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Friday, 3 April, 2026
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माओवादी आंदोलन खत्म होने की कगार पर, लेकिन असली चुनौती अब भी बरकरार है

माओवादी हिंसा कम हुई है, लेकिन यह नहीं मान लेना चाहिए कि असंतोष खत्म हो गया है. यह फिर से उभर सकता है—चाहे नई बगावत के रूप में, किसी स्थानीय आंदोलन के रूप में, या किसी और तरह के विरोध के तौर पर.

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माओवादी विद्रोह एक समय भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती था. अपने चरम पर, 2009-10 में, यह देश के 20 राज्यों के 223 जिलों में फैला हुआ था. 2013 में जेन के ‘ग्लोबल टेररिज्म एंड इंसर्जेंसी अटैक इंडेक्स’ ने इसे दुनिया के दस सबसे सक्रिय गैर-राज्य सशस्त्र समूहों में चौथे स्थान पर रखा था.

भारत सरकार ने मार्च 2026 तक इस विद्रोह को खत्म करने का साहसिक फैसला लिया था. आज कई संकेत मिल रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के नेतृत्व वाला यह सशस्त्र आंदोलन खत्म होने के करीब है.

सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माओवादी नेतृत्व के ऊपरी स्तर को धीरे-धीरे खत्म करना रहा है. पॉलिटब्यूरो और केंद्रीय समिति के ज्यादातर सदस्य—जो इस आंदोलन की सोच और संचालन की रीढ़ थे, या तो मारे गए हैं, गिरफ्तार हुए हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं. इससे उनके कमांड और कंट्रोल सिस्टम को बड़ा झटका लगा है.

नेतृत्व का खत्म होना

नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू, जो सीपीआई (माओवादी) के महासचिव थे, उनकी 21 मई पिछले साल छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र में एक मुठभेड़ में 26 अन्य लोगों के साथ मौत एक बड़ा मोड़ साबित हुई. इसने माओवादी आंदोलन के पतन की शुरुआत की.

पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की पहली बटालियन के कुख्यात कमांडर मडवी हिडमा को 18 नवंबर पिछले साल आंध्र प्रदेश में एलीट ग्रेहाउंड्स ने मार गिराया. केंद्रीय समिति के सदस्य गणेश उइके को 25 दिसंबर 2025 को ओडिशा के कंधमाल जिले में मार दिया गया. एक अन्य केंद्रीय समिति सदस्य पाती राम मांझी झारखंड के सारंडा जंगल क्षेत्र में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए.

सीपीआई (माओवादी) के लिए “आखिरी कील” तब साबित हुई जब 22 फरवरी को थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी, जो महासचिव और केंद्रीय सैन्य आयोग के प्रमुख थे, ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. वह सशस्त्र संघर्ष के कट्टर समर्थक थे.

दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्य और विचारक मल्लोजुला वेणुगोपाल राव ने 19 नवंबर 2025 को एक वीडियो जारी कर माओवादियों से हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की अपील की.

उन्होंने कहा, “समय बदल गया है, देश बदल गया है और हालात बदल गए हैं. अब सशस्त्र संघर्ष संभव नहीं है. हमें संविधान के अनुसार काम करना चाहिए. यही एकमात्र रास्ता है. इस सच्चाई को नजरअंदाज मत करो—हथियार छोड़ो और लोगों के पास लौटो.”

इसी दौरान, पीएलजीए, जो माओवादियों की सैन्य ताकत की रीढ़ थी, लगभग टूट चुकी है. लगातार चल रहे एंटी-इंसर्जेंसी ऑपरेशन और बेहतर खुफिया तालमेल से उग्रवादियों के काम करने की जगह काफी कम हो गई है. ड्रोन और सैटेलाइट का इस्तेमाल करके माओवादी गुरिल्लाओं की गतिविधियों पर नज़र रखी गई, और दूरदराज इलाकों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस बनाए गए, जो पहले माओवादियों के मजबूत गढ़ माने जाते थे.

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, जो छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा के कर्रेगुट्टा पहाड़ियों में 21 दिन तक चला, खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा. इसमें सुरक्षा बलों ने 27 गुरिल्लाओं को मार गिराया और माओवादियों के एक मजबूत ठिकाने को खत्म कर दिया. इस ऑपरेशन के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 84 ने आत्मसमर्पण किया.

नतीजे साफ हैं. माओवादी आंदोलन अब बड़े स्तर पर समन्वित हमले करने की क्षमता नहीं रखता जैसा पहले करता था. हिंसा में काफी कमी आई है, भर्ती कम हो गई है, और संगठन टूट चुका है और मनोबल गिर चुका है.

इस विद्रोह की हार का कारण साफ और मजबूत राजनीतिक दिशा, व्यापक और अच्छे समन्वय वाले ऑपरेशन और बेहतर शासन है, जो सड़कों के निर्माण, मोबाइल टावर लगाने, बैंक और डाकघर खोलने और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने में दिखता है. भारत की सशस्त्र विद्रोहों के खिलाफ लड़ाई में यह 1980 के दशक में पंजाब में आतंकवाद की हार के बाद दूसरी सबसे बड़ी जीत मानी जा रही है.

एक सामरिक जीत, लेकिन रणनीतिक अंत नहीं

हालांकि, ये घटनाएं उम्मीद बढ़ाती हैं, लेकिन इससे लापरवाही नहीं होनी चाहिए. विद्रोह सिर्फ सैन्य समस्या नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से गहराई से जुड़े होते हैं. माओवादी आंदोलन को आदिवासी और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की पुरानी शिकायतों से ताकत मिली थी—और ये शिकायतें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं.

आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी खनन, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और औद्योगिक विस्तार के कारण विस्थापन झेल रहा है. कई मामलों में पुनर्वास और मुआवजा सही तरीके से नहीं मिला या ठीक से लागू नहीं हुआ. इससे लोगों में सरकार के प्रति दूरी की भावना बनी हुई है.

एक और चिंता की बात है वन अधिकार अधिनियम 2006 जैसे कानूनों का ठीक से लागू न होना. इस कानून का उद्देश्य जंगल में रहने वाले लोगों को जमीन और संसाधनों पर अधिकार देना था. लेकिन नौकरशाही की देरी, प्रक्रियात्मक दिक्कतें और जागरूकता की कमी के कारण इसका असर जमीन पर सीमित रहा है.

खास नीतियों से आगे बढ़कर, बड़े स्तर की समस्याएं भी असंतोष को बढ़ा सकती हैं. वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाके लंबे समय से खराब प्रशासन, कमजोर ढांचे, खराब स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं और कम आर्थिक अवसरों से जूझते रहे हैं. हाल के वर्षों में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी कई कमी हैं.

असमानता—चाहे आर्थिक हो या सामाजिक—अशांति का बड़ा कारण होती है. जब विकास लोगों को बाहर रखने वाला या सिर्फ संसाधन निकालने वाला लगता है, तो वही हालात फिर पैदा हो सकते हैं, जिनसे विद्रोह शुरू हुआ था. इसलिए चुनौती सिर्फ सरकार की पहुंच बढ़ाने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि उसकी मौजूदगी लोगों को सही, जवाबदेह और न्यायपूर्ण लगे.

फिर से उभरने का खतरा

इतिहास से एक सीख मिलती है: जो आंदोलन सिर्फ बल से दबाए जाते हैं, वे फिर से नए रूप में उभर सकते हैं अगर उनकी मूल समस्याएं हल न हों. माओवादी हिंसा में कमी आई है, लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि असंतोष खत्म हो गया है. यह फिर से उभर सकता है—चाहे नए विद्रोह के रूप में, स्थानीय विरोध के रूप में या किसी और तरीके से.

नक्सलवाद की विचारधारा, जो सामाजिक न्याय, शोषण के खिलाफ लड़ाई और असमानता के प्रति गुस्से पर आधारित है, अभी भी समाज के कुछ हिस्सों को प्रभावित कर सकती है.

हम एक अजीब स्थिति में हैं: विद्रोह दबा दिया गया है, लेकिन उसकी विचारधारा अभी भी कहीं न कहीं बनी रह सकती है, भले ही छुपे हुए रूप में.

यह समय एक ऐतिहासिक मौका देता है—सिर्फ विद्रोह खत्म करने का नहीं, बल्कि स्थायी शांति बनाने का. इसके लिए सरकार को संतुलित और दूरदर्शी तरीका अपनाना होगा.

पहला, विकास सभी को शामिल करने वाला और भागीदारी वाला होना चाहिए. आदिवासी समुदाय सिर्फ लाभ पाने वाले न हों, बल्कि फैसले लेने में उनकी भागीदारी हो. उनके अधिकार, सहमति और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान होना चाहिए.

दूसरा, वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों का सही तरीके से लागू होना बहुत जरूरी है. जमीन पर अधिकार और जंगल के संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करने से मूल समस्याओं को काफी हद तक हल किया जा सकता है.

तीसरा, जमीनी स्तर पर शासन को मजबूत करना होगा. स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सेवाओं को प्राथमिकता देनी होगी, खासकर उन इलाकों में जो पहले प्रभावित रहे हैं. प्रशासन की मौजूदगी के साथ संवेदनशीलता और जवाबदेही भी जरूरी है.

चौथा, सुरक्षा बलों को सतर्क रहना होगा. संघर्ष वाले इलाके से सामान्य स्थिति में बदलाव बहुत सावधानी और समझदारी से करना होगा.

असल परीक्षा

भारत अब अपने सबसे लंबे समय से चल रहे विद्रोहों में से एक को खत्म करने के करीब दिख रहा है. माओवादी आंदोलन का टूटना सरकार के लगातार प्रयास और बेहतर रणनीति का परिणाम है.

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है. सरकार को आगे बढ़ते हुए सावधानी, समझदारी और संवेदनशीलता दिखानी होगी. नक्सल समस्या का अंत सिर्फ हथियारबंद लोगों को खत्म करना नहीं है, बल्कि समाज की गहरी समस्याओं को हल करना है, खासकर आदिवासी इलाकों में. तभी यह सुनिश्चित होगा कि आज मिली शांति भविष्य में फिर से न टूटे.

प्रकाश सिंह पूर्व पुलिस प्रमुख हैं और ‘द नक्सलाइट मूवमेंट इन इंडिया’ किताब के लेखक हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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