Wednesday, 1 February, 2023
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‘6,500 किलो लेकर 750 किमी पार’- Indian Army ने LAC पर सेवा देने के लिए खच्चर को पुरस्कृत किया

75वें सेना दिवस पर, यांग्स्ते में LAC के पास 'दुर्गम' क्षेत्रों में सेवा के लिए एक पहाड़ों पर पाए खच्चर - हूफ नंबर -122 - को COAS प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया.

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नई दिल्ली: भारतीय सेना ने तवांग सेक्टर में यांग्त्से जैसे क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास अपनी सेवा के लिए एक पूर्वी कमान इकाई के खच्चर को सेनाध्यक्ष (सीओएएस) प्रशस्ति पत्र प्रदान किया है, जो तवांग सेक्टर के यांग्त्से जैसे क्षेत्रों का संघर्ष स्थल है. जहां पिछले महीने भारतीय सेना और चीनी पीएलए सैनिकों के बीच भिड़ंत हुई थी.

75वें सेना दिवस समारोह के रूप में, थल सेना प्रशस्ति पत्र रिमाउंट नंबर 4K-509 और यूनिट हूफ नंबर-122 मुले (माउंटेन आर्टिलरी) को प्रदान किया गया है, जो सेना के अनुसार, ‘बेहद थका देने वाली और दुर्गम परिस्थितियों का सामना किया था.’

ऐसा करने में, खच्चर तवांग सेक्टर में 15,000 फीट से ऊपर की ऊंचाई पर इलाकों और गश्त बिंदुओं को पार करते हुए गोला-बारूद और आवश्यक राशन ले जाने वाले पशु परिवहन काफिले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था.

उद्धरण में कहा गया है कि, ‘खच्चर की शारीरिक बनावट और उसके शांत स्वभाव ने दुर्गम परिस्थिति में शून्य दुर्घटना के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. भारी बारिश और फिसलन वाली ट्रैक की स्थिति के बावजूद, खच्चर ने जबरदस्त शारीरिक मजबूती, निश्चितता का प्रदर्शन किया और भार उठाते हुए अपने काम के लिए हमेशा तैयार रहा, उल्लेखनीय रूप से कठिन कार्यों में योगदान भी दिया.’

छह वर्षीय खच्चर, हूफ नंबर -122, ने 750 किलोमीटर की दूरी लगभग 6,500 किलोग्राम के भार के साथ तय की, जो एक ‘अनुकरणीय कदम’ और ‘सर्वोच्च समर्पण’ को दर्शाता है. विपरीत परिस्थति में उसके काम की सराहना करते हुए थलसेना अध्यक्ष प्रशस्ति पत्र प्रदान किया है.

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पुरस्कार की घोषणा गजराज कोर द्वारा भी की गई, जिसे फोर कॉर्प्स के रूप में भी जाना जाता है, सेना का यह संगठन असम और पश्चिमी अरुणाचल प्रदेश को कवर करता है.

कोर ने पुरस्कार के बारे में ट्वीट किया, ‘पशु परिवहन इकाइयों के खच्चर दूरस्थ क्षेत्रों में सबसे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में रसद श्रृंखला (एसआईसी) में एक महत्वपूर्ण कड़ी रहे हैं.’


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भारतीय सेना में खच्चर

भारतीय सेना में, खच्चर आम तौर पर उनकी सेवानिवृत्ति तक लगभग 10-15 साल तक काम करते हैं, जिसके बाद उन्हें उत्तराखंड के हेमपुर में स्थित रिमाउंट ट्रेनिंग स्कूल और डिपो में ले जाया जाता है, जो सेना में काम कर चुके अन्य प्रकार के घोड़ों के लिए बनाया गया रिटायरमेंट होम भी है. दूसरी ओर, सेवानिवृत्त सेना के कुत्ते, उत्तर प्रदेश के मेरठ में आरवीसी केंद्र में अपने अंतिम दिन बिताते हैं.

2022 में एक सेवा घोड़े की हाल ही में एक उल्लेखनीय सेवानिवृत्ति, राष्ट्रपति के अंगरक्षक कमांडेंट के काले घोड़े विराट की थी, जो पिछले साल गणतंत्र दिवस परेड में सेवानिवृत्त हुए थे और उन्हें पहले 2022 सेना दिवस की पूर्व संध्या पर सीओएएस प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया था.

एक और प्रसिद्ध कहानी पेडोंगी, हूफ नंबर-15328 की है, जो स्पेनिश नस्ल की एक मादा खच्चर है, जो 1960 के दशक की शुरुआत से 1980 के दशक के अंत तक सेना के लिए सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली खच्चर होने के कारण सैन्य किंवदंती का विषय थी, जिसमें 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भी शामिल है. इसने अंततः गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह बनाई.

सेना में सेवा करने वाले जानवरों के लिए रिटायरमेंट के बाद घर की व्यवस्था 2016 की शुरुआत में घोषित किया गया था.
सेना में करीब 10,000 घोड़े और खच्चर की जरूरत होती है जिसमें से हर साल करीब 300 रिटायर होते हैं. हालांकि, 2016 के अंत में प्रस्तुत शेखतकर समिति की 99 सिफारिशों में ‘आपूर्ति और परिवहन सोपानकों और पशु परिवहन इकाइयों का बेहतर उपयोग’ भी शामिल था. इस रिपोर्ट में, सेना ने 2030 तक पशु इकाइयों की कुल संख्या को 70 प्रतिशत तक कम करने की योजना बनाई है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)

(संपादन: अलमिना खातून)


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