नई दिल्ली: आगामी नौ अप्रैल को होने वाले केरल विधानसभा चुनाव से पहले, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने अपने केरल समकक्ष और सीपीआई(एम) नेता पिनाराई विजयन पर तीखा हमला किया. उन्होंने लोकप्रिय मलयालम फिल्म नरसिम्हन के एक मशहूर डायलॉग का इस्तेमाल किया.
“नी पो मोने दिनेशा”, रेड्डी ने 1 अप्रैल को एक रोड शो में कहा, जिसका मतलब था कि विजयन का समय खत्म हो गया है.
पार्टी लाइन से ऊपर उठकर, नेता अब विरोधियों पर वार करने के लिए सिनेमा से डायलॉग ले रहे हैं.
चार अप्रैल को, आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने अपनी ही पार्टी पर फिल्म धुरंधर का डायलॉग इस्तेमाल करते हुए जवाब दिया—“घायल हूं इसलिए घातक हूं”—जब पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में उपनेता पद से हटा दिया.
इसी बीच, भाजपा नेताओं ने भी अपने तरीके से फिल्मी अंदाज अपनाया है.
26 मार्च को विधानसभा में भाषण के दौरान, दिल्ली के मंत्री परवेश वर्मा ने अरविंद केजरीवाल की तुलना ‘रहमान डकैत’ से की, जो फिल्म धुरंधर का एक कुख्यात किरदार है. यह टिप्पणी केजरीवाल के ‘शीश महल’ पर तंज थी, जो 2025 दिल्ली चुनाव में भाजपा का बड़ा मुद्दा रहा.
भाजपा ने 2025 के दिल्ली चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रचार किया और अक्सर केजरीवाल पर ‘शीश महल’ को लेकर निशाना साधा, आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आवास का नवीनीकरण कराया.
लेकिन इस मामले में नरेंद्र मोदी का अंदाज सबसे अलग माना जाता है—चाहे मंच हो या संसद.
“पिक्चर अभी बाकी है” (ओम शांति ओम) से लेकर “हाउज़ द जोश?” (उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक) तक, मोदी ने फिल्मी डायलॉग को ऐसे राजनीतिक नारे बना दिया है, जो लोगों से तुरंत जुड़ जाते हैं.
उन्होंने शोले और शराबी जैसी क्लासिक फिल्मों के डायलॉग का भी इस्तेमाल विपक्ष पर निशाना साधने के लिए किया है.
फरवरी 2020 में लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब में, प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष—खासकर कांग्रेस—पर तंज कसते हुए शोले का मशहूर डायलॉग इस्तेमाल किया: “तीसरी बार तो हारे हैं, पर मौसी, मॉरल विक्ट्री तो है ना.”
इस साल फरवरी में, अभिनेता-राजनेता कमल हासन ने राज्यसभा में अपने पहले भाषण में तेलुगु फिल्म कल्कि 2898 AD का डायलॉग इस्तेमाल किया—“जगन्नाथ रथ चक्रलु तिरुगुतुन्नाय”—जिसका मतलब है कि बदलाव की रफ्तार को रोका नहीं जा सकता.
विपक्ष भी पीछे नहीं है.
जनवरी में, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ पर भारत की प्रतिक्रिया की आलोचना करते हुए, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि “भारत ने आपको (प्रधानमंत्री मोदी) इसलिए नहीं चुना कि आप उनकी हर बात पर हां में हां मिलाएं.”
इसके बाद उन्होंने मिस्टर इंडिया का मशहूर डायलॉग “मोगैम्बो खुश हुआ” का ज़िक्र किया, यह दिखाने के लिए कि सरकार ट्रंप को खुश करने में ज्यादा रुचि रखती दिख रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रेंड यूं ही नहीं है, बल्कि एक रणनीति है. हल्के-फुल्के फिल्मी डायलॉग आम लोगों से जल्दी जुड़ते हैं, जबकि नीतियों की भाषा उतनी असरदार नहीं होती.
दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर अनंत मिश्रा ने कहा, “सिनेमा पहले दिल से बात करता है, दिमाग बाद में. नेता समझ चुके हैं कि एक अच्छा डायलॉग या विजुअल किसी आंकड़े या नीति से ज्यादा तेजी से असर करता है.”
उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया, टीवी और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने राजनीति को एक विजुअल परफॉर्मेंस बना दिया है. “आज हर बहस, रैली और भाषण को एडिट करके कंटेंट की तरह पेश किया जाता है.”
मीम ‘इंडस्ट्री’
फिल्मी संदर्भों के अलावा, चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर राजनीतिक पार्टियां मीम वॉर भी करती हैं, जो फिल्मी डायलॉग और सीन से प्रेरित होते हैं.
रामजस कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक तनवीर एजाज ने कहा, “इसके लिए पूरी इंडस्ट्री काम कर रही है.”
उन्होंने कहा, “चुनाव में हम सोशल मीडिया पर जो देखते हैं, उसी के आधार पर वोट करते हैं. पार्टियां इसके लिए लोगों को हायर कर रही हैं जो उनके लिए क्रिएटिव मीम बनाते हैं.”
आम आदमी पार्टी का इंस्टाग्राम हैंडल इसका उदाहरण है, जहां ‘मीम्स’ नाम का एक सेक्शन है. इसमें जॉली एलएलबी से प्रेरित एडिट, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर तंज, और शोले के गब्बर सिंह वाला डायलॉग—“स्कूल ठीक कर लो नहीं तो केजरीवाल आ जाएगा”—जैसे कंटेंट शामिल हैं.
एक्स पर AAP ने केजरीवाल को पुष्पा फिल्म के किरदार की तरह दिखाते हुए पोस्ट किया—“केजरीवाल झुकेगा नहीं.”
वहीं, भाजपा ने भी मोदी को ‘धुरंधर’ के रूप में पेश किया है. पिछले महीने पार्टी ने एक्स पर एक एडिटेड वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्हें ‘ओरिजिनल धुरंधर’ बताया गया.
भाजपा के राज्य इकाइयों के हैंडल भी काफी सक्रिय हैं, जो अक्सर “क्या से क्या हो गया देखते-देखते” जैसे डायलॉग और एडिटेड पोस्टर शेयर करते हैं.
‘Memes in Digital Era’ नाम के एक रिसर्च पेपर के अनुसार, “मीम आम भाषा में विजुअल हास्य के माध्यम होते हैं.”
इसमें यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक और व्यंग्यात्मक मीम लोगों को चर्चा में जोड़ने का एक तरीका हैं और इन पर ज्यादा एंगेजमेंट मिलता है.
तनवीर एजाज ने कहा कि ये मीम न सिर्फ लोगों को प्रभावित करते हैं बल्कि मार्केटिंग टूल की तरह भी काम करते हैं. “इन मीम्स में अक्सर सेक्सुअलिटी, हिंसा और भ्रष्टाचार जैसे विषय होते हैं.”
ऐसा ही ट्रेंड न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में भी देखा गया, जहां उम्मीदवार जोहरान ममदानी ने अमिताभ बच्चन के संदर्भ और इंटरनेट स्टाइल का इस्तेमाल कर युवाओं को जोड़ने की कोशिश की.
मिश्रा ने कहा, “जो नेता सिनेमा की भाषा—पॉज, क्लोज-अप और छोटे डायलॉग—समझते हैं, वही आगे रहते हैं.”
आगे क्या होगा, इस पर उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे सत्ता सिनेमा की भाषा का इस्तेमाल करेगी, वैसे-वैसे विरोध भी उसी तरह जवाब देगा—व्यंग्य, डॉक्यूमेंट्री और ग्रासरूट स्टोरीटेलिंग के जरिए.”
उन्होंने कहा, “आगे बढ़ने का रास्ता मीडिया साक्षरता है—यह समझना कि जो हम देख रहे हैं, वह तैयार किया गया फ्रेम है. यह आज की सबसे जरूरी नागरिक कौशल होगी.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
