भांग डॉक्टर
मुझे लगता है कि हर कोई जो भांग या गांजा पीता है, ख़ुद के भांग डॉक्टर या गांजा डॉक्टर होने का दावा करता है. वे सभी कहते हैं कि भांग और गांजे में औषधीय गुण होते हैं और उन्हें हज़ारों वर्षों से दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. वे कहते हैं कि आयुर्वेद इसकी पुष्टि करता है (जो सच है). मुझे यक़ीन नहीं है कि उनमें से किसी ने कभी भांग और गांजे से सम्बन्धित कुछ भी पढ़ा है—चाहे वह किसी वेद में हो या मेडिकल जर्नल में—लेकिन इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. वे इन चमत्कारी दवाओं के बारे में बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करते रहते हैं.
मैंने भी ऐसा ही किया था जब मुझे भांग और गांजे की लत थी. वे लगभग हर बीमारी का इलाज हैं, मैं कहा करता, और उनका कोई दुष्प्रभाव नहीं है. मुझे लगता है कि मैंने अपनी लत को सही ठहराने के लिए ऐसा किया. कई अन्य लोग भी इसी कारण से ऐसा करते हैं.
बहुत से लोग, जिन्हें मैं जानता हूं और जो नियमित रूप से भांग पीने वाले हैं, वे मानते हैं कि यदि आप सेक्स से पहले थोड़ी-सी भांग पीते हैं तो आप लम्बे समय तक टिके रहते हैं और अपने साथी को ज़्यादा आनन्द दे सकते हैं. मुझे याद नहीं है कि मेरे साथ ऐसा हुआ है या नहीं. मुझे शायद ही कभी पता चला कि मैंने कब गांजा पिया था और कब भांग पी थी. वैसे भी मैं ज़्यादातर भंड होकर बहुत दूर चला जाता था.
एक महिला मित्र ने मुझे हाल ही में बताया कि वह दिन-भर की कड़ी मेहनत के बाद आराम महसूस करने के लिए हर दिन एक ज्वाइंट फूंकती है. मैंने पूछा कि क्या वह भी इसके औषधीय गुणों में विश्वास करती है, और उसने जवाब दिया कि वह करती है. उसने कहा,‘इस बारे में यूट्यूब पर हज़ारों लेख और वीडियो हैं.’
मुझे हज़ारों के बारे में तो पता नहीं है, लेकिन इंटरनेट पर आप एक बार खोजेंगे तो विश्राम और नींद के लिए भांग-गांजे से बने तेल और गोलियां बेचने वाली सैकड़ों साइटें खुल जाएंगी. इंटरनेट या आपके आसपास मौजूद लगभग हर आयुर्वेदिक चिकित्सक आपको बताएगा कि शास्त्रों और पुराणों में भांग के असीम औषधीय गुणों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है. क्या वास्तव में ऐसा है? क्योंकि अगर वास्तव में ऐसा होता, तो रामायण में हनुमान अत्यंत दुर्लभ संजीवनी जड़ी-बूटी के लिए महासागरों-महाद्वीपों और लगभग आधी दुनिया में क्यों उड़े—जिसे वे पहचान नहीं सके और इसलिए एक पूरे पहाड़ को उखाड़ लाए?
या, यह हो सकता है कि संजीवनी जड़ी-बूटी वास्तव में हिमालय में उगने वाले भांग के पौधे की कोई विशेष किस्म ही हो?
ख़ैर, कम से कम ओडिशा में यह आम धारणा है कि भांग एक चमत्कारिक दवा है. कई लोग—और न केवल वे जो इसका सेवन करते हैं—भांग-गांजे को भी देवताओं का वरदान और देवताओं के लिए एक उपहार मानते हैं. शायद यही कारण है कि ओडिशा में सरकारी भांग की दुकानों पर लोगों को यह बताने के लिए नोटिस नहीं लगाया जाता है कि भांग का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, या इससे मनोवैज्ञानिक समस्याएं हो सकती हैं. शराब की प्रत्येक बोतल और सिगरेट के हर पैकेट पर, इन उत्पादों के उपभोग के ख़तरों के बारे में अक्सर बीमारी और मृत्यु की ग्राफ़िक छवियों के साथ लिखित चेतावनियाँ
होती हैं. लेकिन, भांग के पैकेटों पर आपको ऐसी कोई चेतावनी नहीं मिलती है.
मेरे विचार से, यह अच्छी और समझदारी की बात है.
ओडिशा के हर शहर और गाँव में आपको एक कबिराज मिल जाएगा. शब्दकोश के मुताबिक कबिराज ‘पूर्वी भारतीय उपमहाद्वीप में एक व्यावसायिक वर्ग’ है. मैंने एक शब्दकोश देखा तो पाया कि ‘पुराने दिनों में, पारम्परिक रूप से आयुर्वेद का अभ्यास करने वाले लोगों को आमतौर पर पूर्वी भारत में कबी या कोबी (कवि) कहा जाता था.’
ओडिशा के कबिराज भांग के स्वास्थ्य लाभों में बहुत विश्वास रखते हैं और उनके बहुत अनुयायी भी हैं. वे सर्दी और खांसी से लेकर कैंसर तक सब कुछ ठीक करने का दावा करते हैं और कई लोग चिकित्सा सलाह के लिए उनके पास जाते हैं. उनमें रसूखदार और ताक़तवर लोग भी शामिल हैं.
राज्य के सबसे पुराने राजनेताओं में से एक ने कई अवसरों पर टेलीविज़न पर घोषणा की है कि भांग पीने में कुछ भी ग़लत नहीं है; वास्तव में, इससे उन्हें बहुत फ़ायदा होता है. उदाहरण के लिए, यह उनकी आंतों को साफ़ करने में कमाल का काम करता है. वह कहते हैं कि रात में एक गिलास लस्सी कुछ भांग, बेल, पके केले और पनीर के साथ लें, और गन्दगी सुबह एक लम्बी, मोटी, सुन्दर लच्छेदार टुकड़े में चिकनी होकर आसानी से निकलती है. रिपोर्टर उनके मज़ाक़िया इंटरव्यू पर हंसते हैं और लोग उन्हें भांग दादा कहते हैं.
ओडिशा में कई आयुर्वेदिक क्लीनिक हैं जो भांग और गांजे को दवा के रूप में सुझाते हैं. मैंने कुछ लोगों को फ़ोन करने और उनसे मिलने का फ़ैसला किया, ताकि ज़रूरी हो तो पुस्तक के लिए उनका साक्षात्कार कर सकूं.
मैंने जिस पहले आयुर्वेदिक डॉक्टर को फ़ोन किया, उसने मुझे यह बताने से इनकार कर दिया कि उसने किस बीमारी के उपचार के लिए भांग का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि मुझे अपना शोध ख़ुद करना चाहिए, सभी शास्त्रों को पढ़ना चाहिए, यह पता लगाने के लिए कि भांग और गांजे में औषधीय गुण हैं या नहीं. उन्हें कोई सन्देह नहीं था कि उनमें ये गुण हैं, लेकिन वह मुझे कैमरे पर या फ़ोन पर भी साक्षात्कार देने के लिए सहमत नहीं हुए.
इसी तरह दूसरी जगहों के दौरे से अलग-अलग परिणाम मिले : भुवनेश्वर के एक क्लिनिक में मुझे बताया गया कि भांग में वास्तव में औषधीय गुण होते हैं, लेकिन मुझे विवरण के लिए गूगल पर खोज करनी चाहिए.
एक क्लिनिक में प्रवेश द्वार के बाहर विभिन्न देवताओं की दस या 15 तस्वीरें लगी थीं. अन्दर, एक महिला पूजा कर रही थी और एक छोटी-सी घंटी बजा रही थी. मैंने उसकी पूजा ख़त्म होने का इन्तज़ार किया, फिर उससे पूछा कि क्या कोई डॉक्टर है जिससे मैं आयुर्वेदिक दवाओं के बारे में बात कर सकता हूं. उसने जवाब दिया कि वे अब दवाएं नहीं देते हैं, केवल आरामदेह आयुर्वेदिक मालिश करते हैं और मुझे उसका उपयोग करना चाहिए. जब मैंने पूछा कि क्या वह भांग और गांजे को दवा के रूप में इस्तेमाल किये जाने के बारे में कुछ जानती हैं, तो उन्होंने कहा कि मुझे हर दिन कम से कम कुछ मिनटों के लिए किसी भी भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए और इससे मुझे आराम महसूस करने और रात को अच्छी नींद लेने में मदद मिलेगी.
एक दूसरी महिला आयुर्वेदिक डॉक्टर को अच्छी नींद के लिए भांग की सिफ़ारिश करने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई. वह ख़ुद इसके लिए थोड़ी भांग लेती हैं. बस थोड़ी-सी, हर शाम. शास्त्रों ने भांग के बारे में बहुत अच्छी बातें कही हैं, मुझे उनका अध्ययन करना चाहिए, लेकिन भांग को सीधे दवा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता; इसके सभी हानिकारक प्रभावों को दूर करने के लिए इसे शुद्ध करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि भांग पारम्परिक चिकित्सा में एक महत्त्वपूर्ण घटक था, और पारम्परिक चिकित्सा ने लाखों लोगों को सभी प्रकार की बीमारियों से मुक्त किया है.
एक और आयुर्वेदिक क्लिनिक को फ़ोन करने पर, मुझे फ़ोन पर एक गम्भीर आवाज़ वाली बूढ़ी महिला मिलीं. उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिता वैद्य थे और उनकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने उनका नेक काम जारी रखा है. उनका परिवार 70 से अधिक वर्षों से आयुर्वेदिक चिकित्सा का काम कर रहा है. मैंने उनसे भांग के बारे में पूछा. उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा,‘इसमें कई अच्छे गुण हैं.’.
‘भांग का उपयोग अच्छी नींद के लिए निद्रोदय-रस बनाने और रक्त को शुद्ध करने के लिए भी किया जाता है. हम इसका उपयोग नहीं करते हैं, लेकिन इसका उपयोग कई अच्छे लोगों द्वारा किया जाता है और कई आयुर्वेदिक चिकित्सा पुस्तकों में इसके उपयोग का उल्लेख है, इससे दवा बनाने के सूत्र दिये गए हैं.’ मैंने पूछा कि क्या मैं अधिक जानकारी के लिए उनसे मिल सकता हूँ, इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘इस विषय पर कई किताबें हैं, आपको उन्हें पढ़ना चाहिए. वे सभी बाज़ार में या ऑनलाइन उपलब्ध हैं.’
एक और वैद्य को मैंने फ़ोन किया और उन्होंने बताया कि उनके क्लिनिक का एक लम्बा इतिहास है, ‘इसे 1872 में मेरे परदादा के पिता ने शुरू किया था, हमने उनकी विरासत को जारी रखा है. कई शास्त्रों में भांग और गांजे के औषधीय गुणों का उल्लेख है. जड़ी-बूटी को शुद्ध किया जाता है और दवाओं में उपयोग करने से पहले न्यूरोटॉक्सिन को बाहर निकाला जाता है, लेकिन आप देखते हैं कि बहुत से लोग इसका सीधे उपयोग करते हैं और इसके आदी हो जाते हैं, वे इसे नशे के रूप में इस्तेमाल करते हैं, दवा के रूप में नहीं. यह ग़लत है.’ उन्होंने मुझे उन सभी बीमारियों की एक सूची भेजने का वादा किया जो भांग से ठीक हो सकती हैं, और विभिन्न दवाएं बनाने के बारे में विवरण साझा करने का भी वादा किया. मैंने कई दिनों तक इन्तज़ार किया, लेकिन उनकी तरफ़ से कुछ नहीं आया.
भांग के उपचारात्मक गुणों में व्यापक विश्वास के बावजूद, 2019 में, ओडिशा सरकार ने फार्मास्युटिकल उद्योग की ओर से आए भांग की खेती के प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया. सरकार ने कहा कि इससे लोगों को नुक़सान हो सकता है. राज्य में अब तक भांग-गांजे की खेती एक अवैध गतिविधि बनी हुई है.
10 मई, 2023 को, एक धार्मिक निकाय द्वारा दायर याचिका के बाद, ओड़िया भाषा, साहित्य और संस्कृति विभाग ने सभी ज़िला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को शिव मन्दिरों में गांजे के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ‘आवश्यक क़दम उठाने’ का निर्देश दिया. एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘राज्य के सभी शैव मन्दिरों में गांजे के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाया जाएगा.’
क्या भगवान शिव इसकी अनुमति देंगे?
मेरे ऑनलाइन शोध के दौरान, मुझे कई दिलचस्प साइटें मिलीं जो कैनाबिस (भांग) के ज़िम्मेदार उपयोग का समर्थन करती हैं. Hempcann.in हमें बताता है :
भांग एक प्राचीन पौधा है और पिछले 2,500 वर्षों से मनुष्यों द्वारा इसका उपयोग किया जा रहा है. आयुर्वेद में, भांग को विजया कहा जाता है, जिसका अर्थ है विजेता. यह शरीर के एंडोकैनाबिनोइड सिस्टम (ईसीएस), प्रतिरक्षा प्रणाली को नियमित बनाती है और हमें मनोवैज्ञानिक तौर पर स्वस्थ रखती है.
यह फ़ार्माकोलॉजी में सबसे बहुमुखी पौधा है…और भांग के पौधे का अर्क, कई बीमारियों के प्रबन्धन में उपयोगी होता है, जैसे—कैंसर, मतली और एनोरेक्सिया, मधुमेह, अनियमित आंत्र सिंड्रोम, हृदय रोग, चिन्ता और अवसाद, दर्द प्रबन्धन, तंत्रिका सम्बन्धी विकार, न्यूरो-डीजेनेरेटिव रोगों, ग्लूकोमा, पीटीएसडी, ओसीडी, सोरायसिस और अन्य त्वचा विकार, अस्थमा, क्रॉनिक किडनी रोग, ऑटो इम्यून डिसॉर्डर, दस्त, माइग्रेन, ड्रग डी एडिक्शन, प्रजनन विकार, तनाव, अनिद्रा …आदि के लिए यह काफ़ी फ़ायदेमन्द है.
भांग के बीज रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करते हैं…ओमेगा फ़ैटी एसिड की उपस्थिति के कारण यह बालों और त्वचा के लिए बहुत अच्छा है. इसके एंटी-ऑक्सीडेंट गुण हमारी त्वचा को जीवन्त बनाते हैं.
मुझे नहीं पता कि यह कितना सच है, लेकिन मेरे शोध ने मुझे ऑनलाइन कुछ विद्वानों के लेखों तक पहुँचाया, जिनमें इसी तरह की बातें कही गई थीं. मैं श्री सी. द्वारकानाथ, सलाहकार, स्वदेशी चिकित्सा प्रणाली, भारत सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय, नई दिल्ली के 1 जनवरी, 1965 के एक लेख के अंश नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ :
परिचय
अफ़ीम और भांग को आयुर्वेद और यूनानी तिब्बी चिकित्सा प्रणालियों द्वारा दस शताब्दियों से अधिक समय से चिकित्सीय एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया गया है. यह सिद्ध करने के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि इन दवाओं को आठवीं शताब्दी ईस्वी से पहले आयुर्वेद द्वारा मान्यता दी गई थी, हालांकि, कात्यायन द्वारा ‘पाणिनी’ के ‘वर्तिका’ और ‘अष्टाध्यायी’ के दिये एक सन्दर्भ से पता चलता है कि भांग भारत में ईसा पूर्व चौथी और तीसरी शताब्दी की शुरुआत से जानी जाती थी. इस दवा के चिकित्सकीय उपयोग का किसी भी समकालीन कार्य में सन्दर्भ नहीं दिया गया है. सुश्रुत (सर्जन, लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) ने कहा कि दर्द के प्रति संवेदनहीन बनाने के लिए शल्य चिकित्सा से पहले सुरा (शराब) का उपयोग किया जाना चाहिए. चिकित्सक चरक ने किसी मादक पेय, जैसे, सुरा, सिद्धू, अरिष्ट, मधु, मदिरा या आसव—को गर्भवती महिला के शरीर से मृत भ्रूण निकालने के बाद, उसे दर्द सहने के लिए देना निर्धारित किया है. इनके कार्यों में भांग या अफ़ीम के एनाल्जेसिक के रूप में उपयोग करने का कोई सन्दर्भ नहीं है. इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भले ही भांग की जानकारी तत्कालीन दौर में भी थी, लेकिन उस समय के सर्जनों और चिकित्सकों द्वारा इसे चिकित्सीय एजेंट के रूप में मान्यता नहीं दी गई थी. वेदों, पुराणों और प्रारम्भिक आयुर्वेदिक चिकित्सा के ग्रन्थों जैसे ‘चरक संहिता’ (तीसरी से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व), ‘सुश्रुत संहिता’ (पांचवीं से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व), वाग्भट्ट (पांचवीं शताब्दी ईस्वी) की जुड़वां कृतियों अर्थात, ‘अष्टांग हृदय’ और ‘अष्टांग समाग्रह’ में अफ़ीम के सन्दर्भ उपलब्ध नहीं हैं.
