Sunday, 26 June, 2022
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कैसे ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ पायलट प्रोजेक्ट से निकला अग्निपथ? 750 घंटे तक चली 254 बैठकों के बाद बनी है यह योजना

1980 के दशक से ही भारतीय सेना , विशेष रूप से थल सेना, के भीतर सैनिकों की औसत आयु को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा था लेकिन इस पर वास्तविक रूप से काम साल 2020 में उस विचार के साथ शुरू हुआ जो 2019 में पैदा हुआ था.

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नई दिल्ली: भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान को देश की सबसे अधिक सुधारवादी (रैडिकल) सैन्य भर्ती नीति – अग्निपथ- को लागू करने में 750 घंटे तक चली कुल 254 बैठकें लगीं. यह योजना शुरू में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में अपनाई जानी थी, जिसमें 100 अधिकारी और 1,000 सैनिक शामिल थे. इसे ‘टूर ऑफ़ ड्यूटी’ का नाम दिया गया था.

रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ सूत्रों ने बताया कि ‘अग्निपथ योजना’ पर न केवल विस्तृत रुप से चर्चा की गई थी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और सैन्य मामलों के विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स- डीएमए) के अतिरिक्त सचिव लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने यह भी कहा है इसे बिलकुल वापिस नहीं लिया जाएगा.

वैसे तो, 1980 के दशक से ही भारतीय सेना, विशेष रूप से थल सेना के भीतर सैनिकों की औसत आयु को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा था लेकिन इस पर वास्तविक रूप से काम साल 2020 में उस विचार के साथ शुरू हुआ जो 2019 में अंकुरित हुआ था.

यह साल 2019 की बात है जब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल एम.एम.नरवणे ने सबसे पहले सैन्य भर्ती की एक नई अवधारणा – टूर ऑफ ड्यूटी- के बारे में बात की थी.

उन्होंने तब कहा था, ‘टूर ऑफ ड्यूटी एक ऐसा विचार है जिस पर हम इस समय काम कर रहे हैं.’

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उनका तर्क था कि कई बार स्कूलों और कॉलेजों के दौरे के समय सेना के अधिकारीगण ऐसे छात्रों से मिलते हैं जो ‘यह जानने के लिए उत्सुक होते हैं कि सेना का जीवन कैसा है, हालांकि यह जरूरी नहीं कि वे इसमें पूरा कैरियर बिताना चाहते हों.’

तब उन्होंने कहा था, ‘यही वह चीज है जिससे इस तरह विचार का पैदा हुआ था. क्या हम अपने युवाओं को थोड़े समय के लिए यह अनुभव करने का अवसर दे सकते हैं कि सेना का जीवन कैसा होता है? हम इसे इसी पृष्ठभूमि के साथ देख रहे हैं. क्या हम 6-9 महीने की संक्षिप्त प्रशिक्षण अवधि के साथ तीन साल के लिए 1,000 लोगों को सेना में शामिल कर सकते हैं…?’


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पहले यह योजना सिर्फ अधिकारियों के लिए थी

पहले-पहल इस योजना को सिर्फ अधिकारियों की भर्ती के लिए सोचा गया था क्योंकि सेना को लगा था कि वह  अधिकारियों की उस कमी को पूरा करने में सक्षम होगी जिसका वह फिलहाल सामना कर रही है. साथ ही, इस अस्थायी रूप से होने वाली भर्ती का मतलब यह था कि नियमित रूप से शामिल किए गए अधिकारियों के लिए पदोन्नति की मौजूदा पिरामिडनुमा संरचना को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी.

रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों के अनुसार, थल सेना इसी विचार के साथ आगे बढ़ी और उसने एक पायलट प्रोजेक्ट के लिए पूरी तरह से इन-हाउस कॉन्सेप्ट पेपर (अंदरूनी रूप से तैयार किया गया परिकल्पना प्रपत्र) तैयार किया.

जहां थल सेना प्रमुख इस विचार के साथ पूरी तरह से खड़े थे, वहीं तत्कालीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत इसके विरोध में थे. उन्होंने कहा था, ‘एक साल के प्रशिक्षण में (काफी) खर्च होता है…उसे (एक सैनिक को) पूरी तरह से लैस करना और उसके लिए सब कुछ करना और फिर चार साल बाद उसे खो देना, क्या यह किसी तरह का संतुलन बनाने जा रहा है? इसके लिए एक अध्ययन की आवश्यकता होगी.’

हालांकि, सीडीएस रावत शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी), जिसके जरिए अधिकारियों की भर्ती की जाती है और अधिक आकर्षक बनाने के पक्ष में थे.

सूत्रों ने आगे कहा कि शुरू में जनरल रावत ने इस तरह के विचार का विरोध किया था मगर बाद में उन्होंने इसे अधिकारी पद से बदलकर ‘अधिकारी रैंक से नीचे के कर्मियों (पर्सनेल बिलो ऑफीसर रैंक- पीबीओआर)’ की भर्ती में बदल दिया था.

यह मुख्य रूप से इस बात को ध्यान में रखते हुए किया गया था कि सेना का पेंशन बिल बढ़ रहा था और इससे समग्र रक्षा बजट में कटौती हो रही थी.

एक सूत्र ने बताया, ‘शुरुआत में, यह एक प्रायोगिक अध्ययन (पायलट स्टडी) था जिसमें 100 अधिकारी और 1,000 जवान शामिल थे. मगर, फिर जनरल रावत ने इसे पीबीओआर के लिए सेना में प्रवेश का एकमात्र स्रोत बनाने के अवसर के रूप में देखा. जो न केवल लंबे अंतराल में पेंशन की लागत को कम करेगा बल्कि सेना की ‘एज प्रोफाइल’ को भी नीचे लाएगा.’

फिलहाल जहां भारतीय सैनिकों की वर्तमान औसत आयु 32 वर्ष है, वहीं सेना को अग्निपथ योजना के माध्यम से इसे कम करके 26 वर्ष तक लाने की उम्मीद है.

एक दूसरे सूत्र ने कहा,’शुरुआत में, टूर ऑफ ड्यूटी एक तरह के पर्यटन की तरह अधिक था जहां लोग एक खास अवधि के लिए आते हैं, सेना के जीवन का अनुभव प्राप्त करते हैं और फिर वापस चले जाते हैं. मगर अग्निपथ योजना के तहत यह और अधिक गंभीर हो गया और इसने मौजूदा भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया.’

यह 1989 की बात है जब इंडिया टुडे पत्रिका की रिपोर्ट के बाद सेना की बढ़ती औसत आयु (ओल्डर एज प्रोफाइल) का मुद्दा पहली बार लोगों के ध्यान में आया था. इस खबर के अनुसार असली समस्या 1963-67 के बीच भर्ती के लिए मची होड़ थी.

पत्रिका में लिखा गया था, ‘इस अस्थाई वृद्धि को आगे भी कायम रखा गया क्योंकि सरकार ने 1965 से पहले की अवधि में जवानों की सेवानिवृत्ति की अवधि सात साल से बढ़ाकर 17 कर दी थी. इसके परिणामस्वरूप न केवल अधिक आयु के जवानों का अनुपात बढ़ गया है, बल्कि हर साल सेवानिवृत्त होने वाले सैनिकों की संख्या भी 1980 के दशक में अचानक बढ़ गई थी, जिससे पेंशन का बोझ काफी बढ़ गया है.’

इसके बाद सेना के अधिकारियों ने पहली बार 1985 में पेश किए गए एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया था – इस प्रस्ताव के अनुसार लड़ाकू इकाइयों (कॉम्बैट यूनिट) में भर्ती होने वाले लोग सात साल, मोटे तौर पर 25 साल की उम्र तक, तक काम करेंगे और तकनीकी तथा कुशलता की आवश्यकता वाली नौकरियों (टेक्निकल एंड स्किल्ड जॉब्स) के लिए भर्ती किए गए लोग 55 साल की आयु तक काम करेंगे. सात साल का कार्यकाल पूरा करने वाले लड़ाकों में से लगभग आधे को अर्ध-कुशल तकनीकी ग्रेड में ड्राइवरों और रेडियो-ऑपरेटरों के रूप में पुन: समाहित कर लिया जाएगा.

‘कई स्तरों पर परामर्श किया गया था’

साल 2019 में शुरू हुई इस प्रक्रिया के बारे में बताते हुए लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने कहा कि अग्निपथ योजना पर सशस्त्र बलों और सरकार के भीतर विभिन्न स्तरों पर विस्तृत चर्चा हुई थी.

उन्होंने बताया कि तीनों सशस्त्र बलों के भीतर 150 बैठकें हुईं जो कुल 500 घंटे की थीं. इसके अलावा, रक्षा मंत्रालय द्वारा 60 और बैठकें की गईं, जिसमें कुल 150 घंटे लगे. इसके अलावा 100 घंटे तक चलीं ऐसी 44 बैठकें भी थीं जो संपूर्ण सरकारी ढांचे के तहत हुईं.

रक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों का कहना है कि इस पूरी नीति पर कई स्तरों पर विस्तार से चर्चा की गई और कई मसलों को सुलझाया भी गया है. उन्होंने बताया कि एनएसए अजीत डोभाल और लेफ्टिनेंट जनरल पुरी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अग्निपथ योजना को कतई वापस नहीं लिया जाएगा. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ, इस योजना में सशस्त्र बलों की आवश्यकता के आधार पर कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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