हिंदी फिल्मों के गायक किशोर कुमार | रमनदीप कौर का चित्रण
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किशोर दा के गाने आपके अंदर मस्तियां घोलते हैं. उनके गानों की तेज लहराती पिच पर आपका मूड झूमते हुए बहता है. उनके रोमैंटिक, मधुर और खिलंदड़ी अंदाज में गाए हर गाने में आप तेज और धीमी होती लहर में बहते हैं और एक रवानगी महसूस करते हैं. उनमें गानों में वैरिएशन पैदा करने की जबर्दस्त कलागरी थी. यही उनका क्लास भी था.

4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश खंडवा के बंगाली परिवार में जन्में आभास कुमार गांगुली यानी किशोर कुमार ने अपने भाई अशोक कुमार की राह पर चलते हुए एक्टिंग से करियर की शुरुआत की. इसके बाद सिंगिंग, गीत लिखने, संगीत बनाने, स्क्रीन राइटिंग, निर्माता, फिल्म डायरेक्शन, सिनेमा के लगभग हर फार्मेट में अपना कमाल साबित किया.

किशोर कुमार ने गानों को बंधे-बधाए क्लास से बाहर निकालकर खुद की अपनी बनाई खास लय में लेकर आते हैं. जिसे अंग्रेजी में यूडलिंग  कहते हैं, यानि गाने के हाई और लो पिच के बीच तेजी से बदलने वाला अंदाज पैदा करना. इसे यूडल सिंगिंग भी कहते हैं. और उनकी इस अंग्रेजी स्टाइल को भारतीय वर्जन में गढ़ा राहुल देव (आरडी) वर्मन ने. किशोर ने यूडल-ए-ई-ऊ  गाने में यूडलिंग का ही प्रदर्शन कर डाला है. उनकी बायोग्राफी- किशोर कुमार: मेथड्स इन द मैडनेस  में इस स्टाइल के बारे विस्तार से बात की गई है.

इसके बाद यूडलिंग का अंदाज गायकों के लिए फैशन बन गया.

कहा जाता है कि बाद के गायकों में इस पिच को पाने की कुमार सानू ने बहुत कोशिश की लेकिन वो किशोर कुमार के मुकाम तक नहीं पहुंच सके. नए सिंगर अरिजित सिंह ने अपने कुछ गानों में इसका अच्छा इस्तेमाल किया है. ऐ दिल है मुश्किल  फिल्म के टाइटल गीत में एक अच्छा नमूना है. पर किशोर की यूडलिंग की अलग तासीर थी जो और कहीं नहीं. उन्हें यूडलिंग स्टार भी कहा जाता है.

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अमेरिकन सिंगरों से प्रेरित थी उनकी स्टाइल

किशोर दा की यह स्टाइल अमेरिकन सिंगर और सॉन्ग राइटर जिम्मी रॉजर्स  (Jimmie Rodgers) से प्रेरित थी जिन्हें ‘द फादर ऑफ कंट्री म्यूजिक’ कहा गया. वह अपने गानों में खास लय के साथ चेंज लाने के लिए मशहूर थे. इसके अलावा वेस्टर्न आस्ट्रेलियन सिंगर टेक्स मॉर्टन  (Tex Morton) का असर था.

उनकी यूडलिंग का एक जबर्दस्त इस्तेमाल म्यूजिक डायरेक्टर आरडी वर्मन के गाने ब्लॉकबस्टर मूवी कटी पतंग  में महसूस कीजिए जो राजेश खन्ना के लिए फिल्माया गया है.

तुम बिन जाऊं कहां….. इसे हॉन्टिंग यूडल का नमूना कहा जाता है.

इसी फिल्म के एक मस्ताने गाने में इस अंदाज को महसूसिए-

ये शाम मस्तानी मदहोश किए जाए…कोई डोर मुझे खींचे, तेरी ओर लिए जाए…

उनके इस लहराते अंदाज को राजेश खन्ना की फिल्म दो रास्ते  के एक गम के गाने पर आप मद्धम-मद्धम झूमते हुए बह सकते हैं.

मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं…

यह अंदाज एक तेज पिच वाले खुशी के गाने में झूमता हुआ नजर आता है, जिसे आराधना फिल्म में राजेश खन्ना के लिए फिल्माया गया है. इस फिल्म के गानों के साथ ही किशोर कुमार संगीत की दुनिया में छा गए.

मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू? आई रुत मस्तानी, कब आएगी तू? बीती जाए ज़िंदगानी, कब आएगी तू?
चली आ, तू चली आ…

जाने-माने सिंगर उनके बेटे अमित कुमार एक बातचीत में कहते हैं. इतने सालों बाद आज भी वह नंबर वन बने हुए हैं. सबसे ज्यादा गाने आज भी उन्हीं के बजते हैं.

एक ही गाने के दो वर्जन हों तो उनका गाना ज्यादा चलता था

जावेद अख्तर कहते हैं, ‘मैं एक बात बहुत ही झिझकते हुए कहना चाहूंगा पर कहूंगा जरूर…किशोर कुमार ने जब भी किसी के साथ गाना गाया, चाहे मेल सिंगर हो या फीमेल. तो आपको एक फर्क महसूस होगा. आपका ध्यान किशोर कुमार की आवाज पर ही जाएगा. या फिर एक गाना, जिसका मेल-फीमेल दोनों वर्जन हो या फिर दो मेल वर्जन का गाना हो तो किशोर का वर्जन ही चला है दूसरा नहीं चला.’

(प्यार का मौसम 1969) तुम बिन जाऊं कहांकिशोर का यह गाना रफी के वर्जन वाले गाने से ज्यादा स्कोर किया है, मेलॉडी के टर्म में नहीं, मूड के.

1976 की फिल्म महबूबा के लिए राजेश खन्ना के लिए गाया गया गाना- मेरे नैना सावन भादो  जो लता के वर्जन से ज्यादा किशोर के वर्जन के पक्ष में गया.

रिम झिम गिरे सावन  (मंजिल 1979) नर्म अंदाज में गाया गया किशोर का गाना लता के हाई पिच वाले गाने से ज्यादा स्कोर कर गया. खिलते हैं गुल यहां  (शर्मीली 1971) फीमेल वर्जन में लता का यह गाना भी कमतर साबित हुआ. (मेम साहब 1956) दिल दिल से मिलाकर देखो  किशोर के वर्जन का स्कोर आशा भोसले के वर्जन को पीछे छोड़ गया.

मन्ना डे ने अपनी आत्मकथा में याद किया हैं, ‘उनकी गायन की एक अनूठी और अप्रभावित शैली थी, जो शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को पाने में लगे साथ में गाने वाले को एक नुकसान में रखती थी.’

वह कहते हैं, ‘किशोर की कला की मास्टरी उनकी तत्काल बनाई गई टेकनीक और गाने के मूड पर पकड़ में मौजूद है.’

संगीतकार सलिल चौधरी कहते हैं कि बात यह नहीं कि किशोर दूसरों से बेहतर हैं. लता, रफ़ी और मन्ना ने उनसे ज्यादा पेचीदा गाने गाए. बात यह है कि जब किशोर ने गाया तो उनका मिडास (गोल्डेन) टच कैसा लगा.’

आरडी वर्मन ने फिल्म अमर प्रेम के चिंगारी जब भड़के  गाने का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘किशोर जब ‘चिंगारी‘ गा रहे हों तो जैसे वो बस आपके लिए गा रहे होते हैं- केवल आपके लिए.’

बदल देते थे संगीत

किशोर कुमार आर्टिस्ट नहीं, वो अपने आप में एक आर्ट थे. संगीत परंपरा से इतर उन्होंने अपनी परंपरा बनाई.

संगीतकार जतिन-ललित की जोड़ी के ललित कहते हैं, ‘गानों में मस्ती का एक्सप्रेशन बहुत मुश्किल से आता है लेकिन किशोर दा के साथ वह नेचुरली आ जाता था. उनके गानों में इतना एक्सप्रेशन सुनाई देता था, जो हम कर ही नहीं पाते हैं.’

वो कहते हैं, ‘उनकी संगीत की समझ इतनी अधिक थी कि अगर संगीतकार थोड़ी खराब धुन लेकर आए तो वो उसमें जान फूंक देते थे और गाना अमर हो जाता था.’

कशोर कुल 574 से ज्यादा गाने गाए और आठ गानों के लिए फिल्म फेयर अवार्ड  मिला जो प्लेबैक सिंगिंग (पार्श्व गायकी) की श्रेणी में सबसे ज्यादा है.

तीन बड़े अभिनेता जिनको किशोर की आवाज से पहचान मिली

किशोर कुमार की आवाज ने तीन अभिनेताओं को शिखर तक पहुंचाया. पहला नाम देवानंद का है जो उनके सदाबहार नगमों से सदाबहार हीरो बने. किशोर की झूमती, मस्तानी आवाज ने राजेश खन्ना की नई अदा, स्टाइल को खूब हिट किया और बॉलीवुड के पहले सुपर स्टार बने और अमिताभ बच्चन आज महानायक हैं.

स्टूडियो में साथी गायक का ध्यान भटका देते थे

यतीद्र मिश्र की किताब ‘लता सुर गाथा’ में लता मंगेशकर बताती हैं, ‘आप चाहे जितना सीरियस हों, गाते समय, जब आप अंतरों में कोई तान ला रहे हों या हरकत दिखा रहे हों तो किशोर दा झट से कोई बेवकूफी भरा इशारा करते थे, जिससे आपका ध्यान गाने से हट जाए. हम कई बार गानों को बीच में रुकवाकर उनसे मिन्नतें करते थे कि दादा पहले शांति से गाना रिकॉर्ड करा दो, फिर यह सब होगा…’

रफी ने किशोर के गानों से हटवाया था बैन, होड़ की बात गलत

बताया जाता है 1975 में इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस की हालत बहुत खराब थी. इंदिरा गांधी चाहती थीं उस समय काफी मशहूर किशोर कुमार उनके लिए गाएं पर उन्होंने मना कर दिया था, जिसके बाद किशोर के गानों पर 3 साल के लिए बैन लगा दिया गया था लेकिन किसी काम से दिल्ली आए मोहम्मद रफी ने किशोर को बिना बताए इंदिरा गांधी से उनके गानों से बैन हटवा दिया.

इसके बाद किशोर ने रफी से मिलकर कहा कि आपने मेरी इतनी मदद की और बताया भी नहीं तो वह बोले यह बहुत छोटी मदद है, कभी किसी से बताना मत. रफी की मौत के बाद उनका अंतिम दर्शन करने पहुंचे किशोर फूट-फूट कर रोये थे और वहीं अपने गानों से बैन हटवाने की बात बताई थी. रफी ने किशोर के लिए कई फिल्मों में आवाज दी. बतौर एक्टर किशोर कुमार ने ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘हॉफ़ टिकेट’, ‘पड़ोसन’ और ‘झुमरू’ जैसी कई फिल्मों में काम किया.

आराधना के हिट होने के बाद किशोर कुमार संगीत के आसमान पर छा गए तो लोग रफी पर ताने मारने लगे थे. जब किशोर को पता चला तो उन्होंने कहा ये सब बंद होना चाहिए, वह रफी साहब की पूजा करते हैं.

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