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Wednesday, 17 July, 2024
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‘यादों की बारात’- जिसने हिंदी सिनेमा में मसाला फिल्मों के दौर की शुरुआत की

भरपूर एक्शन और बेहतरीन संगीत वाली इस फिल्म ने जीनत अमान को स्टार बना दिया.

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हिंदी सिनेमा के लगभग 100 सालों के सफ़र में ऐसी कई फिल्में आयीं जो कालजयी बन गयीं. न सिर्फ रिलीज़ होने के वक़्त, बल्कि उसके बाद भी ऐसी फिल्मों ने दर्शकों के दिल में अपनी जगह बनाये रखी. ऐसी ही फिल्मों में से एक है 1973 में आई फिल्म यादों की बारात. एक्शन, ड्रामा और आर डी बर्मन के बेहतरीन संगीत से लबरेज़ ये फिल्म हिंदी सिनेमा की पहली मसाला फिल्म के तौर पर याद की जाती है.

नसीर हुसैन द्वारा निर्मित, निर्देशित और आंशिक रूप से लिखी ये फिल्म खोने-बिछड़ने वाले मशहूर प्लाट का बखूबी इस्तेमाल करती है. तीन भाई शंकर (धर्मेन्द्र ), विजय (विजय अरोड़ा) और रतन (तारिक खान) बचपन में बिछड़ गए थे जब स्मग्ग्लर शाकाल ने उनके माँ-बाप को गोली मार दी थी.

तीनों लड़के अलग अलग हालातों में पलते- बढ़ते हैं, लेकिन लगातार एक दूसरे की और अपने माँ-बाप के हत्यारे की खोज में हैं. तीनों के पास एक दूसरे की पहचान करने के लिए सिर्फ एक सूत्र है- उनके माँ-बाप द्वारा सिखाया हुआ गीत ‘यादों की बारात’. ज़िन्दगी में शाकाल को ढूंढते वक़्त कई बार उनके रास्ते मिलते हैं, पर वे एक दूसरे को पहचान नहीं पाते. कहानी में रोचक मोड़ तब आता है जब शाकाल शंकर को अपने साथ काम करने के लिए रख लेता है, जो उसकी बर्बादी का कारण बनता है.

इस फिल्म में वो सब कुछ है जो एक क्लासिक बॉलीवुड फिल्म में होना चाहिए- बिछड़े हुए भाई, चोरी, हत्या, प्यार -मुहब्बत भरे गाने, एक विलेन और कोई लॉजिक नहीं. बेशक इसीलिए ये एक मसाला फिल्म कही जाती है. पर ये फिल्म मजेदार ज़रूर है. फिल्म की शुरुआत होती है एक गाने से और फिर दिखाई जाती हैं दोहरी हत्याएं. फिर आपको रूबरू करवाया जाता है अलग- अलग रंग बिरंगे किरदारों से. हालाँकि ये फिल्म मोटे तौर पर अनुमान लगाने लायक है, फिर भी अंत तक का सफ़र रोचक है- फैट शेमिंग, पुरुष-प्रधान मानसिकता और ओछापन होने के बावजूद (जोकि उस ज़माने में काफी आम था).

अनोखी होने के अलावा ये फिल्म जीनत अमान के करिअर के लिए एक मील का पत्थर साबित हुई. इस से ठीक दो साल पहले उन्होंने ‘हरे कृष्णा हरे राम’ फिल्म की थी जिसमें अपने बोल्ड किरदार के ज़रिये वो काफी चर्चित हुईं थीं, और उन्होंने सिनेमा में महिलाओं को दिखाए जाने की कवायद से कुछ हटके किरदार निभाया था. यादों की बारात के बाद ये साबित हुआ की वो यहाँ टिकने वाली हैं. फिल्म में उनके द्वारा निभाया हुआ सुनीता का किरदार एक जिद्दी, अमीर और बिगडैल लड़की का है- जो सिर्फ प्रेमिका की भूमिका में है- पर फिर भी फिल्म का एक अहम हिस्सा है.

इस फिल्म की ख़ास बातों में से एक इसका संगीत भी है. आर डी बर्मन का संगीत, मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे और आशा भोसले, मुहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार द्वारा गाये गए गीत यादगार हैं. चाहे वो ‘चुरा लिया’ हो, ‘लेकर हम दीवानी दिल’ या ‘मेरी सोनी मेरी तमन्ना’ हो, हर गाने ने दशकों बाद भी लोगों के दिलों में अपनी जगह बनायीं हुई है.

इस फिल्म को तेलुगु, तमिल और मलयालम में भी बनाया गया. इसी फिल्म ने भारतीय सिनेमा में बिना लॉजिक वाली मसाला फिल्मों के फॉर्मेट को लोकप्रिय कर दिया, जिसका स्वरुप हम आज भी कई फिल्मों में देखते हैं. इस हफ्ते ज़ीनत अमान का जन्मदिन है, और उनको याद करते हुए ये फिल्म आप देख सकते हैं.

(इस फीचर लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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