लखनऊ: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जिला इकाइयों में हाल ही में हुई नियुक्तियों को लेकर विवाद शुरू हो गया है. सबसे पहले यह मुद्दा अयोध्या में सामने आया, जहां पार्टी ने शिवेंद्र सिंह को शहर का महासचिव बनाया, जबकि रिपोर्ट के अनुसार उन पर गैंगस्टर एक्ट समेत कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य में जिला कार्यकारिणी समितियों के गठन की प्रक्रिया पर पार्टी के अंदर से ही चिंता और सवाल उठ रहे हैं.
मिर्जापुर में श्याम सिंह यादव को जिला सचिव बनाए जाने पर भी ध्यान गया और पार्टी के अंदर विरोध हुआ, क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार 2008 से उन पर हत्या का मामला दर्ज है.
उत्तर प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता रामदुलार चौधरी ने कहा कि ऐसे फैसलों से जनता में गलत संदेश जाता है और पार्टी को ऐसे लोगों को पद देने से पहले सावधानी से सोचना चाहिए.
उन्होंने निराशा जताई कि हत्या के आरोपी व्यक्ति को संगठन में अहम जिम्मेदारी दी गई, लेकिन यह भी कहा कि वह पार्टी के साथ हैं और कोई औपचारिक शिकायत नहीं करेंगे.
इस पर मिर्जापुर बीजेपी जिला अध्यक्ष लाल बहादुर सरोज ने दिप्रिंट से कहा, “हमें श्याम सिंह यादव के बारे में कुछ शिकायतें मिली थीं, लेकिन वह लंबे समय से बीजेपी से जुड़े हुए हैं. अब जब उन्हें पद दिया गया है तो कई लोगों को यह बात पच नहीं रही है. फिर भी हम उनके खिलाफ लगे आरोपों की जांच करेंगे और उसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा.”
अयोध्या में विवाद
अयोध्या में, जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को बड़ी हार मिली थी, वहां शिवेंद्र सिंह को महासचिव बनाए जाने पर भी विवाद हो गया. पार्टी के अंदर असहजता का एक संकेत यह माना गया कि पिछले हफ्ते राम मंदिर दर्शन के लिए गए नए पदाधिकारियों में वह शामिल नहीं थे.
उनकी नियुक्ति के बाद स्थानीय नेताओं का एक वर्ग उनसे दूरी बनाता दिखा और कहा जा रहा है कि उनके खिलाफ हत्या की कोशिश, दंगा, वसूली, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं.
सूत्रों के अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान उनके खिलाफ मामलों की पूरी जानकारी सभी स्तरों पर साझा नहीं की गई थी. जब तक स्थानीय जांच में ये जानकारी सामने आई और कुछ नेताओं ने आपत्ति उठाई, तब तक सूची पहले ही घोषित हो चुकी थी.
बीजेपी नेता शिवेंद्र सिंह जिन्हें अयोध्या शहर का महासचिव बनाया गया है | एक्स/@ShivanandM3985
लखनऊ में भी एक अलग तरह का विवाद सामने आया है, जहां एक सरकारी स्कूल के शिक्षक को जिला मीडिया प्रभारी बना दिया गया, जबकि सेवा नियमों के अनुसार सरकारी कर्मचारी राजनीतिक दलों में पद नहीं ले सकते.
इससे प्रशासनिक और कानूनी चिंता पैदा हो गई है. शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “यह सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है. अगर कोई शिक्षक सक्रिय राजनीति में भूमिका लेता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है.”
हालांकि, संबंधित शिक्षक का कहना है कि परिषद (परिषदीय) शिक्षक का दर्जा सामान्य शिक्षक से अलग होता है. लेकिन विभाग के अधिकारी कहते हैं कि ऐसे तर्क मान्य नहीं हैं और इससे नियुक्ति के समय नियमों की व्याख्या में अस्पष्टता और ढील दिखाई देती है.
इसी तरह इटावा में जितेंद्र गौर को महासचिव बनाए जाने पर भी विवाद हो गया है. स्थानीय नेताओं का आरोप है कि उनका एक पुराना वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.
यूपी बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “ये नियुक्तियां जल्दबाजी में सिर्फ कोरम पूरा करने के लिए की गई हैं. चुनाव पास होने पर हर गुट चाहता है कि उसके लोग मुख्य टीम में हों. बाहुबल और पैसे के प्रभाव वाले लोग अक्सर पार्टी में शामिल होते हैं, लेकिन उन्हें समिति में पद देना चिंता की बात है.”
उन्होंने आगे कहा, “हमारी पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए जानी जाती है, व्यक्तियों के लिए नहीं. हमें अपनी छवि साफ रखनी चाहिए, खासकर जब हम इसी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी पर हमला करते हैं.”
एक अन्य नेता ने दावा किया कि पिछले दिसंबर में केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी के नए प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद राज्य से लेकर जिला स्तर तक नई समितियां बनाने की प्रक्रिया चल रही है.
नेता ने कहा कि पार्टी ने जिला अध्यक्षों और प्रभारियों को खुली छूट दी है, जिससे कोरम पूरा करने और सभी तरफ की सिफारिशों को जगह देने की जल्दबाजी बढ़ गई है.
“लेकिन प्रदेश अध्यक्ष को हस्तक्षेप करना चाहिए. वह पहले से ही ज्यादा जिम्मेदारियों में व्यस्त दिखते हैं, क्योंकि उनके पास केंद्रीय मंत्रालय का काम भी है और राज्य में संगठन की अहम जिम्मेदारियां भी हैं, इसलिए शायद उन्हें फीडबैक लेने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है,” नेता ने कहा.
दिप्रिंट ने बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष से कॉल और मैसेज के जरिए संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उनका जवाब आने पर खबर अपडेट की जाएगी.
यूपी बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा, “जिला इकाइयों के लिए जिला अध्यक्ष ज्यादा जवाबदेह होते हैं. वे अपने-अपने जिलों में नियुक्तियों से जुड़े विवादों पर बेहतर स्पष्टता दे सकते हैं. हमारी पार्टी किसी भी हिस्ट्रीशीटर या माफिया को पद देने के पक्ष में नहीं है. हम ऐसी राजनीति का समर्थन नहीं करते.”
कुछ स्थानीय नेताओं ने कहा कि केवल “विवादित” लोगों को ही नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में पार्टी के नियमों का भी पालन नहीं किया गया.
एक वरिष्ठ महिला पदाधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े पार्टी के अपने दिशा-निर्देशों का भी पालन नहीं किया गया.”
उन्होंने कहा, “नियमों के अनुसार हर जिला कार्यकारिणी समिति में कम से कम सात महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य है, लेकिन ललितपुर को छोड़कर ज्यादातर जिले इस कोरम को पूरा नहीं कर पाए. जिला कार्यकारिणी सदस्यों में 30 महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान भी है, जो कई जगह अधूरा है.”
जातीय संतुलन को लेकर भी सवाल उठे हैं.
पार्टी ने कहा था कि कम से कम दो पदाधिकारी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से होने चाहिए और ओबीसी का प्रतिनिधित्व स्थानीय सामाजिक समीकरण के अनुसार तय होना चाहिए.
उन्होंने कहा, “कई जिला इकाइयों में इन नियमों का भी पालन नहीं हुआ है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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