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Saturday, 11 April, 2026
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दुनिया तेजी से बदल रही है—भारत को खुद को सुधारना, मजबूत करना और आर्थिक ताकत बढ़ानी चाहिए

आज निरंतर बदलती विश्व व्यवस्था भारत के लिए एक मौका उपलब्ध करा रही है जिसका लाभ उठाने के लिए उसे खुद को अनुशासित रखना होगा ताकि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें.

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दुनिया कई युद्धों में उलझी हुई है, गठबंधनों के स्वरूप बदल और बिखर रहे हैं, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ज़ोर-ज़बरदस्ती बढ़ रही है. खासकर इन वजहों का तकाजा है कि भारत अपने भीतर झांक कर देखे. वह एक और संकट को जाया नहीं होने दे सकता.

इसकी वजह यह है कि इन महाशक्तियों और आक्रामक पड़ोसियों की हरकतों के चलते भारत को एक ऐसा मौका उपलब्ध हुआ है जिसका उसे इंतिजार रहा होगा. यह कुछ बड़ी कमजोरियों को दूर करने, दुश्मन में खौफ पैदा करने की ताकत बनाने, और अगले अपरिहार्य संकट के लिए खुद को तैयार करने का समय उपलब्ध करा रहा है.

इसका बेशक यह मतलब भी है कि भारत खुद को अनुशासित रखे कि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें. उसे इस मौके के मुगालते में रहने दें, हम तो यह विचार करें कि हमारे लिए सबसे जरूरी क्या है. याद कीजिए, मैंने इस कॉलम के 17 जनवरी 2026 के लेख में कहा था— पाकिस्तान से आजादी. इसलिए, उससे मुक्त होकर आगे बढ़ें. पश्चिम एशिया में अमन हो, यह हमारे लिए हर दृष्टि से अच्छा है.

आइए, पहले यह समझें कि जब हम यह कह रहे हैं कि दुनिया उलझी हुई है, तो इसका क्या मतलब है. पाकिस्तान अमन की दलाली करके खुश है. इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती मगर यह संभावना नहीं दिखती कि वह हमारे खिलाफ जल्दी ही कोई दुस्साहस करेगा.

उसके पिछले रेकॉर्ड को देखें तो यही कहा जा सकता है कि वह इस नये मौके को मुकम्मिल बनाने और इसका पूरा आर्थिक और सैन्य लाभ उठाने की कोशिश करेगा.

अमेरिका जब बिक्री शुरू करेगा तब उसके पास बहुत कुछ खरीदने के पैसे तो नहीं होंगे इसलिए वह फंड के लिए सऊदी अरब और क़तर तक की ओर ताकेगा. वैसे भी इन मामलों में समय लगता है.

डोनल्ड ट्रंप ने ईरान में जो दुस्साहस शुरू किया था उसे अमन और अपनी जीत के कुछ विश्वसनीय दावे के साथ खत्म करने का उन्हें कोई रास्ता खोजना है. इजरायल भी युद्ध के बाद के अपने रणनीतिक चालों पर पुनर्विचार कर रहा है. अरब की खाड़ी के देश अब यह विचार करने लग गए हैं कि कौन दुश्मन है और कौन दोस्त है. हमारा नया दोस्त यूरोप और सबसे पुराना साझीदार रूस भी अपने निकट के पड़ोस को नयी नजर से देख रहा है. यह भारत के दोस्तों को भारत को लेकर उलझन में पड़ने से रोक रहा है.

दूसरी आक्रामक ताकत चीन खामोशी से देखता रहा है कि ज्यादा बड़ी ताकत ने किस तरह खुद को फंसा लिया है और वह ‘उबरने’ के लिए चीन से किस तरह संरक्षण की आस लगाए है. अब चीन नेपोलियन के सिद्धांत पर अमल करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी (अमेरिका) को गलती करने से रोकने की कोशिश तो नहीं ही करेगा, बल्कि युद्ध से त्रस्त पश्चिम एशिया, खासकर ईरान के हालात का फायदा उठाने के लिए खुद को तैयार करेगा. अमन कायम होता है तो उसके बाद पुनर्निर्माण के लिए हजारो अरब डॉलर के वारे-न्यारे होंगे. उस क्षेत्र में ठेकेदारों की फौज उतर आएगी और निर्माण के क्रेनों की विश्वव्यापी कमी पड़ जाएगी. चीन इनमें से सारे तो नहीं मगर अधिकतर पर अपना कब्जा चाहेगा. जाहिर है, वह बड़ी उम्मीदें लगाए बैठा है. इसलिए भारत के साथ कोई नयी गड़बड़ी अब उसकी प्राथमिकता में नहीं होगी. इस तरह हम अपने  प्रतिद्वंद्वियों की ओर से निश्चिंत हो सकते हैं.

करीबी दोस्त, संभावित दोस्त और प्रतिद्वंद्वी जब इस तरह अपने में ही उलझे हुए हैं, तब भारत फिर से ऐसे दौर से गुजर रहा है जब वह शांति के साथ अपनी ताकत में इजाफा कर सकता है. मैं इसे आशावाद कहने का जोखिम भी उठा सकता हूं.

आजादी के बाद से प्रायः हर पांच साल पर हम सुरक्षा को लेकर बड़े खतरे या युद्ध जैसी स्थिति का सामना करते रहे हैं. शुरुआत जम्मू-कश्मीर को लेकर दो लड़ाइयों से हुई; इसके बाद गोवा का मामला आय जहां पुर्तगाल ‘नाटो’ के अनुच्छेद 5 की आड़ में जमा हुआ था, उसे 1961 में मुक्त कराया गया; 1962, 1965, 1971 में चीन और पाकिस्तान से जंग लड़नी पड़ी, 1967 में नाथुला में भी अच्छी-ख़ासी झड़प का सामना करना पड़ा. 24 साल में पांच युद्ध हर पांच साल पर सैन्य चुनौती के रूप में आई.

पाकिस्तान की शिकस्त और उसके विभाजन से थोड़ी राहत तो मिली लेकिन 1986 के बाद से रणनीतिक खतरे लगातार उभरते रहे. चीन के साथ वांगडुंग/सुमदोरोंग चू में टक्कर, और 1986-87 में ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ (जिसे हमने उकसाया था), कश्मीर को लेकर 1990 में भी पाकिस्तान की ओर से युद्ध की धमकी और पहली बार परमाणु युद्ध की चेतावनी.

इसके बाद आप गिनती जारी रख सकते हैं : करगिल युद्ध (1999), संसद पर हमला और ऑपरेशन पराक्रम (2001), 26/11 के हमले (2008), और इसके बाद उड़ी (2016), पुलवामा (2019), पहलगाम (2025). इन सबके बीच चीन भी तनाव में इजाफा करता रहा, दो बार यूपीए के दौर में 2009 में दलाई लामा के अरुणाचल दौरे को लेकर और 2013-14 में देप्सांग और चूमर में झड़पों के कारण. इसके बाद पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध पैदा हुआ जिसे अब शांत तो कर दिया गया है मगर सुलझाया नहीं गया है. इन सबकी गिनती के लिए आपको कैलकुलेटर की जरूरत नहीं पड़ेगी. मामूली गणित भी बता देगा कि हर पांच साल पर संकट का सामना करना पड़ा.

ऊपर जिन भटकावों का जिक्र किया गया है उन्होंने पांच-पांच साल के अमन वाले दौरों की शुरुआत भी की.

मैं पांच साल वाले अंतराल पर ही इसलिए ज़ोर दे रहा हूं क्योंकि आसिम मुनीर के कार्याकाल को विस्तार दिए जाने का सिलसिला 2030 में खत्म होगा. तब वे सिर्फ 62 साल के होंगे, जिस उम्र पर भारत के सेनाध्यक्ष अपने नियमित कार्यकाल के बाद प्रायः रिटायर हो जाते हैं. लेकिन 2030 तक मुनीर पांच नहीं तो चार सेनाध्यक्षों के कार्यकाल के बराबर तो सेवा दे ही चुके होंगे.

पाकिस्तान या दूसरे मुल्कों में फौजी तानाशाहों के बारे में हमें एक बात तो मालूम है कि उनकी रिटायर होने की कोई योजना नहीं होती. जो भी हो, किसी आजीवन पाकिस्तानी फील्ड मार्शल के लिए 62 की उम्र (2030) रिटायर करने की उम्र थोड़े ही हो सकती है.

उनके मुल्क की जो हालत है और उसकी अर्थव्यवस्था ततः इतिहास की जो दिशा है उसके मद्देनजर हम कल्पना कर सकते हैं कि तब तक वे बुरी तरह आलोकप्रिय हो चुके होंगे. अगर कोई पाकिस्तानी तानाशाह अपने यहां असंतोष से निबटने के लिए भारत के साथ युद्ध के हालात पैदा करने के सिवा दूसरा कोई तरीका जनता है, तो वह अभी तक सामने नहीं आया है. इसलिए हमने अपना आशावाद पांच साल की अवधि तक ही सीमित रखा है. कहा गया है कि उम्मीद को योजना नहीं माना जा सकता, इसलिए हम भाग्यशाली होंगे अगर ऐसा कुछ हुआ.

चीन जबकि देख रहा है कि ट्रंप अमेरिका को कमजोर कर रहे हैं, अपने गठबंधनों को तोड़ रहे हैं और विभाजित अमेरिका में उत्तराधिकारी अपना रास्ता बना रहा है तब चीन को भी इस अवधि की जरूरत होगी. चीन को भी अपने कथित खोए हुए क्षेत्र को वापस हासिल करने के पुराने सपने को साकार करने लायक मजबूती का एहसास हासिल करने के लिए पांच साल की जरूरत होगी. उस सपने में ताइवान, साउथ चाइना के द्वीप और शायद हिमालय भी शामिल हैं.

अगर यह आशावाद सच साबित होता है और भारत को ये पांच साल मिल जाते हैं तब वह इनका किस तरह इस्तेमाल करेगा? हमने जो यह कहा कि उसे अपने अंदर झांकना होगा, उसका क्या अर्थ है?

व्यापार के मामले में ट्रंप की दादागीरी, ऑपरेशन सिंदूर से सेना के आधुनिकीकरण में उजागर कमजोरी, और खाड़ी में जंग ने भारत की पांच अहम कमजोरियों को उजागर किया है. ये हैं : सेना का आधुनिकीकरण , ऊर्जा के मामले में निर्भरता, हवाई खुफिया व्यवस्था में खामी (महत्वपूर्ण उपग्रहों वाले पिछले दो ‘पीएसएलवी’ की विफलता और ‘नेवआइसी’ परियोजना का खत्म होना), खाद, और अहम खनिज. इन सबको पांच साल में दुरुस्त करना मुमकिन नहीं है लेकिन आप खाइयों को पाट कर अगले संकट का सामना करने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकते हैं.

सेना के मामले में कुछ परिवर्तन तो आया है लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भी बातें जायादा हुई हैं, काम कम हुआ है. परिवर्तन की गति बढ़नी चाहिए. ऊर्जा का मामला ज्यादा जटिल चुनौती है. नयी खोज से नतीजे हासिल होने में समय लगेगा. नयी पनबिजली परियोजनाएं और ज्यादा समय लेंगी.

ऊर्जा के नये स्रोतों, सार्वजनिक तथा निजी परिवहन के लिए बिजली, इथानोल (गन्ने या धान की जगह मकके के) के मिश्रण, कोयले से गैस बनाने, और व्यापक खनन के मामलों में भारत को ज्यादा तेजी से आगे बढ़ना होगा. कोयले से मिली सिंथेटिक गैस का पहला उपयोग खाद के उत्पादन में होना चाहिए. इसके अलावा, खनन का मुद्दा आता है जिसके बारे में हम कम बात करते हैं और जो फिसड्डी बना हुआ है.

नये कानून बने हैं, सुधारों की कोशिश जारी है, लेकिन सरकार और ‘पीएसयू’ का साया और दबाव इस अहम मुद्दे को गिरफ्त में लिये हुए है. सबसे नया उदाहरण एक जिला खनन अधिकारी का है, जिसने कोयले के ‘जरूरत से ज्यादा खनन’ के लिए टाटा कंपनी को 1,755 करोड़ रुपये के जुर्माने का नोटिस भेज दिया है. लाइसेंस के तहत जितना कोयला खनन करना चाहिए था उससे ज्यादा खनन करने का ‘अपराध’ उस कंपनी ने कब किया? 2001 से 2006 के बीच. हम जानते हैं कि यह सुप्रीम कोर्ट के गलत आदेश के कारण हुआ. लेकिन विधायिका को इसे दुरुस्त करना चाहिए.

जिन अहम निर्भरताओं ने आपको पिछले कई महीनों से आपको इतना कमजोर और असहाय बना रखा है उनसे मुक्त होने का यह तरीका नहीं हो सकता. खनिजों से समृद्ध पूर्वी व मध्य भारत को जबकि हथियारबंद माओवाद से मुक्त करा लिया गया है तब नयी संभावनाओं के द्वार खुल गए हैं.

अंत में, अपने ही अभ्यासों से हमें एक महत्वपूर्ण सबक मिला है. कश्मीर में (1994) मानवाधिकारों को लेकर पश्चिम से मिली चुनौती, पोखरण-2 (1998) के बाद प्रतिबंधों, और करगिल आदि का हमने किस तरह बेहतर तरीके से सामना किया? इसलिए कि 1991 में हमने आर्थिक सुधारों को लागू किया और एक उभरती शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाई. आर्थिक वृद्धि ही हमारा सबसे कारगर रणनीतिक प्रतिरोध है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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