Savitribai Phule
सावित्रीबाई फुले: यूट्यूब
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सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897) भारत की प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका थीं, इस तथ्य से हम सभी वाकिफ हैं, लेकिन बहुत कम लोग हैं, जो इस तथ्य से परिचत होंगे कि वे आधुनिक भारत की पहली विद्रोही महिला कवयित्री और लेखिका थीं. उनकी कविताओं का पहला संग्रह, ‘काव्य फुले’ 1854 में प्रकाशित हुआ था. तब वे महज 23 वर्ष की थीं. इसका अर्थ है कि 19-20 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. उनका दूसरा कविता संग्रह बावनकशी सुबोध रत्नाकर नाम से 1891 में आया.

सावित्रीबाई फुले अपनी रचनाओं में एक ऐसे समाज और जीवन का सपना देखती हैं, जिसमें स्त्री-पुरुष समानता हो, किसी तरह का कोई अन्याय न हो, हर इंसान मानवीय गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करे. बेहतर समाज और सबके लिए खूबसूरत ज़िंदगी के मार्ग में उन्हें सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवादी-मनुवादी व्यवस्था और इसके द्वारा रची गई जाति-पाति और स्त्री-पुरुष के बीच भेद-भाव दिखाई देता था. उन्होंने अपनी कविताओं में सबसे ज़्यादा चोट मनुवाद, जाति-पाति के भेद और स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता पर किया है.

‘शूद्रों का दर्द’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं :

शूद्रों का दर्द
दो हज़ार वर्ष से भी पुराना है
ब्राह्मणों के षड्यंत्रों के जाल में
फंसी रही उनकी ‘सेवा’


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उनकी कविताएं साक्षी हैं कि उन्हें इस बात का गहरा अहसास था कि शूद्रों की पराधीनता, दुर्दशा और गरीबी के लिए उनकी अज्ञानता, रूढ़िवादिता और परंपराओं की बेड़ियां ज़िम्मेदार हैं. डॉ आंबेडकर शिक्षित बनो का नारा देते हैं. सावित्रीबाई फुले भी अपनी कविताओं में मनुवादी बेड़ियों को तोड़ने और शिक्षित बनने का आह्वान करती हैं. वे कहती हैं कि सदियों से शिक्षा से वंचित अज्ञानता के शिकार शूद्रों, इतिहास ने तुम्हें बड़ा अच्छा अवसर प्रदान किया है. अंग्रेज़ों ने ब्राह्मण पेशवाओं का अंत कर दिया है, जिन्होंने तुम्हारी शिक्षा पर प्रतिबंध लगा रखा था. वे कहती हैं, उठो, पेशवाओं का अंत हो चुका है. यह अच्छा अवसर है जब तुम अपनी गुलामी की परंपरा तोड़ सकते हो, लेकिन साथ ही वे इस बात के लिए भी चेताती हैं कि तुम मनुवादी शिक्षा मत लेना:

उठो, अरे अतिशूद्र तुम
यह गुलामी की परंपरा की
मनुवादी पेशवा मर-मिट चुके
खबरदार मत लेना, मनु विद्या तुम.

अंग्रेज़ों के कारण शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षा का अवसर मिला था. इस शिक्षा ने इन तबकों के लिए मुक्ति का द्वार खोला था, क्योंकि मनुवादी-ब्राह्मणवादी शिक्षा समाज के हर वर्ग को शिक्षा नहीं देती थी. अपनी एक कविता में सावित्रीबाई कहती हैं:

ज्ञानदाता अंग्रेज़ जो आए
अवसर पहले ऐसा न पाया
जागृत हो, अब उठो भाइयों
उठो, तोड़ दो परंपरा को
शिक्षा पाने उठो भाइयों

आधुनिक अंग्रेज़ी ज्ञान को सावित्रीबाई फुले माता का दर्जा देती हैं. उनकी एक कविता का शीर्षक है- ‘स्नेहमयी मां’. इसमें इसके पहले के ज्ञान को वे मूर्खों का ज्ञान कहती हैं. आधुनिक ज्ञान सत्य से अवगत करता है-

अंग्रेज़ी मां, अंग्रेज़ी मां
अंग्रेज़ी मां तोड़-मोड़े
पशुवत भावना को,
तू ही देती मनुष्यता मां,
हम जैसे शूद्र जनों को


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शूद्रों-अतिशूद्रों की गुलामी और दुर्दशा के साथ सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं में महिला की स्थिति का अत्यन्त मार्मिक वर्णन किया है. वे लिखती हैं कि महिलाएं सुबह से शाम तक खटती हैं, जबकि बहुत सारे पुरुष मुफ्तखोर की तरह बैठे रहते हैं. वे प्रकृति से उदाहरण देकर बताती हैं कि पशु-पक्षियों में भी नर-मादा मिलकर काम करते हैं, तो स्त्री-पुरुष एक साथ मिलकर काम क्यों नहीं करते. वे ऐसे निकम्मे पुरुषों को धिक्कारती हैं. ‘क्या उन्हें मनुष्य कहा जाए?’ शीर्षक कविता में उन्होंने इस स्थिति का इस प्रकार वर्णन किया है:

पौ फटने से गोधुली तक, महिला करती श्रम
पुरुष उसकी मेहनत पर जीता है, मुफ्तखोर
पक्षी और जानवर भी मिलकर काम करते हैं
क्या इन निकम्मों को मनुष्य कहा जाए?

सावित्रीबाई फुले अपनी कविताओं में इतिहास की ब्राह्मणवादी व्याख्या को चुनौती देती हैं. वे कहती हैं कि शूद्र ही इस देश के मूलनिवासी और वीर योद्धा थे और यहां के शासक थे. बाद में आक्रामणकारियों ने शूद्र शब्द को अपमानजनक बना दिया. वे ‘शूद्र शब्द का अर्थ’ कविता में लिखती हैं :

‘शूद्र’ का असली अर्थ था मूलनिवासी,
भारत किसी का नहीं है,
ना ईरानियों का, ना यूरोपियों का,
ना तातारों का और ना हूणों का,
उसकी नसों में बहता है
यहां के मूलनिवासियों का रुधिर

फातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले | फाइल

अपनी कविताओं में सावित्रीबाई फुले इतिहास और मिथकों की ब्राह्मणवादी व्याख्याओं को चुनौती देती हैं. वे ‘राजा बली की स्तुति’ शीर्षक कविता में बताती हैं कि ब्राह्मणवादी, शूद्रों-अतिशूद्रों के उदार और महान राजा बली के साथ छल करने वाले और धोखे से उनके राज्य छीन लेने वाले वामन का गुणगान करते हैं. वे अपनी कविताओं में कबीर की तरह हिंदू धर्म के ढोंग-पाखंड को भी उजागर करती हैं. ‘मन्नत’ शीर्षक कविता पढ़िए-

पत्थर को सिंदूर लगाकर
जिसे बना दिया देवता
असल में था, वह पत्थर ही

सावित्रीबाई फुले भारतीय पुनर्जागरण की कवयित्री हैं. यूरोपीय पुनर्जागरण के दार्शनिकों ने यह सवाल उठाया था कि मानवीय गरिमायुक्त जीवन किसे कहें? किस जीवन को मानवीय जीवन कहें? किसे पशुवत जीवन कहते हैं? भारत में ब्राह्मणवाद-सामंतवाद ने अधिकांश लोगों के जीवन को पशुवत जीवन बना दिया था. सावित्रीबाई फुले की कविताएं ‘इंसान कौन और कौन नहीं है’ इसका विस्तृत विमर्श प्रस्तुत करती हैं. ‘उसे इंसान कहें क्यों?’ शीर्षक कविता में कौन इंसान है, कौन नहीं? किसका जीवन इंसानी है, किसका पशुवत, इस पर प्रश्न उठाती हैं, वे कहती हैं कि जिसके पास ज्ञान नहीं है, शिक्षा नहीं है, उसका जीवन पशुवत है, लेकिन इसके साथ वे यह भी कहती हैं कि यदि कोई व्यक्ति ये दोनों चीजें प्राप्त कर लें, लेकिन उसके आधार पर अपना जीवन न जिए, तो उस व्यक्ति का भी जीवन पशुवत है-

ज्ञान नहीं, विद्या नहीं
पढ़ने-लिखने की इच्छाशक्ति नहीं,
बु्द्धि होकर उस पर चले नहीं.
ऐेसे व्यक्ति को कैसे इंसान कहें?

रविदास और कबीर की तरह सावित्रीबाई फुले भी श्रम न करने वाले व्यक्ति को इंसान मानने को तैयार नहीं थीं. वे बिना श्रम किए बैठकर खाने वाले निठल्ले व्यक्ति के जीवन की तुलना पशु से करती हैं-

जो करे न जरा श्रम
ज्योतिष पर करे भरोसा
स्वर्ग-नरक के चक्कर में दिन-रात घिरे फिरे
वैसे तो निठल्ला पशु भी न कोई
उसे भला कैसे इंसान कहें?


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फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह सावित्रीबाई के लिए भी आजादी सबसे बड़ा मूल्य थी. शूद्रों-अतिशूद्रों की ब्राह्मणशाही से आजादी. स्त्रियों की पुरुषों के वर्चस्व से आजादी. वे बार-बार अपनी कविताओं में इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि जिस व्यक्ति को गुलामी का दुःख न हो और आजादी की चाहत न हो, उस व्यक्ति को इंसान नहीं कहा जा सकता है-

जिसे न हो गुलामी का दुःख
न हो अपनी आज़ादी छिनने का मलाल
न आवे कभी समझ इंसानियत का जज्बा
उसे भला कैसे कहें इंसान हम?

सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक चेतना से लैश हैं. आज भी जहां स्त्रियां गहनों के पीछे भागती रहती हैं, उसे अपना आभूषण समझती हैं. इन आभूषणों को पहनकर सुंदर दिखना चाहती हैं. इसके उलट उनकी कविताएं स्त्री का सबसे बड़ा गहना शिक्षा मानती हैं. वे कहती हैं, स्वाभिमान की जिंदगी जीने के लिए एक लड़की के लिए शिक्षा सबसे आवश्यक चीज़ है. वे लड़कियों का आह्वान करती हैं कि पाठशाला जाओ और खूब पढ़ो-लिखो:

स्वाभिमान से जीने हेतु
बेटियों पढ़़ो-लिखो खूब पढ़ो
पाठशाला रोज़ जाकर
नित अपना ज्ञान बढ़ाओ
हर इंसान का सच्चा आभूषण शिक्षा है
हर स्त्री को शिक्षा का गहना पहनना है
पाठशाला जाओ और ज्ञान लो

आधुनिक भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का द्वार आधुनिक शिक्षा ने खोला. जोतिराव फुले, शाहूजी महराज, डॉ. आंबेडकर और पेरियार जैसी महान विभूतियां भी इसी आधुनिक शिक्षा की देन थीं. महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई जैसे महान विदुषी महिलाएं इसी आधुनिक शिक्षा से पैदा हुईं, जिन्होंने वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं की दासता के खिलाफ अथक संघर्ष किया. सावित्रीबाई आधुनिक शिक्षा को सूरज की रोशनी की तरह मानती थीं. ‘जोतीबा से संवाद’ शीर्षक अपनी कविता में वे शिक्षा और ज्ञान की तुलना सूरज की रोशनी से करते हुए कहती हैं:

सुनिये, देखिए जोतीबा
चन्द्र अस्त हुआ तो सूर्योदय हुआ
प्रातः का अद्भुत उजियारा
कहे जोतीबा सावित्री से
सच कहा तुमने, पीछे हटा अंधेरा
देखो ज्ञान के उजियारे में
शूद्र-अतिशूद्र, महार सचमुच जाग गए हैं

सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक जागरण की कविताएं है. उन्होंने अपनी कविताओं में ब्राह्मणवाद-मनुवाद को चुनौती दिया. शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का आह्वान किया है. उनकी कविताएं इस बात की प्रमाण हैं कि वे आधुनिक भारत की प्रथम विद्रोही कवयित्री हैं.

कविता के अलावा उनके तीन पत्र अत्यन्त चर्चित हैं जो उन्होंने जोतिराव फुले को लिखा था. उन्होंने विभिन्न अवसरों पर भाषण दिया. इन भाषणों में भी उनका चिंतक और लेखक व्यक्तित्व निखरकर सामने आता है. इसके अलावा उन्होंने छात्राओं को शिक्षित करने के लिए संगीत नाटिका भी तैयार किया. इस संगीत नाटिका में पच्चीस छात्राओं का समूह संवाद करता था.

(लेखक हिंदी साहित्य में पीएचडी हैं और फ़ॉरवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक हैं.)


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