Saturday, 25 June, 2022
होमसमाज-संस्कृतिहरियाणा में निर्भया फंड से चलाए जा रहे वन स्टॉप सेंटर बन गए हैं हैरेसमेंट सेंटर

हरियाणा में निर्भया फंड से चलाए जा रहे वन स्टॉप सेंटर बन गए हैं हैरेसमेंट सेंटर

जिस प्रताड़ना से निजात दिलाने के लिए इन केंद्रों को खोला गया था अब ये केंद्र उसी प्रताड़ना का हिस्सा बनकर रह गए हैं.

Text Size:

नारनौल/करनाल/गुरुग्राम: कुरुक्षेत्र की रहने वाली 23 वर्षीय सपना किसी और से नहीं बल्कि अपने ही माता-पिता से घरेलू हिंसा परेशान थी. इसलिए उसने करनाल पुलिस को एक दिन फोन कर दिया. सपना ने हिंसा की शिकार हुई महिलाओं की मदद के लिए करनाल में बने सखी केंद्र (वन स्टॉप सेंटर) का नाम सुना था. पुलिस उसे लेकर थाने आ गई. सुबह 9 बजे से पुलिस थाने में बैठी सपना के पास रात के 10 बजे एक महिलाकर्मी आई और उसे 11 बजे वन स्टॉप केंद्र पर छोड़ा गया. पूरे दिन वो अकेली पुरुष कर्मियों के बीच डरी सहमी बैठी रही. अगले दिन जब दिप्रिंट से सपना की बात हुई तो उन्होंने बताया, ’13 घंटे तक मुझे पुलिस स्टेशन रखने के बाद यहां वन स्टॉप केंद्र लाया गया है. पुरुषकर्मी ही समझा बुझाकर घर जाने को कह रहे थे.’

दो दिन बीत जाने के बाद भी ना ही पीड़िता की कोई साइको-सोशल काउंसलिंग हुई थी और ना ही उन्हें कोई कानूनी मदद दी गई थी. खुद पुलिस ही पीड़ित महिला और उसके परिवार के बीच समझौता करवाने वाली बन गई. इसके बाद पुलिस उन्हें यहां से ले गई.

ये हाल है 1000 करोड़ रुपए के निर्भया फंड से चलाई जा रही वन स्टॉप सेंटर स्कीम का. हिंसा या तस्करी में फंसी महिलाओं को संरक्षण देने के लिए चलाई गई इस स्कीम को 18 करोड़ रुपए के सालाना बजट के साथ 2015 में शुरू किया गया था.

हालांकि गोविंदपुर पुलिस महिला थाना, करनाल की इंस्पेक्टर कविता ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा, ‘हम एक बार सखी केंद्र छोड़ने के बाद दखल नहीं देते हैं. हां अगर रात को कोई शराब पी हुई महिला मिलती है तभी हम उसका मेडिकल कराते हैं. हम कोई काउंसलिंग नहीं करते हैं.’

फिलहाल देश में ऐसे 234 वन स्टॉप केंद्र संचालन में हैं. साथ ही केंद्र सरकार 495 नए वन स्टॉप केंद्र बनाने की तैयारी में है. कुल मिलाकर देश के 719 जिलों को कवर करने का प्लान किया गया है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इन केंद्रों से अब तक करीब 1,90,000 महिलाओं को मदद मिली है. लेकिन, ज़मीनी हकीकत ये है कि मदद के नाम पर पीड़ित महिलाओं के साथ समझौते करवा कर वापस हिंसा में धकेला जा रहा है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

करनाल का वन स्टॉप केंद्र हरियाणा का पहला और देश का दूसरा ऐसा केंद्र था, जिसे 2015 में बड़े प्रचार-प्रसार के बाद शुरू किया गया था. लेकिन चार साल बाद हरियाणा के वन स्टॉप केंद्र अब हैरेसमेंट केंद्र बन गए हैं, जहां पुलिस ही नाबालिग बच्चियों की शुरुआती जांच से लेकर काउंसलिंग भी कर रही है.

करनाल में स्थित वन स्टॉप सेंटर| तस्वीर- विशेष व्यवस्था द्वारा

रेवाड़ी जिले की दो पीड़िताओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए दिप्रिंट को बताया, ‘सखी केंद्र में तो हमें बाद में ले जाया गया. उससे पहले पुलिस ने ही हमसे पूछताछ में पूछा कैसे छेड़ा, कोई सेटिंग थी क्या पहले? ये सवाल शर्मिंदगी पैदा करते हैं.’

7 वन स्टॉप केंद्रों से शुरुआत करने वाले हरियाणा का हाल

साल 2015 में हरियाणा के करनाल, भिवानी, गुरुग्राम, फरीदाबाद, हिसार, रेवाड़ी और नारनौल जिलों में वन स्टॉप केंद्र खोले गए थे. इन केंद्रों की सफलता को देखते हुए साल 2018 में खट्टर सरकार ने 15 नए ऐसे केंद्र बनाने की घोषणा की थी. लेकिन, इन केंद्रों में आने वाले केस महिलाओं के खिलाफ दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों का तीस फीसदी भी नहीं हैं.

हरियाणा सरकार के आंकड़ों के मुताबिक जून 2018 तक राज्य के सखी केंद्रों में केवल 3,186 केस ही रजिस्टर हो पाए. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों की बात करें तो साल 2016 में हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ कुल 9,839 यानि प्रतिदिन करीब 27 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे. साल 2018 में विधानसभा में खुद मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने बताया था कि सिंतबर 2017 से सितंबर 2018 तक महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10,000 मामले दर्ज हुए.

क्या होता है वन स्टॉप केंद्र

सरकारी दिशा निर्देशों के मुताबिक वन स्टॉप केंद्रों में फ्रिज, कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर, टेलिफोन, इंटरनेट, सीसीटीवी कैमरा, दवाइयां और कपड़े उपलब्ध होने चाहिए.

एक केंद्र में कम से कम 5 कमरे हों. साथ ही ये केंंद्र जिले के सरकारी अस्पताल के 2 किलोमीटर के दायरे में हो ताकि हिंसा से पीड़ित महिलाएं आसानी से पहुंच सकें. इन केंद्रों में मेडिकल सुविधा, पुलिस मदद, साइको-सोशल काउंसलिंग, कानूनी सलाह और अस्थाई तौर पर रहने की जगह व वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा भी होनी चाहिए.

जमीनी हकीकत कागजी फाइलों से विपरीत

हिसार के महिला पुलिस थाने परिसर में एक कमरे को ही वन स्टॉप केंद्र बना दिया गया है. इस केंद्र में चार-पांच बिस्तर के अलावाा दो कुर्सी और दो मेज हैं. दिशा निर्देशों के मुताबिक ये केंद्र पीड़ित महिलाओं की पहुंच में होना चाहिए, लेकिन शहर के बाहरी इलाके में बने होने की वजह से महिलाओं का यहां तक पहुंच पाना भी मुश्किल हो जाता है. कारणवश जून 2018 तक यहां मात्र 150 केस ही रजिस्टर हुए.

गुरुग्राम के वन स्टॉप केंद्र का हाल भी कुछ ऐसा ही है. सिविल अस्पताल से दो किलोमीटर दूर बने इस केंद्र की अपनी एक अलग बिल्डिंग तो है लेकिन मात्र तीन बेड ही रखे गए हैं.

हिसार के वन स्टॉप सेंटर से मदद ले चुकी घरेलू हिंसा की शिकार एक पीड़िता ने दिप्रिंट को बताया, ‘ये लोग मध्यस्थता कराने लगते हैं ताकि जल्दी ने इनका पीछा छूटे. खाने के नाम पर यहां कुछ नहीं मिलता है. एक दो दिन बाद महिला खुद ही यहां से चली जाए.’

कहीं बेड नहीं हैं तो कहीं से सीसीटीवी कैमरा ही गायब

नारनौल की सचिवालय की बिल्डिंग के दो कमरों को मिलाकर बनाया गया सखी केंद्र सीसीटीवी कैमरे से लेकर फ्रिज तक को मोहताज है. यहां की प्रशासनिक अधिकारी ने अपनी परेशानियों की लिस्ट गिनवाते हुए हुए कहती हैं, ‘मैंने साल 2017 में यहां ज्वॉइन किया था. उससे पहले ये किसी के घर में चलाया जा रहा था. सिंतबर 2018 में हमारा फंड खत्म हो गया. उसके दो महीने बाद भी मैं यहां डटी रही लेकिन धीरे-धीरे स्टाफ कम होता गया. करीब 11 महीने बाद दोबारा फंड रिलीज किया गया है तो मैं भी दोबारा काम पर आ सकी. अभी भी यहां पैरा मेडिकल ऑफिसर और पुलिस का पद खाली है.’

हाल ये है कि कॉलेज जाने वाली लड़कियों तक को इस केंद्र की जानकारी नहीं है. कम पढ़ी लिखी महिलाओं की इस केंद्र तक पहुंचना असंभव सा है. साल 2019 इस केंद्र में आई पीड़िताओं की संख्या महज 11 है.

नारनौल में स्थित वन स्टॉप केंद्र| तस्वीर- विशेष व्यवस्था द्वारा

करनाल वन स्टॉप केंद्र को छोड़कर तो बाकी वन स्टॉप केंद्र एक या दो कमरों से ही चलाए जा रहे हैं. इन केंद्रों में स्टाफ में महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या ज्यादा है. कई बार पीड़िताओं को अनजान पुरुषों की मौजूदगी में भी रात बितानी पड़ती है. कई बार हालात प्रताड़ित करने जैसे बन जाते हैं.

पीड़िताओं के अनुभव और वन स्टॉप सेंटर्स के स्टाफ के साथ हुई बातचीत के आधार पर ये बात समझ आती है कि ये केंद्र महिलाओं को महज ठहारने और मध्यस्ता के लिए रह गए हैं. जिस प्रताड़ना से निजात दिलाने के लिए इन केंद्रों को खोला गया था अब ये केंद्र उसी प्रताड़ना का हिस्सा बनकर रह गए हैं. (पीड़िता के नाम बदल दिए गए हैं)

share & View comments