कई राज्यों बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश, में हुए राज्यसभा चुनाव सामान्यतः संख्या-बल और दलगत समीकरणों के आधार पर शांतिपूर्वक संपन्न हो जाते हैं, लेकिन बिहार की स्थिति अलग रही क्योंकि यहां सत्ता संतुलन गठबंधन आधारित राजनीति पर टिका हुआ है. नीतीश कुमार का नाम लगातार चर्चा में इसलिए बना रहा क्योंकि उनका मामला केवल एक सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके राजनीतिक रुख से पूरे राज्य की सत्ता संरचना प्रभावित होती है. एनडीए और महागठबंधन के बीच उनकी रणनीतिक अदला-बदली तथा संभावित क्रॉस-वोटिंग की आशंकाओं ने राष्ट्रीय राजनीति में उत्सुकता पैदा की. इस कारण अन्य राज्यों के अपेक्षाकृत सामान्य चुनावों के बीच भी बिहार केंद्र में रहा.
बिहार में राजनीतिक विरोधाभास
क्या बिहार की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है?
अब जब नीतीश कुमार सक्रिय राज्य राजनीति से हटकर राज्यसभा के माध्यम से केंद्र की ओर जा रहे हैं, तो यह केवल पद परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि बिहार की राजनीतिक संरचना पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है. लगभग दो दशकों से राज्य की राजनीति जिस नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही, उसके बदलने से सामाजिक शक्ति-संतुलन, प्रतिनिधित्व और गठबंधन राजनीति के समीकरण भी बदल सकते हैं.
बिहार की राजनीति का इतिहास सामाजिक शक्ति संतुलन के लगातार पुनर्गठन से जुड़ा रहा है. मंडल आंदोलन, लालू प्रसाद यादव का दौर और नीतीश कुमार का काल—ये तीनों चरण राज्य के सामाजिक परिवर्तन की अलग-अलग कहानी बताते हैं. बिहार की राजनीति केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रही, बल्कि समाज में प्रतिनिधित्व और भागीदारी के बदलते स्वरूप की प्रक्रिया भी रही है.
पहला चरण: मंडल राजनीति और सामाजिक पहचान
मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के साथ भारतीय राजनीति में बड़ा सामाजिक परिवर्तन शुरू हुआ. लंबे समय तक सीमित हिस्सेदारी रखने वाले पिछड़े वर्गों को राजनीतिक पहचान और अधिकार का अवसर मिला. बिहार इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण केंद्र बना. मंडल राजनीति ने केवल आरक्षण का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि ऐतिहासिक असमानताओं को चुनौती दी. ग्रामीण समाज में आत्मसम्मान की नई भावना पैदा हुई और जो समुदाय पहले हाशिये पर थे, वे अपनी पहचान के साथ सामने आने लगे. हालांकि, इसके साथ जातिगत गोलबंदी की राजनीति भी मजबूत हुई, जिसमें सामाजिक न्याय का विचार कई बार संकीर्ण जातिगत प्रतिस्पर्धा तक सीमित होता दिखाई दिया जो कई बार जातिगत हिंसा को भी जन्म दिया.
दूसरा चरण: लालू प्रसाद यादव और सामाजिक न्याय की राजनीति
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का उभार उस दौर में हुआ जब सामाजिक शक्ति राजनीतिक शक्ति में बदल रही थी. उन्होंने कर्पूरी ठाकुर की सामाजिक न्याय की विरासत और जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ की राजनीति—दोनों को साथ लेकर खुद को पिछड़े वर्गों की मजबूत आवाज़ के रूप में स्थापित किया.
1980–85 के दशक में कर्पूरी ठाकुर की अनुपस्थिति के बाद लालू प्रसाद यादव तेजी से प्रमुख नेता बनकर उभरे. इसी समय लोकसभा में पिछड़ी मध्यवर्ती जातियों का प्रतिनिधित्व बढ़ा और सामाजिक बदलाव का असर राजनीति में दिखने लगा. बिहार की पिछड़ी राजनीति में दो बड़े समूह सक्रिय हुए—कुर्मी-कोयरी और यादव, जिनकी राजनीतिक पसंद अक्सर अलग रही, जहां नीतीश कुमार को व्यापक पिछड़ा राजनीति से जोड़ा गया, वहीं लालू का आधार मुख्य रूप से यादव समुदाय में मजबूत हुआ.
लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व ने वंचित वर्गों में आत्मविश्वास और राजनीतिक भागीदारी की भावना को मजबूत किया. गांवों-कस्बों में यह विश्वास बढ़ा कि सत्ता में उनकी भी हिस्सेदारी हो सकती है. ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे नारे सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रतीक बने. हालांकि, समय के साथ उनकी राजनीति की सीमाएं भी दिखीं. सामाजिक न्याय ने प्रतिनिधित्व को मजबूत किया, लेकिन विकास और प्रशासन जैसे मुद्दे पीछे छूटते नज़र आए और कई जगह सामाजिक तनाव भी बढ़ा. धीरे-धीरे सामाजिक न्याय का व्यापक विचार कुछ सीमित जातीय दायरे में सिमटता दिखाई देने लगा.
तीसरा चरण: नीतीश कुमार और संतुलन की राजनीति
इसी पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार का राजनीतिक उभार हुआ. उन्होंने मंडल राजनीति की विरासत को पूरी तरह नकारा नहीं, बल्कि उसे विकास और प्रशासनिक सुधार के साथ जोड़ने का प्रयास किया. उनका उद्देश्य सामाजिक न्याय को केवल पहचान की राजनीति तक सीमित रखने के बजाय शासन और भागीदारी से जोड़ना था. नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़े वर्गों और महादलित समुदायों को अलग पहचान देकर उन्हें प्रतिनिधित्व दिलाने की कोशिश की. पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देना एक महत्वपूर्ण कदम था, जिससे ग्रामीण समाज की सत्ता संरचना में बदलाव आया. बड़ी संख्या में महिलाएं स्थानीय शासन से जुड़ीं और इससे समाज में उनकी भूमिका मजबूत हुई.
शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी कई योजनाएँ शुरू की गईं, जिनसे छात्राओं की संख्या बढ़ी. यह बदलाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं की सामाजिक भागीदारी भी बढ़ी.
चौथा चरण: भाजपा की एंट्री और बदलते राजनीतिक समीकरण
बिहार की राजनीति का चौथा चरण तब शुरू होता है जब भाजपा ने क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय दखल देना शुरू किया. इसकी शुरुआत नीतीश कुमार के साथ गठबंधन से हुई. नीतीश कुमार ने 1990 के दशक में समता पार्टी के माध्यम से भाजपा के साथ हाथ मिलाया, जिसका मुख्य उद्देश्य लालू प्रसाद यादव और राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति को चुनौती देना था. 2003 में समता पार्टी का विलय होकर जनता दल (यूनाइटेड) बना और भाजपा के साथ मिलकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को मजबूत किया.
इस गठबंधन का असर 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में साफ दिखा, जब जद(यू) और भाजपा को मिलकर बहुमत मिला. 2010 के चुनाव में यह गठबंधन और मजबूत हुआ और उसे ऐतिहासिक जीत मिली, लेकिन समय के साथ बिहार की राजनीति में भाजपा का प्रभाव बढ़ता गया, जबकि जद(यू) की ताकत घटती दिखाई दी. 2015 में जद(यू) को 71 सीटें मिली थीं, जो 2020 में घटकर 43 रह गईं, जबकि भाजपा 74 सीटों के साथ गठबंधन में बड़ी पार्टी बनकर उभरी. बार-बार गठबंधन बदलने के कारण नीतीश कुमार की छवि पर भी असर पड़ा और विरोधियों ने उन्हें “पलटू राम” कहकर निशाना बनाया.
फिर भी हाल के चुनावों में एनडीए गठबंधन मजबूत स्थिति में दिखाई दिया. इससे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के साथ गठबंधन ने नीतीश कुमार को सत्ता में बने रहने में मदद की, लेकिन साथ ही उनकी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक ताकत पर भी असर पड़ा.
आज बिहार की राजनीति को समझने के लिए इन सभी चरणों को एक साथ देखना ज़रूरी है. यह केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि समाज, जाति और विचारधारा के बदलते समीकरणों की कहानी भी है. एक ओर हिंदुत्व की राजनीति का प्रभाव बढ़ने की संभावना है, जिससे राजनीतिक विमर्श सामाजिक न्याय से हटकर सांस्कृतिक मुद्दों की ओर जा सकता है. दूसरी ओर, इसके जवाब में जाति आधारित राजनीति फिर तेज हो सकती है, जहां प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी के सवाल फिर से प्रमुख बनें.
यानी बिहार की राजनीति एक ऐसे दौर में खड़ी है, जहां वैचारिक ध्रुवीकरण और सामाजिक न्याय—दोनों की राजनीति साथ-साथ आगे बढ़ती दिख सकती है और यही द्वंद्व आने वाले समय की दिशा तय करेगा.
डॉ. प्रांजल सिंह, दिल्ली यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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