय विद्यालय अपनी बिल्डिंग मिलने का कर रहे हैं इंतज़ार, हज़ारों बच्चों को नसीब नहीं हुआ ‘अपना स्कूल’

इस विषय पर संसद में दी गई जानकारी के बाद से दिप्रिंट ने तीन दिनों तक बिहार के शिक्षा सचिव संजय कुमार और शिक्षा विभाग से जुड़े अन्य अधिकारियों को मेल, फ़ोन कॉल, व्हाट्सएप मैसेज समेत तमाम माध्यमों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया.

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नई दिल्ली: बिहार में 17 केंद्रीय विद्यालयों की अपनी बिल्डिंग इसलिए नहीं बन पा रही क्योंकि लंबे समय से इनके लिए ज़मीन नहीं मिल पाई है. ये जानकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक सवाल के जवाब में संसद को दी है. स्थायी बिल्डिंग नहीं होने की वजह से इन विद्यालयों के हज़ारों बच्चे बिना अपनी स्थायी इमारत के स्कूलों में पढ़ाई करने पर मजबूर हैं.

गोपालगंज से नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइडेट) के सांसद आलोक कुमार सुमन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से केंद्रीय विद्यालय की बिल्डिंग से जुड़े सवाल पूछे. उन्होंने पहले सवाल में पूछा, ‘क्या ये सच है कि गोपालगंज स्थित केंद्रीय विद्यालय समेत बहुत से केंद्रीय विद्यालय बिना अपनी बिल्डिंग के चल रहे हैं जिससे इनके छात्रों को काफ़ी परेशानी हो रही है?’

अन्य तीन सवालों में उन्होंने इसकी विस्तृत जानकारी मांगते हुए पूछा, ‘सरकार ने इस समस्या को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाए हैं या क्या कदम उठाने वाली है?’ उन्होंने ये भी पूछा कि गोपालगंज में केंद्रीय विद्यालय की अपनी बिल्डिंग के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं या उठाने वाली है?

इसके जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि बेला, हरनौत, झाझा, बक्सर, मोतिहारी और सिवान समेत 17 जगहों पर केंद्रीय विद्यालय अस्थायी बिल्डिंगों से चल रहे हैं. मंत्रालय ने कहा, ‘केंद्रीय विद्यालय के लिए स्थायी बिल्डिंग बनाना एक ऐसा काम है जो चलता रहता है.’


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नहीं मिल पा रही स्कूल के लिए ज़मीन

सांसद सुमन को दी गई जानकारी में ये भी कहा गया कि नई बिल्डिंग का बनना कई बातों पर निर्भर करता है जैसे कि माकूल ज़मीन की पहचान, ज़मीन देने वाले के द्वारा केंद्रीय विद्यालय संगठन के पक्ष में ज़मीन की लीज़ की औपचारिकता को पूरा करना, निर्माण करने वाली एजेंसी के द्वारा ड्राइंग/अनुमान पेश करना और फंड उपलब्ध होना.

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मंत्रालय ने ये भी कहा कि इनमें से जिन तीन जगहों पर केंद्रीय विद्यालय को ज़मीन मिली है वहां बिल्डिंग बनाने का काम शुरू भी हो गया है. गोपालगंज समेत बाकी की 14 जगहों पर ज़मीन को लेकर लगातर इसे देने वालों से संपर्क किया जा रहा है. हालांकि, लगातार किए जा रहे इन प्रयासों के बाद भी अन्य जगहों से ज़मीन नहीं मिल पाई है.

इस विषय पर 14 सितंबर को संसद में दी गई जानकारी के बाद से दिप्रिंट ने तीन दिनों तक बिहार के शिक्षा सचिव संजय कुमार और शिक्षा विभाग से जुड़े अन्य अधिकारियों को मेल, फ़ोन कॉल, व्हाट्सएप मैसेज समेत तमाम माध्यमों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया.

दिप्रिंट ने बिहार के शिक्षा मंत्री कृष्णानंद प्रसाद वर्मा से भी इस विषय में संपर्क करने की पूरी कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया है. बिहार के शिक्षा महकमे से किसी का भी जवाब आने की स्थिति में ये स्टोरी अपडेट की जाएगी.

केंद्रीय विद्यालय के अधिकारी ने दिप्रिंट को जानकारी दी कि एक केंद्रीय विद्यालय में औसतन 1000 से 1200 बच्चे पढ़ते हैं. ऐसे में 17 केंद्रीय विद्यालयों की अपनी बिल्डिंग नहीं होने की स्थिति में तकरबीन 15 से 20 हज़ार बच्चों को अस्थायी बिल्डिंगों से अपनी स्कूलिंग पूरी करनी पड़ रही है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के राज्य मंत्री अश्विनी चौबे के लोकसभा क्षेत्र बक्सर का सेंट्रल स्कूल 2003 से बिना अपनी बिल्डिंग के चल रहा है. यहां से 2009 में 10वीं पास करने वाले चंदन चौबे नाम के एक छात्र ने आरटीआई लगाकर स्थायी बिल्डिंग नहीं बनने की जानकारी मांगी.

अगस्त की पहली तारीख़ को दिए गए जवाब में केंद्रीय विद्यालय ने कहा, ’16/02/2015 के बक्सर के डीएम द्वारा भेजी गई एक चिट्ठी में 3.5 एकड़ ज़मीन की पहचान की गई. बिहार के सिंचाई विभाग से इसकी एनओसी के लिए अनुरोध किया गया. हालांकि, स्कूल खोलने के लिए ज़मीन की ज़रूरत से जुड़े केंद्रीय विद्यालय के प्रावधान के हिसाब से ये ज़मीन बहुत कम है.’

आरटीआई में आगे कहा गया कि केंद्रीय विद्यालय द्वारा इस ज़मीन को स्वीकार नहीं किया गया है. केंद्रीय विद्यालय पटना रीजन के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘इनमें से 2-3 को छोड़कर बाकी के स्कूलों के लिए ज़मीन राज्य सरकार को देनी है. नीतीश कुमार की सरकार ज़मीन देने में टाल-मटोल करती आई है.’

अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय विद्यालय के नियमों के अनुसार बिल्डिंग के लिए ज़मीन स्पॉन्सरिंग एजेंसी को देनी होती है. स्पॉन्सरिंग एजेंसी वो होती है जो स्कूल खोलने का अनुरोध भेजती है. इन स्कूलों के मामले में स्पॉन्सरिंग एजेंसी बिहार सरकार है. सूबे की सरकार ने या तो ज़्यादातर जगहों पर ज़मीन की पहचान ही नहीं की या जहां पहचान की है वहां या तो ज़मीन कम है या इसका रज़िस्ट्रेशन नहीं हो पा रहा.

अधिकारी ने ये भी कहा कि केंद्रीय विद्यालय ज़मीन नहीं ख़रीदता. स्पॉन्सरिंग एजेंसी ना सिर्फ़ ज़मीन देती है बल्कि इसका रज़िट्रेशन भी करवाती है. वहीं चंदन ने कहा, ‘मैं अकेला नहीं हूं. बक्सर समेत राज्य के ना जाने कितने छात्र हैं जिन्होंने अपने स्कूल का मुंह नहीं देखा और पास हो गए. उम्मीद है कि आने वाली नस्लों के स्कूल की अपनी बिल्डिंग होगी.’


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