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जयपाल सिंह मुंडा | यूट्यूब
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अनुसूचित जाति के उत्थान के लिए जो योगदान डॉ बाबा साहेब अंबेडकर का रहा है, वही योगदान आदिवासियों के लिए महान दूरदर्शी और विद्वान नेता, सामाजिक न्याय के आरंभिक पक्षधरों में से एक, संविधान सभा के सदस्य और हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा का रहा है.

आदिवासी या अनुसूचित जनजाति इस देश का एक प्रमुख सामाजिक समूह है, जिनकी आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल आबादी की 8.6 फीसदी यानी 10 करोड़ से ज्यादा है. ऐसे विशाल जनसमुदाय के सबसे प्रमुख नेता और प्रतीक के बारे में आम भारतीयों में छाया अज्ञान बेहद दुखद है.

पिछले दिनों जयपाल सिंह मुंडा के जीवन पर एक किताब चर्चित लेखक संतोष किड़ो ने लिखी है- द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जयपाल सिंह मुंडा. इसका लोकार्पण रांची में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने किया था. इसके बाद, बहुत से लोगों को जयपाल सिंह मुंडा के अद्भुत और संघर्ष भरे व्यक्तित्व के बारे में नए सिरे से जानने का मौका मिला.

1928 के एमस्टर्डम ओलंपिक खेलों में भारत को पहली बार हॉकी का स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा ही थे. ये अलग बात है कि उनके व्यक्तित्व और योगदान खिलाड़ी के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी इतना ही महान है.

उनकी शैक्षणिक विद्वता का एक प्रमाण यह भी है कि उन्होंने जिस साल भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया, उसी साल उन्होंने आईसीएस की परीक्षा भी पास करके दिखाई थी.

जयपाल सिंह मुंडा के बहुआयामी व्यक्तित्व को मोटे तौर पर तीन क्षेत्रों में बांटकर देखा जा सकता है:

1. बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी

2. शैक्षणिक रूप से बेहद विद्वान, अच्छे लेखक, कुशल वक्ता और दूरदर्शी विचारक

3. अत्यंत प्रभावी हस्तक्षेप वाले राजनेता

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म रांची जिले के पास उसी खूंटी जिले में हुआ था, जिसमें आदिवासियों के भगवान माने जाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था. जयपाल सिंह का जन्म बिरसा मुंडा की मृत्यु के तीन साल बाद, 3 जनवरी, 1903 को तपकरा गांव में हुआ था.

जयपाल सिंह मुंडा ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और उसी दौरान हॉकी की अपनी प्रतिभा दिखाकर लोगों को चमत्कृत करना शुरू कर दिया था. इसी कारण उन्हें भारतीय हॉकी टीम की ओलंपिक में कप्तानी सौंपी गई थी.

यहां यह बात भी बतानी जरूरी है कि हॉकी टीम में चयन के बदले उन्हें आईसीएस छोड़नी पड़ गई थी. बाद में हालांकि, उनकी प्रोबेशन अवधि बढ़ाकर उन्हें फिर से आईसीएस में शामिल होने का मौका दिया गया था, लेकिन इस प्रस्ताव को उन्होंने अपना अपमान मानकर ठुकरा दिया था.

बाद में, ईसाई मिशनरियों ने उन्हें भारत में धार्मिक प्रचार के काम में लगाना चाहा, लेकिन जयपाल सिंह ने आदिवासियों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया.

मरंग गोमके यानी ग्रेट लीडर के नाम से लोकप्रिय हुए जयपाल सिंह मुंडा ने 1938-39 में अखिल भारतीय आदिवासी महासभा का गठन करके आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई लड़ने का निश्चय किया.

मध्य-पूर्वी भारत में आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए उन्होंने अलग आदिवासी राज्य बनाने की मांग की. उनके प्रस्तावित राज्य में वर्तमान झारखंड, उड़ीसा का उत्तरी भाग, छत्तीसगढ़ और बंगाल के कुछ हिस्से शामिल थे.

अलग आदिवासी राज्य की उनकी मांग पूरी नहीं हुई, जिसका नतीजा यह रहा कि इन इलाकों में शोषण के खिलाफ नक्सलवाद जैसी समस्याएं पैदा हुईं, जो आज तक देश के लिए परेशानी बनी हुई हैं.

हालांकि, करीब साठ साल बाद वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के निर्माण के साथ उनकी मांग आंशिक रूप से पूरी हुई, लेकिन तब तक आदवासियों की संख्या राज्य में घटकर करीब 26 फीसदी बची, जबकि 1951 में ये आबादी 51 फीसदी हुआ करती थी.

एक तरह से यह माना जा सकता है कि जयपाल सिंह ने आकलन कर लिया था कि भविष्य में आधुनिकता और कथित विकास की आंधी आदिवासियों को ही सबसे ज्यादा उजाड़ने जा रही है.

इसी खतरे को भांपकर, वे पहले से उनकी सुरक्षा का इंतजाम करना चाहते थे. चूंकि उनके प्रयास उनकी अपेक्षा के अनुरूप कामयाब नहीं रहे, इसीलिए, मौजूदा दौर में आदिवासियों को अब तक के सबसे कठिन दिन देखने पड़ रहे हैं.

जयपाल सिंह मुंडा आदिवासियों के लिए सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे. संविधान सभा के लिए जब वे बिहार प्रांत से निर्वाचित हुए तो उन्होंने आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए कड़े प्रयास किए.

अगस्त 1947 में जब अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों पर पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो उसमें केवल अनुसूचित जाति के लिए ही विशेष प्रावधान किए गए थे. इसका एक कारण यह भी था कि अनुसूचित जातियों के अधिकारों के लिए डॉ अंबेडकर बहुत ताकतवर नेता बन चुके थे.

अनुसूचित जातियों की स्थिति सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी थी, जिसका लाभ अनुसूचित जातियों को तो मिलता दिख रहा था, और अब भी कुछ मायनों में मिलता है, और ये कोई गलत बात भी नहीं है, लेकिन आदिवासियों के अधिकारों को अनदेखा किया जा रहा था.

अब भी स्थिति में बहुत फर्क नहीं आया है. अनुसूचित जातियों पर अत्याचार अब भी जारी हैं, लेकिन इन घटनाओं का राजनीति पर असर जरूर पड़ जाता है. आदिवासियों के ऊपर हो रहे अत्याचार अब भी सामाजिक और राजनीति विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाते. जयपाल सिंह मुंडा का प्रयास इसी स्थिति को बदलने का था.

जब संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के संरक्षण के प्रावधान होने लगे, और लगा कि आदिवासी पीछे छूट जाएंगे, तब जयपाल सिंह मुंडा ने कड़े तेवर दिखाए और संविधान सभा में ज़ोरदार भाषण दिया:

“आज़ादी की इस लड़ाई में हम सबको एक साथ चलना चाहिए. पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे आदिवासी ही हैं. उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया, लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए.”

जयपाल सिंह के सशक्त हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा को आदिवासियों के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ा. इसका नतीजा यह निकला कि 400 आदिवासी समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया.

उस समय इनकी आबादी करीब 7 फीसदी आंकी गई थी. इस लिहाज से उनके लिए नौकरियों और लोकसभा-विधानसभाओं में उनके लिए 7.5% आरक्षण सुनिश्चित किया जा सका.

इसके बाद आदिवासी हितों की रक्षा के लिए जयपाल सिंह मुंडा ने 1950 में झारखंड पार्टी का गठन किया. 1952 में झारखंड पार्टी को अच्छी सफलता मिली थी. उसके 3 सांसद और बिहार विधानसभा में 34 विधायक जीते थे.

स्वयं जयपाल सिंह लगातार 3 बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे थे. 1963 में उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया था. बाद में झारखंड के नाम पर बनी तमाम पार्टियां उन्हीं के विचारों से प्रेरित हुईं.

जयपाल सिंह की सोच बहुत व्यापक थी. उनकी सोच के दायरे में झारखंड और आसपास के राज्यों के आदिवासी ही नहीं थे, पूर्वोत्तर के आदिवासियों की भी उन्हें चिंता थी.

पूर्वोत्तर के आदिवासियों में फैले असंतोष को उस समय भी जयपाल सिंह मुंडा ने पहचान लिया था. नागा आंदोलन के जनक जापू पिजो को भी उन्होंने झारखंड की ही तर्ज पर अलग राज्य की मांग के लिए मनाने की कोशिश की थी, लेकिन पिजो सहमत नहीं हुए. इसी का नतीजा ये रहा कि आज तक नागालैंड उपद्रवग्रस्त इलाका बना हुआ है.

जयपाल सिंह मुंडा के ही कारण जनजातियों को संविधान में कुछ विशिष्ट अधिकार मिल सके. हालांकि, व्यवहार में उनका शोषण अब भी जारी है. खासकर, भारतीय जनता पार्टी के शासन में उन पर अत्याचार बढ़े हैं.

इन राज्यों में किसी भी आदिवासी को नक्सली बताकर गोली से उड़ा दिए जाने की परंपरा स्थापित हो चुकी है. यह दुखद स्थिति खत्म करने के लिए एक बार फिर से जयपाल सिंह मुंडा की विचारधारा का अनुसरण किए जाने की जरूरत है.

पूरे जीवन आदिवासी हितों के लिए लड़ते-लड़ते 20 मार्च 1970 को जयपाल सिंह मुंडा का निधन हो गया. दुर्भाग्य की बात है कि उसके बाद उन्हें विस्मृत कर दिया गया.

यह दुख की बात है कि आज जब दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों को इतिहास के पन्नों से खोजकर निकालकर नया इतिहास लिखने की शुरुआत हो चुकी है, जबकि आदिवासियों के सबसे बड़े हितैषी जयपाल सिंह मुंडा को नई पीढ़ी के लोग जानते तक नहीं हैं.

जब छोटे-छोटे राजनीतिक हितों के लिए लड़ने वाले राजनेताओं और धन के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों तक को भारत रत्न से सम्मानित किया जा रहा है, ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा जैसे बहुआयामी व्यक्ति के लिए भारत रत्न देने पर सत्ता के गलियारों में विचार तक नहीं किया जा रहा है.

हालांकि, पिछले कुछ सालों से, सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाले लोगों में जयपाल सिंह मुंडा के योगदान के बारे में नई चेतना फैली है. उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी ये लोग उठाने लगे हैं.

यह आशा भी की जा सकती है कि केंद्र में अनुकूल सरकार बनने और सही परिस्थितियों के बीच, अगर सामाजिक न्याय की पक्षधर मानी जाने वाली पार्टियां एकजुट होकर मांग करें, तो जयपाल सिंह मुंडा को भारत रत्न का मरणोपरांत सम्मान दिलाया जा सकता है.


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