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साहित्यकार ममता कालिया, मृदुला गर्ग और गीताश्री. (फोटो: फेसबुक)
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कार्यस्थल में महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ चल रहे #मीटू आंदोलन की चपेट में भारत के कई बड़े नाम आए हैं. इस आंदोलन पर हिंदी साहित्य की कुछ वरिष्ठ महिला लेखिकाओं का नज़रिया.

न​ई दिल्ली: कार्यस्थल पर महिलाओं की प्रताड़ना कोई नहीं बात नहीं है. इस मुद्दे पर भारत में कभी खुलकर बात नहीं होती थी. लोगों में साहस की कमी थी और डर ने उन्हें गूंगा बना रखा था लेकिन हाल के दिनों में #मीटू नामक आंधी आयी जिसने अर्श से फर्श तक कई लोगों को बेनकाब कर दिया है. रंगमंच, मीडिया, फिल्म जगत जैसे विभिन्न क्षेत्रों में तमाम लोग कटघरे में खड़े किए गए. इस मुद्दे पर हिंदी साहित्य जगत की महिला लेखिकाओं की राय.

#मीटू अभियान ने बढ़ाई महिलाओं की हिम्मत: मृदुला गर्ग

#MeToo आंदोलन एक सुन्दर अभियान है लोगों के साथ जो हुआ है लोग उसी बात को सामने आकर खुलकर बोल रहे है.उन्हीं बातों से प्रेरणा लेकर और लोग भी अभियान से जुड़ रहे है उनकी हिम्मत में इजाफ़ा हुआ है इसलिए इस अभियान को #MeToo नाम दिया गया है.

मगर जो पुराने गड़े मुर्दे उखड रहे हैं, जिन लड़कियों या महिलाओं ने 20-25 साल किसी आदमी के साथ काम किया और बराबर काम करती रहीं और जितना फायदा उठा सकती थी उठाया आगे बढ़ीं, स्टार बनी ,प्रमोशन लिया अब कह रही हैं कि उनका यौन उत्पीड़न हुआ है. उन्होंने तब क्यों नहीं कहा? मैं नहीं मानती की सिर्फ दो रास्ते हो सकते है – या तो प्रमोशन रुकवाओ या यौन उत्पीड़न सहो.

मैं भी लेखक रही हू. मेरी उम्र 80 साल की है मैंने भी 50 साल उन्हीं लोगों के साथ काम किया है और साथ में घूमती रही हूं जिनके ऊपर ये आरोप लगे है. मेरे साथ कभी कोई हादसा नहीं हुआ और इसलिए नहीं की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की. यहां मैं सेक्शुअल असॉल्ट की बात नहीं कर रही पर जो फबतियां कसना, प्रपोसल देने जैसी बाते होती है, मैने साफ मना किया कि ये मेरे साथ नहीं चलेगा.  हमेशा अनुशासन में रह कर काम किया. मुझे किताब कभी वापिस नहीं लेनी पड़ी. किताब छपवाने के लिए कभी भी कोई समझौता नहीं करना पड़ा.

इसका तीसरा विकल्प भी होता आप अपनी इच्छाशक्ति और दृढ़ता से समझा सकते है कि ये मेरे साथ नहीं चलेगा. एक सज्जन ने तो यहां  तक कहा कि ” शी इस ए डेंजरस वुमन” (ये बहुत खतरनाक औरत हैं).

अगर आप नयी बातों का पर्दाफाश कर रहे हैं तो आप अच्छा कर रहे हैं अगर आप पुरानी बातों पर बात कर रहे हैं तो वो सब बकवास है. यह सब पब्लिसिटी की बात है. अगर आप तीसरा विकल्प इस्तेमाल नहीं कर सकते तो ये बहुत दुख की बात है.

साहित्य जगत से कोई वक्तव्य न आना बहुत ही सुखद है. मसला ये है कि मीटू मीटू सब कर रहे है पर कोई भी व्यक्ति पूरी बात नहीं सुनना चाहता है. इसमें क्या मुद्दे है. जिनके साथ हुआ है उन्हें बतलाना चाहिए कि उनके साथ क्यों हुआ, उन्होंने क्यों होने दिया और क्यों वे चुप रहे.

#मीटू आंदोलन के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं: ममता कालिया

#मीटू अपने आप में एक अच्छा आंदोलन है क्योंकि स्त्रियों को पहली बार अपनी बात कहने का मौका मिला.  भारत में इस अभियान के ज़रिये स्त्रियों की वेदना सामने आयी है.

न जाने कब-कब लड़कियों को पार्कों में, स्कूलों में, घर की सीढ़ियों के नीचे प्रताड़ित किया गया है. उन्हें अपनी देह के लिए प्रताड़ित किया गया है . जिस देह पर उनका बस नहीं है –  जिसे भगवान ने बनाया है.

इस आंदोलन को कम मत आंकिए इसमें महिलाएं सामने आ रही है. इस अभियान ने महिलाओं को साहस दिया है.

इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं. इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि अपना पुराना हिसाब-किताब चुकता करने और बदले की भावना, ईर्ष्या से कुछ स्त्रियां निरपराध लोगों पर आरोप भी लगा रही है. जिससे बेगुनाह लोगों की छवि पर असर पड़ता है. लेकिन जो सकारात्मक बात हो रही है वो ये कि सारी दबी चीज़ें अब विस्फोट के रूप में सामने आ रही हैं.

यह आंदोलन सशक्त है. किसी भी आंदोलन में दो चार नकारात्मक धारणाएं होती हैं. हम इसको नकार नहीं सकते हैं. ऐसा सभी आंदोलनों के साथ होता है, बस कोई विवाद और अतिवाद नहीं होना चाहिए. कुछ लोग #मीटू आंदोलन को लेकर अनाप-शनाप बक रहे हैं, मखौल बना रहे हैं,  फब्तियां कस रहे हैं. आप किसी की पीड़ा का उपहास उड़ा रहे हैं तो ये गलत है, यह संवेदनहीनता है.

बेचारी लड़कियां मुंह खोलकर खुद के मौके को गवां रही हैं. कला प्रदर्शन के क्षेत्र में लड़कियों का शोषण ज़्यादा होता है. थिएटर, फिल्म की दुनिया में यौन उत्पीड़न का बोलबाला है. ये कोई पुरानी चीज़ नहीं है.  गुरु-शिष्य परंपरा में कितनी अनीतियां होती रही हैं. साहित्य के क्षेत्र के लिए हालांकि ये बहुत छोटी बात है. यहां संपादक पसंद ही नहीं करता है कि कोई भी महिला उनके दफ्तर आये. मैं 60 साल से साहित्य कि दुनिया में हूं, इसलिए यह बात कह रही हूं. साहित्य की दुनिया से कोई बड़ा ज़लज़ला सामने नहीं आएगा.

स्त्रियों के लिए सदियों की ठंडी चुप्पी का विस्फोट: गीताश्री

#मीटू आंदोलन ने उनके मुंह में जुबान दे दी है जो अब तक चुप थीं. जिनमें साहस नहीं था. हिम्मत ऐसे ही आती है, एक दूसरे को देखकर. हिम्मत से हिम्मत आती है. हिम्मत का संचार हुआ है और सालों से दबी हुई चुप्पी टूट गई. एक दिन होना ही था. स्त्रियों की दुनिया में कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर देर सबेर विस्फोट होगा. स्त्रियां मुठभेड़ करेंगी और सफल होगीं. यह आंदोलन बेहद ज़रूरी था. आने वाली पीढ़ियों के लिए ये रास्ता आसान करेगा कि कोई यौन शोषण या यौनिकता हिंसा का शिकार होने पर चुप नहीं बैठेंगी.

लोग उपहास उड़ा रहे हैं कि पहले क्यों न बोली? अब तक चुप क्यों थी? उनको भारतीय समाज की संरचना की समझ नहीं. बहुत ही तंगदिल और मूर्ख लोग हैं जो समझ नहीं पा रहे अपने समाज को. जिस समाज में स्त्री को स्त्री बना कर रखने का चलन हो…जिससे वह उन पर हक़ जमा सके, गैरबराबरी हो, बहुत सी पाबंदिया हो, वहां एक लड़की बोले कैसे? किसके दम पर? कौन साथ देता? सुरक्षा के नाम पर लड़की पर पहरे बिठाने वाला समाज या परिवार?

लोग थोड़े भयभीत तो हैं? सबसे ज़्यादा यही होता होगा #मीटू. अभी तक ख़ामोशी है. और रहेगी. एक आवाज़ नहीं निकलेगी. यहां का मामला बाकी क्षेत्रों से अलग है. मैंने हाल में जानना शुरू किया है इस क्षेत्र को. मैं बहुत दिनों से साहित्य में हूं. लेकिन जानती और पहले से हूं. भीतरी सच बहुत जानती हूं. दूध के धुले यहां नहीं बसते है. नई लड़कियों को लीलने के लिए हर क्षेत्र तैयार रहता है. ज़रा सा फेवर करने के बदले पितृसत्ता बहुत बड़ी क़ीमत वसूलना चाहती है. नयी लड़कियां आजकल बहुत बेबाक़ हैं. वो साहस करें तो सच सामने आए. पुराने लोग नहीं बोलेंगे. साहित्य में शिकंजे बहुत. दाखिल ख़ारिज का खेल बहुत है. गढ और मठ बहुत है.

यहां पर मठाधीश बहुत है. सबके अपने चेले चपाटी, चपाटियां हैं. अपने गैंग को प्रमोट करते हैं, बढ़ावा देते हैं, पुरस्कार का खेल खेलते हैं. यहां बोलने में बहुत जोखिम है. आगे का रास्ता बंद हो सकता है. साहित्य में दाख़िला देने वाले इतने खुर्रांट लोग हैं कि साहस जुटाना संभव नहीं .

महिलाओं को कम मौके

यही मेरी चिंता भी है. मैने कई मंचों से कहा है कि अब लड़कियों से लोग दूर भागेंगे या उनको संदेह से देखेंगे. संदिग्ध हो उठेंगी लड़कियां और उनके लिए रोज़गार के अवसर कम हो जाएंगे. पहले से ही लड़कियों के लिए जगह कम है. बल्कि रोज़गार घटते जा रहे. ऊंचे पदों पर लड़कियां हैं कहां? कई वजहें हैं इसके पीछे. मीटू के बाद लोग डरेंगे कम, डरने का अभिनय ज़्यादा करेंगे. पाखंड और बढ़ेगा. ख़ासकर साहसी लड़कियों से दूरी बरतेंगे और कमज़ोर टाइप लड़कियों को खोज कर रखेंगे. गूंगी गुड़ियाओं की खोज होगी. बहुत सतर्क हो गया है पुरुष समाज और कंपनियां भी. कई दफ़्तरों में लड़कियां पहले से नहीं रखी जातीं. जहां लड़कियां हैं, वहां संख्या बहुत कम. ये आंदोलन जहां साहस दे रहा है वहीं स्त्री-पुरुष के बीच अविश्वास की गहरी खाई भी खोद गया है. मुझे चिंता हो रही है.

मीटू आंदोलन पितृसत्ता के लिए मज़ाक़ का विषय है, हम स्त्रियों के लिए सदियों की ठंडी चुप्पी का विस्फोट. कौन अपनी खुशी से पुराने ज़ख़्मों को कुरेदेगा? वो भी दक़ियानूसी समाज के सामने जहां स्त्रियों का मूल्यांकन चरित्र से होता है. स्त्री बोलने से पहले जानती हैं कि अंजाम क्या होगा. समाज उसे किन निगाहों से देखेगा? फिर भी वो बोल रही तो सबके साहस को सलाम!


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