नई दिल्ली: बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार के पद छोड़ने के साथ राज्य की राजनीति का एक दौर खत्म हो गया है. यह दौर विकास के मजबूत प्रयास और “जंगल राज” की छवि को चुनौती देने से शुरू हुआ था, लेकिन समय के साथ सत्ता में बने रहने के लिए बार-बार राजनीतिक गठबंधन बदलने की वजह से इसकी चमक कम हो गई.
मंगलवार को नीतीश ने पटना के लोक भवन में अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता करने के बाद इस्तीफा दे दिया.
उनका कार्यकाल ऐसे समय खत्म हुआ जब बिहार ने 2025–26 में 13.1 प्रतिशत की मजबूत आर्थिक विकास दर दर्ज की, जो राष्ट्रीय औसत 9.8 प्रतिशत से ज्यादा थी. लेकिन यह उपलब्धि उनके “मौकापरस्त राजनीति” की आलोचना के कारण दब गई, क्योंकि उन्होंने बार-बार अपने गठबंधन बदले.
नीतीश 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं. इसी वजह से “नीतीश सबके हैं” और “पलटू राम” जैसे शब्द प्रचलित हुए. उन्होंने पिछले 11 साल में 5 बार गठबंधन बदला, लेकिन हर बार अपनी अगुवाई में चुनाव जीतते रहे.
राज्य में लगातार दो अंकों की विकास दर भी देखी गई, जो बुनियादी ढांचे के विकास और कल्याण योजनाओं के विस्तार से आई. यह उस समय के मुकाबले था जब 2000 के शुरुआती वर्षों में लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में बिहार काफी पिछड़े स्तर से निकल रहा था.
दिप्रिंट से बात करते हुए, नीतीश के लंबे समय से सहयोगी के.सी. त्यागी ने उन्हें उम्मीद की किरण बताया, जिन्होंने बिहार की दिशा बदली. उन्होंने यह भी माना कि राज्य में औद्योगीकरण की कमी रही. उन्होंने कहा, “बिहार पूरी तरह अव्यवस्थित था. अराजकता थी. कोई विकास नहीं था. कानून व्यवस्था नहीं थी. सड़कें नहीं थीं. बिजली नहीं थी और विकास का कोई साफ रोडमैप नहीं था. बिहार बदहाल था.”
बदलाव की संभावना
नीतीश के समकालीन नेता उनके शासन की तारीफ करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने विचारधारा की लड़ाई जीती. बिहार बीजेपी के वरिष्ठ नेता देवेश कुमार ने कहा, “उन्होंने लोगों में विश्वास पैदा किया. एक ऐसे राज्य में जो पूरी तरह बिखरा हुआ था, जहां नौकरी मिलना लगभग नामुमकिन लगता था. उनकी सबसे बड़ी जीत यही थी कि उन्होंने लोगों को विश्वास दिलाया कि बदलाव संभव है.”
नीतीश को अक्सर “सामाजिक नेता” कहा गया, क्योंकि उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए काम किया, खासकर अति पिछड़ा वर्ग को संगठित करके और उनकी राजनीति में भूमिका बढ़ाकर. 2023 की जाति जनगणना के बाद उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया, हालांकि बाद में पटना हाई कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया.
दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. चंद्रचूर सिंह, जिन्होंने बिहार पर काफी लिखा है, उन्होंने बताया कि नीतीश कैसे जन नेता बने. उन्होंने कहा, “उन्होंने उस समय जिम्मेदारी संभाली जब बिहार बहुत खराब स्थिति में था, जहां राजनीति जाति के आधार पर चलती थी. उन्होंने उस आक्रामक शैली को कम करने की कोशिश की और पिछड़ी जातियों को मुख्यधारा में लाने पर ध्यान दिया, जिससे उन्हें लोगों में ज्यादा स्वीकार्यता मिली.”
इसके बाद नीतीश ने मौके का फायदा उठाया और अपनी लोकप्रियता के समय 2016 में शराबबंदी लागू की, जो उन्होंने 2015 में वादा किया था. इससे खासकर महिलाओं का समर्थन मिला. इस कदम को एक बड़े सामाजिक सुधार के रूप में पेश किया गया, जिसका उद्देश्य शराब की समस्या को खत्म कर बिहार को बदलना था.
लेकिन इस नीति से कई समस्याएं भी पैदा हुईं. इसमें काला बाजार बढ़ना, शराब की तस्करी, जहरीली शराब से मौतें और राज्य के राजस्व में भारी कमी शामिल थी. राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने एक्स पर दावा किया कि 2016 से अब तक 1300 से ज्यादा लोगों की जहरीली शराब से मौत हो चुकी है. उन्होंने कहा कि असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती है और कई लोग अपनी आंखों की रोशनी भी खो चुके हैं.
महिलाएं सबसे पहले
हालांकि, नीतीश ने खुद को महिलाओं के समर्थक के रूप में मजबूती से पेश किया. उन्होंने कई जरूरी योजनाएं शुरू कीं, जिनसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी और एक मजबूत महिला वोट बैंक तैयार हुआ.
उन्होंने पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. जीविका योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों का विस्तार किया ताकि महिलाओं की आर्थिक पहुंच बेहतर हो सके. उन्होंने 2006 में स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए साइकिल योजना शुरू की, जिससे पढ़ाई छोड़ने की दर कम हुई और शिक्षा तक पहुंच बढ़ी. इससे नामांकन और उपस्थिति में भी बढ़ोतरी हुई.
नीतीश ने सख्त पुलिसिंग और तेजी से सुनवाई के जरिए कानून व्यवस्था में भी सुधार किया. साथ ही सड़कों, पुलों और ग्रामीण विद्युतीकरण को बेहतर बनाकर बुनियादी ढांचे का विस्तार किया.
लेकिन बिहार अब भी मानव विकास के प्रमुख सूचकों में पीछे है. 2022 में मानव विकास सूचकांक पर राज्य का स्कोर 0.609 रहा, जो देश में सबसे कम में से एक है. यह सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा और आय के स्तर को मापता है. शिक्षा क्षेत्र भी दबाव में है, जहां नामांकन में 23 प्रतिशत से ज्यादा की कमी आई है और माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर लगभग 19.5 प्रतिशत है.
उच्च शिक्षा में भागीदारी भी कम है. ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो सिर्फ 25.5 प्रतिशत है, जिससे बिहार सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल है. इसी समय, पलायन एक बड़ी समस्या बना हुआ है. अनुमान है कि करीब 75 लाख लोग काम की तलाश में राज्य छोड़ देते हैं.
एक पूर्व आईएएस अधिकारी, जो लालू प्रसाद यादव के शासन में बड़े हुए और बाद में नीतीश के कार्यकाल में काम किया, उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट से बात करते हुए बिहार की स्थिति को “गिरती हुई” बताया. उन्होंने कहा कि हालात “खराब से और ज्यादा खराब” हो गए हैं.
उन्होंने कहा, “महिलाओं के खिलाफ अपराध आज भी एक कड़वी सच्चाई है. स्कूल के बाद बहुत कम छात्र बिहार में रुकते हैं. राज्य के अंदर बिहार के लिए काम करने वाले लोगों की कमी है. असल में कुछ भी नहीं बदला है. जंगल राज अब सिर्फ एक नौकरशाही व्यवस्था में बदल गया है, जहां हर स्तर पर भ्रष्टाचार और रिश्वत है. 20 साल बाद भी चीनी मिल जैसे बड़े उद्योग फिर से शुरू नहीं हो पाए हैं. पटना यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान कमजोर हो गए हैं. और जब स्कूल व्यवस्था खराब हो रही है, तो बाकी सब भी उसी का असर झेल रहे हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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