साहित्यकार कमलेश्वर. (फोटो साभार: pustak.org)
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कुछ दिनों पहले मैं अवसाद और निराशा के दौर से गुजर रहा था. अपने आप को कमरे में बन्द कर लिया था. न किसी से बात करना अच्छा लगता था और न ही कुछ करने का मन करता था. बाहरी दुनिया काटने को दौड़ती थी. इसी बीच मेरी नजर एक किताब पर पड़ी. पिछले साल के पुस्तक मेले में खरीदा था. पहला पन्ना खोला तो लिखा था.

इन बंद कमरों में मेरी सांस घुट जाती है

खिड़किया खोलता हूं तो जहरीली हवा आती है.

ऐसा लगा जैसे लेखक ने मेरे मन की बात सुन ली हो. मैनें पढ़ना शुरू किया. जैसे-जैसे पढ़ता गया. मूड बदलने लगा. शुरू करने से पहले मेरा मन जो संज्ञाशून्य था, वह इस उपन्यास के साथ ही शून्य से शिखर तक पहुंच रहा था. किताब का नाम था. ‘कितने पाकिस्तान’. लिखने वाले थे कमलेश. लेखक से काफी प्रभावित हुआ. बीच में ही उठ कर लेखक के बारे में पढ़ डाला.

जीवन दर्शन

कमलेश्वर 6 जनवरी को 1932 में यूपी के मैनपुरी में पैदा हुए थे. वही मैनपुरी जो यूपी के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार (मुलायम सिंह यादव) का गढ़ माना जाता है. 1954 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमए कर लिए. कहानियां और कॉलम लिखे. टीवी के लिए कश्मीर के आतंकवाद और बाबरी मस्जिद विवाद पर कई फिल्में भी बनाईं. पत्रकारिता भी की. देश के सामाजिक हालात ने जब उनके मन को कचोटा तो वे शालिनी अग्निकांड पर ‘जलता सवाल’ और कानपुर की बहनों के आत्महत्याकांड पर ‘बंद फाइल’ जैसे धारावाहिक भी बनाने से खुद को रोक नहीं पाए. दूरदर्शन पर हर रविवार को आने वाला सुप्रसिद्ध कार्यक्रम ‘चंद्रकांता’ भी इन्हीं के कलम से निकली टीवी की सबसे लोकप्रिय रचना थी. ‘युग’, ‘विराट’ और ‘बेताल’ जैसे लंबे और 90 के दशक में लोगों को स्वस्थ मनोरंजन देने वाले धारावाहिकों का लेखन भी कमलेश्वर ने ही किया था.

‘नई कहानी’ आंदोलन के पैरोकार

हिंदी साहित्य के लगभग 150 साल के इतिहास में तीन लेखकों ने इसकी दिशा और दशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. चाहे कमलेश्वर की ‘राजा निंबरसिया’ रही हो, राजेंद्र यादव की ‘प्रेत बोलते’ हैं. या फिर मोहन राकेश का ‘अषाढ़ का एक दिन’. इन तीनों की लेखनी ने हिंदी साहित्य की अविरल धारा को समृद्ध बनाने में भरपूर कोशिश की. इसमें सबसे अहम योगदान कमलेश्वर का रहा. राजेंद्र यादव शुरू में उत्कृष्ट लेख देने के बाद अपना ध्यान उपन्यास और पुस्तक के व्यवसाय पर केंद्रित कर लिया. उनकी रचनाओं को लेकर कुछ विवाद भी हुए. मोहन राकेश ने अच्छी कहानियां जरूर गढ़ी, लेकिन जब वे अपने चरम पर थे तो असमय काल के कपाल ने उन्हें गले लगा लिया. हालांकि, बाद में मोहन राकेश कहानियों से इतर नाटक मंचन में अपने आप को खपाने लगे थे.

ऐसे में कमलेश्वर ही थे, जिन्होंने शुरू से अंत तक अपनी संयमित विविधता और सृजनशीलता को बनाए रखा. राजेंद्र यादव हंस पत्रिका में लिखते हैं, ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रारंभिक पैरोकारों में सबसे अधिक जुझारू व्यक्तित्व कमलेश्वर का था. हालांकि मुझे, मोहन राकेश और कमलेश्वर- तीनों को नई कहानी आंदोलन के नेतृत्व करने वालों के रूप में देखा-जाना जाता है, पर नई कहानी आंदोलन को हिंदी साहित्य में स्थापित करने में कमलेश्वर की भूमिका अहम थी. स्थापित साहित्यकारों की ओर से सबसे अधिक हमले उन पर ही हुए और आगे बढ़कर हमले का जवाब भी उन्होंने ही दिया.’

दिल का काम, मन की बात की  

भारतीय समाज और राजनीति पर अपने मन के द्वंद का इजहार कहानियां गढ़ने से इतर जाकर वे सार्वजनिक इजहार करते थे. ये कमलेश्वर ही थे, जिन्होने हिंदी साहित्य में रचनात्मकता लाने के लिए ‘नई कहानी’ जैसा आंदोलन चलाया फिर 1972 में उसी हिंदी साहित्य के पतन को देखते हुए समांतर कहानी आंदोलन की शुरुआत भी की. सारिका पत्रिका द्वारा चलाए इस आंदोलन से पहली बार दलित लेखन ने साहित्य में अपनी जगह बनाना शुरू की. कमलेश्वर ने नए लेखकों को प्रोत्साहन देने और उनके संघर्षों को जगह देने के लिए ‘गर्दिश के दिन’ नामक एक कॉलम भी शुरू किया था. अपने मन की करने वाले कमलेश्वर आपातकाल के उस भयानक दौर में भी इंदिरा गांधी से लोहा लेने से नहीं चूके. उस समय इंदिरा का फरमान था कि छपने से पहले वे अपनी पत्रिकाओं और लेखों को सरकार को दिखाएं. कमलेश्वर को दूरदर्शन का महानिदेशक बनाने की प्रकिया चल रही थी. उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया बाकी थी. उन्होंने उस दौर में भी काली कहानी जैसी कहानी लिखते हुए आपातकाल का जमकर विरोध किया. जब यह बात इंदिरा गांधी को पता चली तो ये उनका बड़प्पन कह लें या फिर कमलेश्वर की स्पष्टवादिता का प्रभाव, गांधी ने केवल इतना कहा कि वे कमलेश्वर को दूरदर्शन के खिलाफ भी ऐसा ही मुखर देखना चाहेंगी.

‘कितने पाकिस्तान’

अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी लिखने वाले कमलेश्वर की यह आखिरी उपन्यास था. लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया. इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 2000 में प्रकाशित यह अब तक उपन्यास 17 संस्करणों में प्रकाशित हुआ. अपने नौवें संस्करण की भूमिका में कमलेश्वर लिखते हैं, ‘मैं अपने पाठकों का बहुत आभारी हूं. यह नवम संस्करण मैं भारत के उन पाठकों को समर्पित करता हूं, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है. ’2003 में अपनी इस सर्वश्रेष्ठ कृति के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले कमलेश्वर ने इस उपन्यास में मानव सभ्यता को कई वर्गों में बांटने वाली प्रवृत्तियों की परख की है. इस उद्देश्य से कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद एक दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परंपरा अब समाप्त हो. कमलेश्वर कितने पाकिस्तान में लिखते हैं, ‘मेरी दो मजबूरियां भी इसके लेखन से जुड़ी हैं. एक तो यह कि कोई नायक या महानायक सामने नहीं था, इसलिए मुझे समय को ही नायक-महानायक और खलनायक बनाना पड़ा. और दूसरी मजबूरी यह है कि इसे लिखते समय लगातार यह एहसास बना रहा कि जैसे यह मेरी पहली रचना हो. लगभग उसी अनकही बेचैनी और अपनी असमर्थता के बोध से मैं गुजरता रहा. आखिर इस उपन्यास को कहीं तो रुकना था. रुक गया. पर मन की जिरह अभी भी जारी है.’

300 से अधिक कहानियां और 13 उपन्यास लिखने वाले इस मानवीय लेखक का इस दुनिया से चला जाना देश में कट्टरता और असहिष्णुता के खिलाफ संघर्षों के लिए एक झटका है. अब ये देखना होगा कि नई पीढ़ी के लेखकों में कौन उनके समकक्ष खड़ा होने की हिमाकत करता है.

 

 


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