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संविधान के निर्माण में इन महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई/ फाइल फोटो
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नई दिल्ली: देश को संविधान मिले हुए 69 साल हो चुके हैं 26 जनवरी को 70 साल में प्रवेश कर जाएगा. इस दौरान देश में काफी कुछ बदल चुका है. इस दौरान महिला प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी मिली, वहीं देश ने अपने सर्वोच्च स्थान राष्ट्रपति के रूप में भी प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को भी बिठाया. आज देश की रक्षा और सुरक्षा दोनों की कमान महिला के हाथों में हैं. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बखूबी इसे चला भी रही हैं.

गणतंत्र दिवस के अवसर पर बात करते हैं उन महिलाओं की जिनके बारे में बहुत कम चर्चा होती है. ये वो महिलाएं जिन्होंने देश के संविधान में अहम योगदान दिया.  भारतीय संविधान के जनक और पिता भले ही बीआर आंबेडकर रहे हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान के निर्माण 284 लोग शामिल थे जिसमें 15 प्रगतिशील महिलाएं भी थीं.

भारत का इतिहास गवाह है कि महिलाओं को सर्वोच्च स्थान दिया जाता रहा है. चाहें वह भगवान राम का काल हो या हमारी परंपराएं. बिना महिला के पूरी नहीं होती थीं. आज जब महिलाएं सबरीमाला जैसे मंदिरों में प्रवेश के लिए बड़ी लड़ाई लड़ रही हैं उसी देश में महिलाओं ने संविधान के निर्माण के दौरान अपने अधिकारों की बात ज़ोर-शोर से उठाई थी. और फिर संविधान निर्माण के दौरान देशभर की विभिन्न अभियानों से जुड़ी महिलाओं को एकत्रित किया गया और उनसे महिला अधिकार पर बात की गई.

इन महिलाओं में सरोजनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, अम्मू स्वामीनाथन, सुचेता कृपलाणी का नाम तो काफी प्रसिद्ध रहा है लेकिन इनके अलावा कई और महिलाएं भी हैं जिन्होंने संविधान निर्माण से लेकर समाज निर्माण तक में अहम भूमिका निभाई है. आज हम आपको उन महिलाओं के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई.

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महिलाओं के लिए संविधान लिखे जाने के दौरान आवाज उठाने वाली अम्मू स्वामीनाथन/ सोशल मीडिया

अम्मू स्वामीनाथन – देश में जब संसद का निर्माण हो रहा था तब वह पहली संसद का हिस्सा थीं.  अम्मू 1952 में लोक सभा के लिए चुनी गईं थी जबकि 1954 में राज्यसभा की सांसद बनी थीं. जब 24 नवंबर 1949 में  बी आर आंबेडकर संविधान के बारे में अपनी बात रख रहे थे तब आत्मविश्वास से लबरेज अम्मू ने कहा था- भारत के बारे में दुनिया वालों का कहना है कि भारत  में महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया है लेकिन अब हम कह सकते हैं कि भारतीयों ने अपना संविधान खुद बनाया है और दूसरे देशों की तरह अपने देश में भी महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया है. बचपन से ही वे महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव के प्रति उग्र थी, उन्होंने 1917 में महिलाओं के साथ मिलकर एक वुमन इंडिया एसोसिएशन का निर्माण कर लिया था, उनके साथ एनि बेसेंट भी जुड़ी थीं.

सरोजिनी नायडु – पहली भारतीय महिला हैं जिन्हें भारतीय नेशनल कांग्रेस की अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त है. भारत की नाइटिंगेल नाम से लोकप्रिय सरोजनी नायडु एक प्रगतिशील महिला थीं. उन्होंने लंदन के किंग्स कॉलेज से पढ़ाई की थी तथा महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थीं और उनके कई आंदोलनों से जुड़ी भी रही थीं.

सरोजनी नायडु की संविधान लिखे जाने में अहम भूमिका रही है/ विकीपीडिया

वैसे तो संविधान लिखे जाने के दौरान आंबेडकर ने उन महिलाओं का चयन किया था जो महिलाओं, गरीबों और मज़दूर वर्ग के लिए आवाज़ उठाती रही हैं. उनमें से एक थी सुचेता कृपलाणी. सुचेता कृपलाणी ने महिलाओं के लिए राजनीति में नई तरह के आयाम खोले. वह देश की पहली महिला हैं जो न केवल सांसद रहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं.  सुचेता ने 1942 भारत छोड़ो आंदोलन में अहम किरदार निभाया. उन्होंने कांग्रेस में 1940 में विमेन विंग की स्थापना की.  सुचेता के बाद नाम आता है विजयलक्ष्मी पंडित का. विजयलक्ष्मी पंडित भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं. वह आज़ादी के दौरान 1932-1933, 1940 और 1942-43 में तीन बार जेल भी गईं. उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए काफी काम किया और पहली महिला कैबिनेट मंत्री भी बनी. और 1953 में पहली यूएन जनरल एसेंबली में शामिल होने वाली पहली एशियन महिला का खिताब मिला.

संविधान निर्माण में कुछ ऐसी महिलाएं भी शामिल रही हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अहम योगदान निभाया, अंग्रेज़ों के आगे डटी रहीं, कई-कई बार जेल गईं और गरीबों- मज़दूरों की भी आवाज़ बनीं. ऐसी ही थीं  लैटिन कैथोलिक फैमिली में पैदा हुई एनी मसकारेने. वह पहली महिला हैं जिन्होंने ट्रेवणकोर स्टेट कांग्रेस को ज्वाइन किया. आज़ादी की लड़ाई में वो कई-कई बार जेल भी गईं.  एनी भारत की  पहली महिला हैं जिन्होंने लोकसभा में महिलाओं की स्थिति को दर्ज कराया. वह न केवल चुनाव लड़ीं बल्कि जीतीं भीं.  केरल से पहली सांसद बनने का गौरव भी एनी को ही जाता है. वह दस वर्षों तक सांसद रहीं. वह एक साल या यूं कहें कि 1949 से 1950 तक कुछ महीनों के लिए स्वास्थ भी मंत्री रहीं.

दबे कुचले वर्ग की आवाज़ उठाने के कारण दक्क्षयानी वेल्याधन को आंबेडकर ने संविधान के निर्माण के दौरान विशेष स्थान दिया था. वेल्याधन का जन्म 1912 में कोचीन के बोलगट्टी  में हुआ था. वह पुलाया समुदाय से आती थीं वह अपने समुदाय की पहली महिला थीं जो पढ़ी लिखी थीं और आधुनिक कपड़े पहना करती थीं. 1945 में  दक्क्षयानी कोचीन लेजिसलेटिव काउंसिल के लिए नामित की गईं. वह पहली और अकेली दलित महिला थीं जो 1946 में कंस्टीट्यूट एसेंबली का चयन किया गया था. संविधान के निर्माण के दौरान दक्क्षयानी ने दलितों से जुड़ी कई समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया था.

मालेरकोट्ला आज़ाद भारत के संविधान सभा में शामिल होने वाली पहली भारतीय मुस्लिम महिला थीं. 1935 में मालेरकोट्ला ने मुस्लिम लीग ज्वाइन किया था लेकिन देश के बंटवारे के बाद उन्होंने अपने पति एजाज़ के साथ 1950 में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता हासिल की.  संविधान निर्माण के दौरान ऐजाज़ ने कई मुद्दों पर अपनी बात अंबेडकर को बताई जिसे संविधान में शामिल भी किया गया. 1969-71 में वह सोशल वेलफेयर और अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री भी रहीं. सन 2000 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया.

दुर्गा बाई का जन्म 1909 में राजामूंद्री में हुआ था. महज 12 साल की उम्र में उन्होंने नॉन को-ऑपरेशन मूवमेंट में भाग लिया साथ ही उन्होंने  1930 में बापू के नमक सत्याग्रह आंदोलन में भी भाग लिया था. 1936 में उन्होंने आंध्र महिला सभा का निर्माण किया था. उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मामलों में संविधान में अहम बातें जुड़वाई. वह शिक्षा और महिला से जुड़ी कई संस्थाओं से जुड़ी और उसकी अध्यक्षता भी की. उन्हें 1975 में पद्म विभूषण से भी नवाज़ा गया.

हंसा बड़ौदा के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मीं और इंगलैंड से पत्रकारिता और समाजशास्त्र की पढ़ाई की. वह देश की जानीमानी शिक्षाविद और लेखिका हैं. उन्होंने बच्चों के लिए गुजराती में कई किताबें लिखीं, इंगलिश में गुलिवर ट्रैवल्स भी लिखी है. हंसा ने हैदराबाद में आयोजित ऑल इंडिया  वुमेन कांफ्रेस के अपने प्रेसिडेंशियल एड्रेस में महिला के अधिकारों की बात की. महिला अधिकारों की बात उन्होंने संविधान के निर्माण में कही जिसे प्रमुखता से सुना गया और संविधान में फेरबदल भी किया गया.

कमला को अपनी पढ़ाई लिखाई के लिए काफी स्ट्रगल करना पड़ा था. उन्होंने क्रांति घर से ही शुरू की थी और 1930 में ही वो गांधी जी से जुड़ी और उनके सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ी. वह एक फिक्शन लेखिका थीं और महिलाओं के अधिकारों पर खुल कर अपनी बात रखती थीं. ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के 54 वें सेशन में वो उपाध्यक्ष बनीं और 70 के आखिरी दशकों में लोकसभा तक भी पहुंची.

लीला रॉय महिला अधिकारों के लिए शुरू से ही आवाज़ बुलंद करती रहीं. गांधी जी के साथ कई आंदोलनों में जुड़ने के बाद 1937 में  उन्होंने कांग्रेस पार्टी में शामिल हुईं. लीला रॉय ने सुभाषचंद्र बोस की महिला सब-कमीटी की सदस्य रहीं जब 1940 में सुभाष चंद्र बोस जेल गए तब वह फॉरवार्ड ब्लॉक वीकली की संपादक भी बनीं. देश छोड़ने से पहले नेताजी ने पार्टी का सारा कार्यभार लीला रॉय और अपनी पत्नी को सौंप दिया था. संविधान निर्माण में उन्होंने महिला के अधिकारों की बात जमकर उठाया, उनके महत्व को भुलाया नहीं जा सकता है.

गरीबों की मसीहा कही जानी वाली मालती महात्मा गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन सहित कई आंदोलनों से जुड़ी रहीं. 1933 में उन्होंने उत्कल कांग्रेस समाजवादी करमी संघ का निर्माण किया. 1934 में उन्होंने गांधी की पदयात्रा में उनके साथ जुड़ी. कमज़ोर समुदायों के विकास के लिए उन्होंने न केवल आवाज़ बुलंद की बल्कि उनकी आवाज़ भी बनीं.  उन्होंने संविधान निर्माण के दौरान गरीबों की आवाज़ को भी रखा.

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पूर्णिमा बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इलाहाबाद में सचिव बनीं और महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करती रहीं. 1930-40 में देश के आज़ादी से जुड़े कई आंदोलन का हिस्सा बनीं. अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन और सत्याग्रह आंदोलन के कारण जेल भी गईं. संविधान सभा में पूर्णिमा बनर्जी के एक समाजवादी विचारधारा के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता दिखाई दी थी.

राजकुमारी अमृत कौर देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री हैं, वह इस पद पर दस वर्षों तक रहीं.  इंगलैंड में पढ़ीलिखीं अमृत 16 वर्षों तक महात्मा गांधी की सेक्रेटरी के तौर पर काम किया. वह अमृत ही हैं जिन्होंने ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट की संस्थापक भी हैं.  उनका महिला शिक्षा, खेल और स्वास्थ्य विषयों पर बराबर का अधिकार था. उन्होंने देश में ट्यूबरकुलोसिस एसोसिएशन, सेंट्रल लेप्रेसी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट का भी गठन किया. कपूरथला महाराजा के बेटे हरनाम सिंह की बेटी थीं. संविधान निर्माण के दौरान स्वास्थ्य सेक्टर से जुड़े अहम सुझावों पर उन्होंने अपनी बात रखी थी जिसपर अमल भी किया गया.

रेणुका रॉय ने 1934 में लीगल डिसेबिलीटी ऑफ वुमेन इन इंडिया का गठन किया था. उन्होंने महिला के अधिकारों के लिए कई लड़ाइयां लड़ी और संविधान में महिलाओं की बात रखने में अहम योगदान दिया. उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए बात करते हुए कहा था कि पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति अन्यायपूर्ण है.


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